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अतिशय क्षेत्र नवागढ़ में 1959 से अब तक 114 प्रतिमाएं मिलीं, इस पर आज भी हो रही पीएचडी

Bhaskar News Network

Apr 17, 2019, 08:05 AM IST

Chhatarpur News - टीकमगढ़ से करीब 45 किमी दूर जैनों के तीर्थ स्थल अतिशय क्षेत्र नवागढ़ का इतिहास काफी पुराना है। यह वह क्षेत्र है जहां...

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टीकमगढ़ से करीब 45 किमी दूर जैनों के तीर्थ स्थल अतिशय क्षेत्र नवागढ़ का इतिहास काफी पुराना है। यह वह क्षेत्र है जहां आज भी जैन धर्म के प्रर्वतक भगवान ऋषभदेव से महावीर तक के बारे में जानकारी मिलती है। यहां 1959 से लेकर आज तक कई इतिहासकार लगातार खोज में लगे हुए हैं। वर्तमान में अर्पिता रंजन अभिलेख सहायक पुरातत्व विभाग लालकिला दिल्ली नवागढ़ की पुरातत्व विरासत पर कुंवर वीरसिंह विश्वविद्यालय आरा बिहार से पीएचडी कर रही हैं।

ब्रह्मचारी जयकुमार निशांत ने बताया कि नवागढ़ में आज भी कई प्राचीन कालीन की प्रतिमाएं मिल रही हैं। नवंबर 2018 में रुपसिंह गुर्जर के खेत से भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा मिली है। अब तक 114 मूर्तियां यहां खुदाई में मिल चुकी हैं। जिनमें से करीब 25 मूर्तियां ही साबुत मिली हैं, बाकी की मूर्तियां खंडित हैं।

पंडित गुलाबचंद पुष्प प्रतिष्ठाचार्य जब नावई ग्राम से निकले तो वहां उन्होंने एक ग्रामीण को इमली के पेड़ के नीचे एकत्रित पाषाण खंडों के पास नारियल भेंट करते हुए देखा, तो उनके मन में जिज्ञासा हुई कि इसका क्या कारण हो सकता है। इसके बाद अपने साथियों के साथ उस स्थान पर खनन करने पर कई खंडित एवं कुछ सांगोपांग जैन मूर्तियां प्राप्त हुईं। भूमि से दस फीट नीचे भौयरे में लगभग पांच फीट उत्तुंग जैन धर्म के अठारहवें तीर्थंकर अरनाथ भगवान की जिन प्रतिमा मिली।

अतिशय क्षेत्र नवागढ़ में खुदाई के दौरान मिली प्रतिमाएं।

इस तरह हुआ नवागढ़ का विकास

4 अप्रैल 1959 में अन्वेषित नवागढ़ को प्रसिद्धि प्राप्त हुई। जिसका क्रमिक विकास 1961 में गुलाबचंद पुष्प के साथ नीरज जैन सतना, नब्बी पठया, कन्हैयालाल मैनवार, हलकाई मैनवार, दयाचंद मैनवार एवं तेजीराम पठया ने स्थानीय समाज के सहयोग से जिनालय जीर्णोद्धार, संग्रहालय, आवास व्यवस्था के साथ किया। 1985 में मुनि नेमिसागर महाराज के पावन सान्निध्य में पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव भी किया गया। अब तक यहां पर आचार्य विद्यासागर महाराज, आचार्य देवनंदी, पद्यनंदी, विराग सागर, विशुद्धसागर, वर्धमान सागर, विभव सागर, विनिश्चय सागर महाराज, मुनि आदिसागर, सुधासागर, अभयसागर, समयसागर के साथ कई आर्यिका माता का आगमन हो चुका है।

नवागढ़ के प्रागैतिहासिक साक्ष्य : डॉ. गिरिराज कुमार, जनरल सेकेटरी रॉक आर्ट सोसायटी आॅफ इंडिया, दयालबाग इंस्टीट्यूट आगरा ने 29 जनवरी 1917 से इस क्षेत्र के 10 किमी में स्थित विभिन्न पहाड़ियों का सतत अन्वेषण करते हुए 2 लाख से 5 लाख वर्ष प्राचीन प्री, मिडिल एवं पोस्ट मेचुलियन काल के पाषाण औजार प्राप्त खोज निकाले। जो आज भी नवागढ़ के संग्रहालय में संग्रहित हैं। जयकुमार निशांत द्वारा 6 अक्टूबर 2014 को 6 से 8 हजार साल प्राचीन शैल चित्रों की श्रृंखला की खोज की गई। डॉ. भागचंद भागेन्दु सचिव मप्र शासन दमोह एवं हरिविष्णु अवस्थी इतिहासविद टीकमगढ़ के अनुसार फाईटोन पहाड़ी की जैन गुफाएं, जैन संतों की हजारों साल प्राचीन साधना स्थली हैं। डॉ. एमएनपी तिवारी एवं एसएस सिन्हा हिन्दू काशी विश्वविद्यालय वाराणसी ने यहां जैन पहाड़ी में स्थित कायोत्सर्ग मुद्रा एवं चरण चिन्हों को गुप्तकालीन पांचवी सदीं का बताया। उनके अनुसार यहां जैन संतों का तीसरी सदी से आवागमन होता आ रहा है। कच्छप शिला का शयन स्थल इसका साक्षी है।

खजुराहों के साथ विकसित हुआ नवागढ़ : चंदेलकाल में राज्यमान श्रेष्ठी पाहिल एवं उनके पौत्र महीचंद्र ने जहां खजुराहों मंे मंदिरों का निर्माण कराया, वहीं नवागढ़ में भी उन्होनंे मंदिरों का निर्माण कराया। इसके प्रमाण हैं मयूर पिच्छी चिन्ह वाली उपाध्याय परमेष्ठी की प्रतिमा, शास्त्र सहित उपाध्याय परमेष्ठी की प्रतिमाएं, तीर्थंकर पार्श्वनाथ की ताम्र प्रतिमाएं शामिल हैं। डॉ. बीबी खरबडे निर्देशक एनआरएलसी लखनउ के माध्यम से नवागढ़ में संग्रहित पुरातात्विक संपदा का रासायनिक संरक्षण साल 2017 एवं 2018 में पीके पांडे के निर्देशन में विशेषज्ञों के द्वारा जीर्णावस्था प्राप्त सौ से अधिक कलाकृतियों एवं मूर्तियों को संरक्षित किया गया। डॉ. आरके रावत डिप्टी डायरेक्टर झांसी एवं मानवेन्द्र सिंह कलेक्टर ललितपुर ने नवागढ़ मेें स्थित पहाड़ियों, विशेष गुफाओं, बावड़ियों के साथ कच्छप शिला, हेंगिंग रॉक, बैलैंस रॉक एवं पाषाण के मटके पर्यटन के दृष्टिकोण से संरक्षित किए।

पृथ्वीराज चौहान ने किया था नवागढ़ को ध्वस्त : नवागढ़ में संग्रहीत पाषाण अभिलेखों एवं मूर्ति शिल्प के अनुसार यहां मंदिरांे का निर्माण पूर्व प्रतिहार काल सातवीं सदी से होने लगा था। जिसका विशेष विकास चंदेल काल में हुआ। जिसकी साक्षी सन् 1066, 1131, 1138, 1145, 1490, 1589 से लेकर वर्तमान काल की जैन प्रतिमाएं हैं। मटकाटोर गुफा, बगाज की टोरिया, मुंडी टोरिया, फाईटोन पहाड़ी, सिद्धों की टोरिया, चंदेलकालीन बावड़ी, चंदेल कूप यहां की पुरातात्विक विरासत के साक्षी हैं। प्राचीन नंदपुर के रूप में विख्यात इस क्षेत्र का नामोल्लेख अतिशय क्षेत्र अहार के मूलनायक भगवान शांतिनाथ की प्रशस्ति तथा अतिशय क्षेत्र पपौरा के भौयरे में विराजमान प्रतिमा से प्राप्त होता है। डॉ. केपी त्रिपाठी अन्वेषक एवं इतिहास विद टीकमगढ़ ने बुंदेलखण्ड का बृहद इतिहास में उल्लेख किया है कि मदनपुर के अभिलेख सन् 1182 ई. में चंदेल शासक परमर्दी देव से युद्ध करते हुए पृथ्वीराज चौहान ने महोबा, लासपुर, मदनपुर के साथ नवागढ़ को भी ध्वस्त किया था। जिसके साक्षी संग्रहालय में विराजमान विशालकाय खंडित तीर्थंकर प्रतिमाएं हैं।

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