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प्रायवेट लैब में जांच कराने के लिए 95% जली किशोरी को खून चढ़ाना बीच में रोका, ऑपरेशन में पेट में कपड़ा छोड़ा तो डॉक्टर नहीं एएनएम निलंबित

जिले में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और मरीजों के साथ की जा रही जानलेवा गड़बड़ी के और दो मामले सामने आए हैं। एक मामले...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 29, 2018, 02:00 AM IST

जिले में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और मरीजों के साथ की जा रही जानलेवा गड़बड़ी के और दो मामले सामने आए हैं। एक मामले में जिला अस्पताल में हड्‌डी रोग विशेषज्ञ डॉ पीके माथुर ने 95 फीसदी जली किशोरी के लिए चढ़ रहे खून की सप्लाई सिर्फ इसलिए रुकवा दी क्योंकि गरीब परिजनों ने उसकी जांचें प्राइवेट लैब में नहीं कराई थीं। इसी प्रकार गंभीर लापरवाही के दूसरे मामले में तीन महीना पहले कुरावर मंडी के सरकारी अस्पताल में सीजर के दौरान महिला के पेट में कपड़ा छोड़ने के मामले में डॉक्टर को राहत देते हुए एक एएनएम को निलंबित किया गया है।

1 किशोरी को 2 बोतल खून चढ़ाया जा चुका था, फिर से कराई जांच

शुक्रवार दोपहर खाना बनाते वक्त 95 फीसदी जली 13 साल की हंसा पुत्री छोटेलाल दलित को जिला अस्पताल में दोपहर करीब 1.30 बजे इलाज के लिए लाया गया था। सर्जन डॉ एके झा ने ब्लड ग्रुप व जरूरी जांचें सरकारी लैब में कराने के बाद उसका ट्रीटमेंट किया। इस दौरान उन्होंने जरूरत के चलते किशोरी को बी पॉजीटिव ग्रुप की दो बॉटल खून की लगवाईं। लेकिन जब डॉ झा चले गए और तीसरी बॉटल की बारी आई तो ड्यूटी पर तैनात हड्‌डी रोग विशेषज्ञ डॉ पीके झा ने यह कह कर परिजनों को ब्लड बैंक से खून दिलाने को मना कर दिया कि पहले प्राइवेट लेब से जांचें कराओ। परिजनों ने रुपए न होने और सीनियर डॉ झा द्वारा जांच कराने की बात भी कही। लेकिन तीन घंटे तक डॉ माथुर ने ब्लड बैंक से खून की तीसरी बॉटल नहीं दिलाई। परिजन डॉ रेणु दुबे के पास भी गए। लेकिन बात नहीं बनी। आखिर में अस्पताल के ही कुछ कर्मचारियों से रुपए उधार लेकर परिजनों ने एक हजार रुपए की जांचें प्राइवेट लेब से कराईं। तब जाकर खून रिलीज करने के पर्चे पर डॉ माथुर ने हस्ताक्षर किए।

2 जिम्मेदार डॉक्टर की जगह निचले स्टाफ पर कार्रवाई

25 फरवरी 2018 को कुरावरमंडी अस्पताल में डिलेवरी के दौरान एक गर्भवती भावना प|ी धर्मेंद्र मंडलोई निवासी मोजीगांव का माइनर सीजर किया गया लेकिन टांके लगाने में पेट के भीतर कपड़ा छोड़ दिया गया। बाद में मामले का खुलासा होने पर परिजनों ने दूसरे डॉक्टर से इलाज कराया। इधर शिकायत के बाद सीएमएचओ ने एक एएनएसम मालती सेन को निलंबित करने के निर्देश दिए हैं। जबकि डिलेवरी व माइनर ऑपरेशन की जिम्मेदारी यहां पदस्थ डॉक्टर अनीता चौहान की है। जिले में यह पहला मामला नहीं जब जिम्मेदार चिकित्सा अधिकारियों की जगह निचले स्टाफ को निशाना बनाया गया हो। बीते 8 महीनों में ब्यावरा-राजगढ़ अस्पतालों में की गईं गंभीर लापरवाही के कारण मौत के 5 मामलों में स्वास्थ्य विभाग ने इसी तरह नर्सों व एएनएम को बेवजह शिकार बना, कार्रवाई के नाम पर लीपापोती की है।

सरकारी अस्पतालों में जांचें मुफ्त होती हैं। ऐसे में कोई भी डॉक्टर किसी पर जबरन प्राइवेट लेब में जांच कराने के लिए दबाव नहीं बना सकता। वहीं इन दोनों मामलों में जिन डॉक्टरों ने लापरवाही की है, उनकी जांच कराकर कार्रवाई करेंगे। - कर्मवीर शर्मा, कलेक्टर

हीमोग्लोबिन का लेवल देखने के लिए मैंने जांच कराने कहा था। बिना जांच के ज्यादा खून चढ़ाने से रिएक्शन हो सकता है। इसलिए मैंने कंसर्न लेने के बाद तीसरी बॉटल लगवाई। उन्हें प्राइवेट लेब में जांच के लिए नहीं बोला गया। - डॉ प्रदीप माथुर, हड्‌डी रोग विशेषज्ञ

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