हर धर्मग्रंथ की भ्रांतियों से उलझे जीवन का पा रहे समाधान, इसलिए विश्वविद्यालय का नाम पड़ा कबीर निर्णय मंदिर

Nov 13, 2019, 07:05 AM IST
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भास्कर संवाददाता | बुरहानपुर

सूर्यपुत्री ताप्ती नदी के नागझिरी तट स्थित श्री कबीर निर्णय मंदिर। यह संत कबीर के पारख सिद्धांत का विश्व का पहला विश्वविद्यालय है। यहां हर धर्मग्रंथ से उलझे जीवन का समाधान मिलता है, भ्रांतियों को दूर कर सही-गलत का निर्णय होता है, इसीलिए इस विश्वविद्यालय का नाम कबीर निर्णय मंदिर पड़ा। हर साल यहां से लाखों साधक जीवन के असल सिद्धांत काे परख कर जाते हैं।

कबीर निर्णय मंदिर के 10वें गादीपति महान साहेब जी हैं। वे इस विश्वविद्यालय का संचालन कर रहे हैं। उनसे पहले यहां आठ गादीपति हजारों साधकों को असल जीवन का सिद्धांत बता चुके हैं। महान साहेब ने बताया विश्व में पहले से जो दार्शनिक सिद्धांत चले आ रहे हैं, सद्गुरु श्री कबीर साहेब ने उनमें सही और गलत का निर्णय किया है। सरल अर्थ में कहे तो धर्मग्रंथ की भ्रांतियों को दूर किया है। यहां साधकों को विभिन्न धर्मग्रंथों का अध्ययन कराया जाता है। इनकी भ्रांतियों को दूर कर ग्रंथों के सिद्धांत से परख कराई जाती है। 182 साल में यहां से हजारों साधक साधु बनकर निकले हैं, उन्होंने यहां रहकर बीजक के गूढ़ रहस्य से जीवन को परखा है। वे अब संत कबीर के सिद्धांत काे दुनियाभर में फैला रहे हैं।

कबीर निर्णय मंदिर के 10वें गादीपति महान साहेब साधकों की जीवन की समस्याओं का समाधान बता रहे।

भक्ति का अर्थ है सेवा, सिर्फ पूजा-पाठ नहीं- संत महेश

मंगलवार से श्री कबीर निर्णय मंदिर में चार दिनी मेले की शुरुआत हुई। सुबह 5.30 बजे से साधकों ने बीजक का पाठ कर आराधना की। 11 बजे से प्रवचन हुए। इसमें संत महेश साहेब ने कहा भक्ति का अर्थ सेवा से है। यही सबसे बड़ा धर्म माना जाता है। सिर्फ पूजा-पाठ भक्ति नहीं है। भक्ति नहीं करने का जीवन में कोई बहाना ही नहीं है। क्योंकि जिस व्यक्ति के तन (हाथ-पैर), धन नहीं है, वो व्यक्ति मन और वचन से सेवा कर सकता है। जो व्यक्ति तन और धन से संपन्न है, वो दोनों तरह से सेवा कर सकता है। अभी हमारे पास समय है। इसका हर हाल में सदुपयोग कर लो। समय निकल गया तो कुछ नहीं बचेगा।

नागझिरी तट स्थित श्री कबीर निर्णय मंदिर। रंगरोगन के बाद खूबसूरती झलक रही है।

कबीर निर्णय मंदिर के देशभर में 50 से ज्यादा आश्रम

कबीर निर्णय मंदिर के देशभर में करीब 50 से ज्यादा आश्रम हैं। नेपाल में भी करीब आधा दर्जन से ज्यादा आश्रम संचालित हैं। इनके अलावा सैकड़ों साधकों ने व्यक्तिगत शाखाएं खोल रखी हैं। वे किसी प्रकार का प्रचार-प्रसार नहीं करते, बल्कि लोग ही यहां जीवन का सिद्धांत जानने पहुंच रहे हैं। आचार्य महान साहेब जी ने बताया संत कबीर ने बीजक की रचना की। उसके बाद 450 साल तक सभी मौखिक ही टीका कर पाए हैं। पुस्तक रूप में पहली बार पूरण साहेब ने टीका किया है। प्रथमाचार्य पूरण साहेब सांसारिक जीवन छोड़कर बुरहानपुर पहुंचे थे। आज जहां आदिल शाह-नादिर शाह का मकबरा है, जंगल में कंद-मूल खाकर उन्होंने बीजक का अर्थ शुरू किया। जब बुरहानपुर के लोगों ने उनका महत्व समझा तो उन्हें नागझिरी तट पर झोपड़ी बनाकर बैठाया। यहीं पर पूरण साहेब असल शिक्षा का उपदेश देते थे।

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