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सवाल: भाजपा राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर चुनाव में है, कांग्रेस खुलकर लोहा क्यों नहीं ले रही?

एक वर्ष पहले
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लोकसभा चुनाव की घोषणा से ठीक डेढ़ महीने पहले प्रियंका गांधी वाड्रा बतौर कांग्रेस महासचिव सक्रिय राजनीति में आईं। पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश और उसके बाद 7 राज्यों में पार्टी के लिए रैलियां और रोड शो कर रहीं प्रियंका मोदी सरकार की नीतियों और उनके राष्ट्रवाद के मुद्दे पर काफी मुखर हैं। सातवें और अंतिम चरण के प्रचार में व्यस्त प्रियंका से बात की भास्कर के राजनीतिक संपादक हेमन्त अत्री ने। संपादित अंश...

मौजूदा चुनाव में क्या मुद्दे होने चाहिए और क्यों? और क्या उन जरूरी मुद्दों पर बात हो रही है?

सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी का है। क्योंकि, बेरोजगारी 45 साल में सबसे अधिक है। दूसरा बड़ा मुद्दा है किसान और खेती पर संकट। किसान त्रस्त हंै। 5 साल में मोदी सरकार ने किसानों का शोषण किया है। किसान कर्ज में डूबा है। 13 हजार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। उन्हें उपज का दाम नहीं मिलता, तो 50% मुनाफा कब मिलेगा? ये मुख्य मुद्दे हैं, जो मोदी सरकार नहीं उठाएगी, क्योंकि उनके पास इनका कोई जवाब नहीं है।

भाजपा राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर चुनाव में है। कांग्रेस खुलकर लोहा क्यों नहीं ले रही है?

हम पूरी तरह लोहा ले रहे हैं। मैं हर भाषण में खुलकर कहती हूं कि इनका राष्ट्रवाद समझ से परे है। क्योंकि, इनका राष्ट्रवाद इनके अहंकार तक सीमित है। वो इस शब्द को सिर्फ एक नजरिये से देखते हैं। असली राष्ट्रवाद है देश से प्रेम। देश से प्रेम का मतलब है कि जनता से प्रेम और इसका मतलब है जनता का आदर करना। दलितों की पिटाई होती है और आप (मोदी) मौन रहते हैं। आपका साथी महिलाओं के लिए अपशब्द बोलता है, आप तब भी मौन रहते हैं। आप वचन देते हैं कि 2 करोड़ रोजगार हर साल देंगे। अब युवाओं से कह रहे हैं कि पकौड़े तलिए। यह राष्ट्रवाद नहीं हो सकता।

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। प. बंगाल में प्रचार की समय सीमा कम करने के आयोग के फैसले को कैसे देखती हैं?

आयोग संवैधानिक संस्था है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बार आयोग के कई फैसले निष्पक्ष नहीं हैं। आयोग से उम्मीद की जाती है कि वह ऐसा काम करे, जिससे लोगों का भरोसा कायम रहे। आयोग के लिए संवैधानिक दायित्व महत्वपूर्ण होने चाहिए, न कि किसी पार्टी या नेता के प्रति वफादारी। मौजूदा स्थिति त्रासद है।

आप रैलियों से ज्यादा रोड शो और नुक्कड़ सभाएं कर रही हैं। इंदिराजी का तरीका भी कुछ ऐसा होता था। यह महज इत्तेफाक है या रणनीति?

न इत्तेफाक है, न रणनीति। बड़ी-बड़ी रैलियांे में जो बैरीकेड लगते हैं, उनसे लोग मुझसे 40 फीट दूर हो जाते हैं। यह मुझे बिलकुल पसंद नहीं। मैं जनता से बात करने जाती हूं। उन्हें सुनना चाहती हूं। क्योंकि, एकतरफा भाषण देकर निकलने का कोई फायदा नहीं है।

आपके पिता और दादी को आतंकवाद ने लील लिया। आपके लिए आतंकवाद के क्या मायने हैं? और इसका समाधान क्या है?

आतंकवाद हिंसा है और जिसने हिंसा झेली है, वह इसे समझता है। मैं पिताजी से ज्यादा प्यार किसी से नहीं करती। 19 साल की थी, तो उनका शरीर टुकड़ों में घर लाई। इस तरह की हिंसा से गुजरने पर हिंसा की समझ बदल जाती है। इंसान को अपने अनुभव से यह सीख मिल जाती है कि हिंसा का प्रत्युत्तर सिर्फ अहिंसा है।

चुनाव से 3 महीने पहले आप आधिकारिक तौर पर राजनीति में आईं। भाजपा का सामना करने के लिए कहीं देर तो नहीं कर दी?

देरी हुई या नहीं, यह तो समय बताएगा। न आप इसका अनुमान कर सकते हैं, न मैं। मेरे हिसाब से जो भी होता है, सही समय पर होता है।

राॅबर्ट वाड्रा पर सरकार के रुख को कैसे देखती हैं?

देखिए, मेरे पति राॅबर्ट वाड्रा पर भाजपा सरकार ने राजनीतिक हमला किया है। आप देखें कि यह हमला कब बढ़ा? जब मैं राजनीति में आई। यही भाजपा का चरित्र है।

नरेंद्र मोदी जब राजीव गांधी या नेहरू पर बाेलते हैं, तो आपका क्या रिएक्शन होता है?

नरेंद्र मोदीजी की बातों से मेरे भीतर कोई भावना उभरती ही नहीं है, क्योंकि मुझे कोई रुचि ही नहीं है इस बात को लेकर कि मोदी मेरे पिता के बारे में क्या सोचते हैं। मेरे पिताजी की सच्चाई मैं जानती हूं। यह देश जानता है।

राहुल और प्रियंका की शख्सियत में फर्क और समानताएं क्या हैं? लोग कहते हैं कि प्रियंका सख्त और राहुल नरम स्वभाव के हैं...

राहुलजी बहुत आगे की सोचते हैं। मैं कभी-कभी क्षणिक मनोभाव में फंस जाती हूं। उनमें बहुत साहस है। उन्हें गुस्सा कम आता है। वो नफरत का जवाब प्रेम से देते हैं। मैं कभी-कभी क्रोध का जवाब क्रोध से भी दे देती हूं।

राहुल मार्शल आर्ट में ब्लैक बेल्ट, गोताखोर, पर्वतारोही, पायलट हैं | पढे़ं पेज-4 पर

प्रियंका का जवाब- आम लोगों की आवाज दबाना कहां का राष्ट्रवाद है... इनका राष्ट्रवाद अहंकार तक सीमित है

प्रियंका को गुस्सा कब आता है और उस पर काबू कैसे पाती हैं? विपश्यना का आपके व्यक्तित्व पर क्या असर पड़ा है?

विपश्यना व्यक्तित्व के अहं को मिटाने का साधन है। मैं अभी तक उस अहं को साधना से मिटाने के लिए प्रयासरत हूं।

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