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धर्म... प्राणी संसार परिभ्रमण के चक्र में भ्रमता रहता है

बुरहानपुर | आज पंचमकाल मे हम भले ही कर्मों की 148 प्रकृतियों का नाश कर सिध्द अवस्था को नहीं प्राप्त कर सकते, परन्तु...

Danik Bhaskar | Jun 04, 2018, 03:20 AM IST
बुरहानपुर | आज पंचमकाल मे हम भले ही कर्मों की 148 प्रकृतियों का नाश कर सिध्द अवस्था को नहीं प्राप्त कर सकते, परन्तु मुनि, आर्यिका, आदि दिगम्बर दीक्षा को धारण कर उस कर्म श्रृंखला को काटने का सदप्रयास तो कर ही सकते हैं। इस पंचमकाल में रहते हुए भी पुण्यशाली है जो हमें पूजा- विधान के माध्यम से उन भगवंतों की भक्ति कहने का सहल माध्यम है। कर्मों के उदय से ही प्राणी इस संसार परिभ्रमण के चक्र में भ्रमता रहता है और जब कभी उत्तम कुल,उच्च गोत्र, उत्तम शरीर आदि की प्राप्ति के बाद भी महान पुण्य का उदय आता है तब कहीं जाकर इन कर्मों को नष्ट करने का प्रय| करता है। उस दहन की विधी तपस्या करना है। अनशन आदि तप करने से आत्मा में कषायों का नाश हो शांति और सुख का अनुभव होता है|ये उदबोधन हस्तिनापुर के पंडित कमलेश शास्त्री ने राजपुरा जैन मंदिर में कर्म दहन मंडल विधान के अवसर पर दिए। कर्मदहन मंडल विधान के बारे में कहा की आठ खंड होते हैं, ज्ञानावरण कर्म के 5 अर्घ, दर्शनावरण कर्म के 9 अर्घ,वेदनीय कर्म के 2 अर्घ, मोहनीय कर्म के 28 अर्घ, आयु कर्म के 4 अर्घ, नाम कर्म के 93 अर्घ, गोत्र कर्म के 2 अर्घ और अन्तराय कर्म के 5 अर्घ एेसे अलग- अलग भेद करने पर यह कुल 148 कर्म हो जाते हैं| नितिन जैन ने बताया स्व.सुरेशचंद खुबचंद जैन की पुण्य स्मृति में कर्म दहन मंडल विधान पूजा राजपुरा स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर मे सुबह 7.30 बजे इन्द्र सुशील जैन ,स्नेहल जैन, सुहास जैन ने श्रीजी पंचामृत अभिषेक, शांतिधारा,पंड़ित कमलेश शास्त्री ने विधी विधान से संपन्न कराया| नित्य नियम पूजा पश्चात विधान पूजा कि गई| मंडल विधान की रचना रांगोली से कि गई।