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गेहूं की बंपर फसल आने की आशा से बड़ी मात्रा में समर्थन भावों पर खरीदी की जाए
समर्थन भाव से कम पर बिकने पर बोनस अनिवार्य हो
इस सीजन में देश भर में गेहूं की बंपर फसल उतरने की आशा है। ऐसी स्थिति में मंडियों में गेहूं के भाव समर्थन से नीचे बिकना तय हैं। सरकार को किसानों को घाटे से बचाने के लिए अधिकतम मात्रा में खरीदी करना चाहिए अन्यथा बंपर उत्पादन किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है। मप्र में इस वर्ष गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन होने की आशा है। अत: खरीदी लक्ष्य गत से अधिक तय किया जाना चाहिए। हाल ही में देश के कुछ भागों में ओलावृष्टि एवं वर्षा से कुछ नुकसानी हो सकती है, किंतु एकंदर में गेहूं सहित सभी फसलें रिकॉर्ड उतरने की पूर्ण संभावना व्यक्त की जा रही है। मप्र में समर्थन भाव से खरीदी संभवत: 25 मार्च से होगी जबकि 16 मार्च से आवक का दबाव एकदम बढ़ जाएगा। संभव है उत्पादक मंडियों में गेहूं 1700 रुपए बिक जाए। समर्थन भाव से कम पर बिकने पर राज्यों को बोनस देने की अनुमति दी जाना चाहिए और किसानी कर्ज माफी को हमेशा के लिए बंद किया जाना किसान वर्ग, बैंक एवं सरकार के लिए लाभदायक सिद्ध होगा।
राहत नीति से गोदाम भरे हैं
राज्य सरकार बोनस नहीं दे सकती है क्योंकि केंद्र सरकार ने रोक लगा रखी है। गेहूं भी एक सीमित मात्रा में खरीदी के निर्देश दिए जाएंगे। ऐसी स्थिति में किसानों को उनके उत्पादन का वाजिब मूल्य कब एवं कैसे मिलेगा यह विचारणीय है। ऐसी स्थिति में किसानों की आय दोगुनी करने के बजाय आधा होने के आसार नजर आ रहे हैं। यह भी सही है कि खाद्य निगम के गोदाम गेहूं- चावल से भरे पड़े हैं। इसके पीछे केंद्र सरकार की रणनीति जवाबदार है। पिछले महीनों में दीपावली से भाव घटाकर बेचवाली की जाती तो बड़ी मात्रा में स्टॉक हल्का हो सकता था। खाद्य निगम फिर से बड़ी खरीदी के लिए तैयार हो सकता था। इस वर्ष पंजाब- हरियाणा से तो पूरी मात्रा में खरीदी की जाएगी, किंतु मप्र एवं राजस्थान में उस अनुपात में नहीं। बदली हुई परिस्थितियों में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर अन्य राज्य जहां गेहूं का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, वहां कम मात्रा में खरीदी का क्या उद्देश्य है, जबकि मप्र- राजस्थान में हरियाणा पंजाब से अच्छी क्वालिटी के गेहूं का उत्पादन होता है। यह गेहूं निर्यात श्रेणी में भी आता है।
लगभग सभी फसलें बेहतर
खरीफ के सीजन में इंद्र देव ने जो कहर ढहाया था, उसका मुआवजा रबी में किसानों को मिल रहा है। इस वर्ष रबी सीजन में सिंचाई के लिए पानी की पर्याप्त व्यवस्था रही, बोवनी के समय खेती में नमी पर्याप्त मात्रा में थी, उसके बाद अभी तक मौसम अनुकूल बना रहा। इससे न केवल गेहूं वरन् लगभग सभी फसलें बंपर उतरने की आशा व्यक्त की जा रही है। हाल ही में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के कुछ भागों में बेमौसम वर्षा एवं ओलावृष्टि से फसलों को कुछ नुकसान हुआ है। वास्तविक नुकसान दो-चार दिन बाद ही पता चल सकेगा फिर भी इस बार जितनी अधिक मात्रा में उत्पादन हो रहा है, उस अनुपात में यह नुकसान नहीं के समान हो सकता है। सामान्यत: दोनों सीजन में देश के किसी न किसी भाग में कुछ न कुछ नुकसान तो प्रति वर्ष होता है। इस बार अभी तक मौसम अनुकूल था, कुछ भागों में बिगड़ रहा है। पंजाब-हरियाणा एवं राजस्थान में फसलें मार्च अंत या अप्रैल में आएगी। यदि फसलें अधपकी है और केवल वर्षा हुई है, तो नुकसानी के बजाय लाभ ही होगा।
सरकारी खरीदी 25 मार्च से
बताया जाता है कि समर्थन भाव पर खरीदी 25 मार्च से शुरू होगी, किंतु मप्र के अनेक भागों में होली त्योहार बाद आवक का दबाव बढ़ जाएगा। जब तक खरीदी शुरू नहीं होगी, गेहूं पानी के भाव बिकने लगेगा। यह भी उल्लेखनीय है कि छोटे किसानों का माल ही अधिक मात्रा में सबसे पहले मंडियों में आता है। अत: 25 मार्च से खरीदी का सर्वाधिक नुकसान छोटे किसानों को होगा। खाद्य निगम को खरीद-बिक्री की तारीख पंजाब-हरियाणा को देखकर तय नहीं करना चाहिए। मप्र, गुजरात में फसलें पहले आती हैं। पंजाब- हरियाणा में कटाई भी देरी से होती है। 14 अप्रैल के बाद कटाई का व्यवस्थित कार्य शुरू होता है, जबकि मप्र की आधी फसल मंडियों में आ चुकी होती है। खाद्य निगम को खरीदी की तैयारी राज्यों में आने वाली फसलों को देखकर करना चाहिए। खाद्य निगम एवं सरकार अड़ियल नीति या लकीर की फकीर वाली नीति से अलग हटकर नीतियां बनाए। जमाना बदल चुका है। अत: कार्य प्रणाली भी बदलना होगी।
बोनस देने से एतराज क्यों?
यदि किसी राज्य में समर्थन भाव से कम कीमत पर गेहूं की बिक्री होती है, उस बिक्री पर राज्य सरकार 100-200 रुपए प्रति क्विंटल का बोनस देती है, तब केंद्र सरकार को हर्ज क्यों होना चाहिए। किसानों की आय दोगुना करने का बीड़ा सिर्फ केंद्र सरकार ने उठाया है। यदि उठाया है, तब भी स्वागत योग्य है, किंतु किसानों को राज्यों से भी अतिरिक्त मदद मिल जाती है, तो हर्ज क्या है? अंतत: को दोनों हाथों से सहायता करना चाहिए। बंपर उत्पादन के बाद खरीदी की मात्रा तय करना किसानों के साथ खुला अन्याय है। होना यह चाहिए कि रिजर्व बैंक अथवा केंद्र सरकार को यह नियम बनाना चाहिए कि कर्ज माफी वाली शर्त को हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए। कर्ज माफी से कई उत्पादक बेता फायदा उठाते हैं। बैंकों को परेशानी होती है, वह अलग से। कर्ज माफी पर देशव्यापी लगाम लगातार उत्पादन बढ़ाने के लिए विकसित बीज, खाद्य, मिट्टी परीक्षण उत्पादन के बाद बिक्री की बेहतर व्यवस्था एवं पूर्ण मूल्य दिलाने के प्रयास किए जाने चाहिए।
डॉलर चना एवं गेहूं में मंदी
इंदौर | डबल डॉलर चने की आवक नए की 8 हजार एवं 1200 बोरी पुराने की रही। मांग लगातार कमजोर पड़ने से भावों में गिरावट का दौर जारी है। जानकारों का कहना है कि अगले सप्ताह आवक बढ़ने पर भावों में और भी गिरावट आ सकती है। डॉलर की निर्यातक फर्में कोर्ट में गई हैं। देखना है उनके बारे में क्या राहत मिलती है। इंदौर मंडी में 3500 बोरी की आवक रही। नीलामी में डॉलर 3800 से 5200 रुपए। कुछ ट्रालियां 5120, 5190, 5285, 5360 एवं 5420 रुपए बिकी। कंटेनरों में डॉलर 42X44-5900 रुपए, 44X46-5700 रुपए, 58X60-4800 रुपए। चने के भाव भी लटकते जा रहे हैं। लेवाली का अभाव बना हुआ है। अन्य दलहनों में कामकाज कमजोर रहा। दालों में मांग कम है। अंडर टोन मंदी सूचक ही बताया जा रहा है। आगे-पीछे दालों के भाव घटना लगभग तय माना जा रहा है। इंदौर मंडी में 12 हजार बोरी की आवक रहने के साथ भावों में 100 रुपए की गिरावट आ गई। मालवराज ऊपर में 2200 रुपए और बेस्ट क्वालिटी का गेहूं 2100 से 2125 रुपए रह गया।
चना कांटा 3850 से 3900 देशी 3800 तुअर मप्र 4700 से 4900 तुअर महाराष्ट्र 5000 से 5050 मसूर 4400 मीडियम 4150 मूंग 6500 से 7000 बेस्ट 7600 से 7800 उड़द हलका 5500 से 6200 बेस्ट 6500 से 6700 रुपए। चना दाल चलनसर 4750 मीडियम 4900 बोल्ड 5050 मार्केवाली 5150 तुअर दाल फूल 7500 से 7600 मार्केवाली 7900 मसूर 5600 से 5800 उड़द दाल 7200 से 7500 बोल्ड 8300 से 8400 मोगर 8600 से 8800 बोल्ड 9400 से 9500 मूंग दाल 8700 से 8900 बोल्ड 9300 से 9400 मोगर 9600 से 9700 बोल्ड 9900 से 10100 रुपए। गेहूं मिल क्वालिटी 1750 से 1800 लोकवन-पूर्णा 1850 से 2100 मक्का 1525 से 1550 रुपए।
अर्जेंटीना में मक्का का उत्पादन 5 करोड़ टन होने की संभावना
नई दिल्ली | ब्यूनस आयर्स ग्रेन एक्सचेंज के अनुसार अर्जेंटीना में मक्का की पहली बोवनी सितंबर- अक्टूबर में होकर कटाई मार्च- अप्रैल में होती है, जबकि दूसरी बोवनी दिसंबर-जनवरी में होकर कटाई जून-जुलाई में होती है। उल्लेखनीय है कि अर्जेंटीना विश्व का तीसरा बड़ा मक्का उत्पादक एवं निर्यातक देश है। मक्का की बोवनी का क्षेत्र 63 लाख हेक्टेयर में प्रथम सीजन के दौरान 1 प्रतिशत कटाई का कार्य हो सकता है। वर्ष 2019-20 के दौरान अर्जेंटीना में पिछले वर्ष 5.60 करोड़ टन का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था। इस वर्ष 5 करोड़ टन होने की आशा है।
अर्जेंटीना में दिसंबर में नई सरकार आने के बाद निर्यात 6.7 प्रतिशत बढ़कर 12 प्रतिशत कर दिया था, लेकिन पूर्व निर्यात शुल्क बढ़ने की संभावना से उत्पादक तेज गति से माल की बिक्री कर रहे हैं। सीजन के प्रारंभ से अभी तक 1.94 करोड़ टन की बिक्री कर चुके हैं। वर्ष 2019-20 में मक्का का निर्यात पिछले वर्ष के मुकाबले घटकर 3.35 करोड़ टन होने का अनुमान है।
आने वाले दिनों में मंडियों में विवाद खड़े होना संभव
मप्र की मालवा क्षेत्र की मंडियों में नए गेहूं की आवक की शुरुआत हुई है। यह शुरुआत कुल उत्पादन का केवल 5 प्रतिशत है। उसके बाद मंडियों में गेहूं के भाव घटकर 1800 रुपए हो गए हैं। मालवा- निमाड़ की मंडियों से गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे उपभोक्ता राज्य लगे हुए हैं। उसके बाद गेहूं के भाव अभी से समर्थन भाव से नीचे बिकने लगा है। मप्र के अन्य सेंटरों पर आवक बढ़ने के बाद भावों की क्या स्थिति बनेगी यह कल्पना करना कठिन है। इसके अलावा मप्र में गेहूं की बोवनी रिकॉर्ड स्तर पर हुई है। अत: कुल उत्पादन 120 से 130 लाख टन के करीब होने की आशा है। यदि केंद्र सरकार ने पूरी ताकत में मप्र का गेहूं नहीं तुलाया तो वर्षों बाद उत्पादकों की फजीहत होने वाली है। मंडियों में आए दिन किसान, मंडी कर्मचारी एवं व्यापारियों के बीच जमकर विवाद होंगे। इन विवादों को रोका नहीं जा सकेगा।
उत्पादन अधिक
लिची। तमिलनाडु के थिरूचिरापल्ली जिले में खाद्यान्न का उत्पादन निर्धारित लक्ष्य से अधिक होगा, जबकि बोवनी का क्षेत्र 9 हजार हेक्टेयर कम हुआ है। कावेरी नदी से पानी की अच्छी आपूर्ति की वजह से सिंचाई पर्याप्त मात्रा में हो सकी है। इसके अलावा मौसम फसलों के एकदम अनुकूल रहा है। जिले में 48 हजार हेक्टेयर में सांबा धान की खेती हुई है। इस वर्ष किसान दलहन की खेती से दूर रहे। कुल बोवनी 1.19 लाख हेक्टेयर की बजाय 1.10 लाख हेक्टेयर में हो सकी थी। जिले में खाद्यान्न लक्ष्य 4.5 लाख टन का रखा था।
मप्र, राजस्थान में पंजाब-हरियाणा के समान खरीदी हो
बेमौसम वर्षा और ओलावृष्टि से बड़ी नुकसानी नहीं
कर्ज माफी पर सख्ती से बंद करना किसान वर्ग के हित में