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द्वितीय विश्वयुद्ध के गोरिल्ला अभ्यास का अनुभव करने बुंदेलखंड के जंगलों में उतरे सेना के जवान

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापानी सेना से मात खाने के बाद तत्कालीन एलाइट फोर्सेेस (अंग्रेज सरकार के अधीन भारतीय...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 02:00 AM IST

द्वितीय विश्वयुद्ध के गोरिल्ला अभ्यास का अनुभव करने बुंदेलखंड के जंगलों में उतरे सेना के जवान
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापानी सेना से मात खाने के बाद तत्कालीन एलाइट फोर्सेेस (अंग्रेज सरकार के अधीन भारतीय सैन्य दल) ने बुंदेलखंड के जंगलों में गोरिल्ला युद्ध की प्रैक्टिस की थी।

करीब 6 महीने तक सैकड़ों किमी के जंगल-पहाड़ और नदियों को पार करने के इस सैन्य अभ्यास के बाद एलाइट फोर्सेस ने सन 1943 में बर्मा बार्डर पर युद्ध किया और जापानियों को पराजित कर दिया। उस समय इस अभियान को चिंडित्त (बर्मा का एक धार्मिक चिन्ह, जिसका आकार शेर और ड्रैगन से मिलकर बना है ) नाम दिया गया था। इस साल इस चिंडित्त अभियान की 75 वीं वर्षगांठ है। इस उपलक्ष्य में भारतीय सेना की 31 आर्मर्ड डिविजन ने इस स्पेशल ट्रेनिंग को याद करते हुए बुंदेलखंड के जंगलों में 400 किमी का पैदल मार्च किया है। 16 फरवरी को बबीना (झांसी) से शुरु हुआ अभियन 9 मार्च को तेंदूखेड़ा के डोंगरगांव में समाप्त होगा।

बर्मा जैसी थी आबोहवा : कर्नल आकाश पांडे ने बताया कि जापानी गोरिल्ला युद्ध में माहिर थे। अंग्रेजों के अधीन उस समय की भारतीय सेना ऐसे युद्ध लड़ने में सिद्धहस्त नहीं थी। अंग्रेज सैन्य अफसर ब्रिगेडियर आॅर्ड विंटेज ने सैकड़ों की संख्या में झांसी, ललितपुर, सागर, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना और दमोह के जंगली रास्ते में यह ट्रेनिंग कराई।

जंगली जानवरों के बीच गुजार रहे रात

अभियान में सेना के 100 जवान शामिल हैं। जो 75 साल पहले उपलब्ध संसाधनों के जरिए जंगल में चल रहे हैं। उदाहरण के लिए ये लोग रस्सियां बांधकर नदियां पार करत हैं तो रात के समय जंगली जानवरों से बचने के लिए आग जलाते हैं। इसके लिए उन्हें सांप, जंगली छिपकलियां आदि मारने की भी ट्रेनिंग दी जा रही है। स्टेशन हैड क्वार्टर में पदस्थ कर्नल मुनीष गुप्ता ने बताया कि यह दुरुह ऑपरेशन रहा होगा। अभियान में शामिल सदस्यों को रास्ते में तेंदूआ, रीछ का भी सामना करना पड़ा। लेकिन सैनिक उन्हें बिना कोई नुकसान किए आगे बढ़ते रहे।

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