सागर ने 100 साल पहले दिया था एकता और संघर्ष से गोकशी के खिलाफ संदेश

Chhatarpur News - जून 1920 में अंग्रेज सरकार ने सागर से करीब 10 किलोमीटर दूर भोपाल रोड स्थित ग्राम रतौना में आधुनिक पशुवध गृह यानि...

Feb 27, 2020, 08:21 AM IST
Khurai News - mp news sagar gave message against gokshi from unity and struggle 100 years ago

जून 1920 में अंग्रेज सरकार ने सागर से करीब 10 किलोमीटर दूर भोपाल रोड स्थित ग्राम रतौना में आधुनिक पशुवध गृह यानि कसाई खाना खोलने का प्रस्ताव किया। इस पशुवध गृह में 1400 पशु रोजाना काटे जाना थे। जिसमें ज्यादातर गायें ही थीं। इसके लिए एक कंपनी सेंट्रल प्रोविंसेज ट्रेनिंग एंड ट्रेडिंग कंपनी खोली गई। इसकी लागत करीब 40 लाख रुपए थी। इसका उद्ेश्य चमड़े के व्यापार को बढ़ाना था। जो तब जर्मनी के कब्जे में था। इस कंपनी ने रतौना कसाई खाने का आंरभिक प्रबंध कलकत्ता की मेसर्स सेंट डेवनपोर्ट एंड कंपनी को सौंपा। सेंट डेवनपोर्ट कंपनी के सुप्रीटेंडेंट मिस्टर जे डाइसन विदिन शा नियुक्त किए गए। कंपनी ने कसाई खाने के निर्माण के लिए धन जुटाने शेयर जारी किए और विदिन शा ने शेयर बेचने का दायित्व भी संभाला।

हितवाद समाचार में पहली बार छपा विज्ञापन

3 जुलाई 1920 को जबलपुर से प्रकाशित हितवाद समाचार पत्र में कसाई खाना खोलने वाली कंपनी का एक विज्ञापन छपा। इस विज्ञापन में कसाई खाना खोलने का पूरा प्रास्पेक्टस था। इसकी संपादकीय टिप्पणी में कंपनी से होने वाले लाभ का जिक्र किया गया। कंपनी का विज्ञापन कुछ अन्य समाचार पत्रों में भी छपा था।

843 एकड़ भूमि दी गई थी: मध्य प्रांत की सरकार ने डेवेनपोर्ट कंपनी को रतौना ग्राम की 843 एकड़ भूमि पशुवध गृह के लिए लगान पर दी। चमड़ा पकाने के लिए आसपास के जंगल का ठेका भी दिया गया। यहां तालाब निर्माण के लिए 77 हजार रुपए प्रस्तावित किए गए। तभी बीना कटनी रेल मार्ग पर रतौना तक पहुंचने के लिए रेल पटरी बिछाने का कार्य आरंभ हो चुका था। कंपनी का विज्ञापन छपने के बाद रतौना में 150 एकड़ में तालाब निर्माण शुरु करा दिया गया, जो रतौना में आज भी है। इसके साथ ही रतौना में कसाई खाना खोलने का सबसे पहला विरोध जबलपुर और सागर के दो मुसलमानों ने किया। जबलपुर से प्रकाशित उर्दू अखबार ताज के संपादक ताजुद्दीन ने कसाईखाने के विरोध में तीखा संपादकीय लिखा। जिसके कारण अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफतार कर जेल भेजकर उनकी आवाज को दबाने की कोशिश की।

कर्मवीर अखबार के कई अंक आंदोलन को ही समर्पित रहे: कर्मवीर के जुलाई 1920 से लेकर दिसंबर 1920 तक के अंक रतौना कसाईखाने के विरोध आंदोलन पर ही केंद्रित रहे। इसके साथ ही दादा चतुर्वेदी ने कसाईखाने के विरोध में जगह जगह आमसभाओं में भाषण दिए। उन्हें पं विष्णुदत्त शुक्ल, दीवान बहादुर वल्लभदास, काशीप्रसाद पाण्डेय सहित अन्य हस्तियों का सहयोग मिला। इसके बाद रतौना कसाईखाने के विरोध का आंदोलन प्रांत से देश व्यापी हो गया। महामना पं मदनमोहन मालवीय ने इसके विरोध में लिखा। बंबई, कलकता, लाहौर, अमृतसर सहित देशभर में कसाई खाना खोलने का तीव्र विरोध हुआ।

वंदेमातरम में छपे थे 53 लेख: दादा माखनलाल चतुर्वेदी लाहौर जाकर लाला लाजपत राय से मिले। दादा चतुर्वेदी ने लाला लाजपत राय को कसाईखाने से संबंधित पूरी जानकारी देते हुए इसके दस्तावेज सौंपे। लाला लाजपत राय ने अपने उर्दू दैनिक वंदेमातरम में रतौना कसाई खाने के विरोध में लगातार 53 लेख लिखे। इसके बाद पूरे देश में जबरदस्त हलचल मच गई। सितंबर 1920 में कलकत्ता कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था। लाला लाजपत राय को इस अधिवेशन की अध्यक्षता करनी थी। इस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के साथ साथ रतौना आंदोलन का प्रस्ताव भी रखा जाने वाला था। ब्रिटिश सरकार को जब इसकी जानकारी लगी तो सरकार घबरा गई। सरकार डर गई कि पहले से ही हिंदू मुस्लिम एकता के साथ देश भर में फैल चुके आंदोलन के बाद यदि कांग्रेस अधिवेशन में यह प्रस्ताव पास हो गया तो पता नहीं क्या होगा‌?

अब्दुल गनी ने कसाईखाना खोलने का तीव्र विरोध किया

इधर सागर में तब 25 साल के युवा भाई अब्दुल गनी ने कसाईखाना खोलने का तीव्र विरोध किया। उन्होंने प्रजामित्र अखबार में तो शीषर्क ही लिखा था रतौना कसाई खाने का सबसे पहले मैंने विरोध किया था। 12 जुलाई 1920 को मध्य प्रांत के चीफ कमिश्नर सर फ्रेंक जार्ज स्लाई के सागर दौरे की खबर अब्दुल गनी ने जबलपुर से प्रकाशित कर्मवीर में प्रकाशन के लिए भेजी जिसमें स्लाई द्वारा कसाईखाने के लाभ गिनाए गए थे जिससे इसके विरोध में आग भड़क गई। इसके बाद जबलपुर में रतौना कसाई खाने के विरोध की कमान दादा माखनलाल चतुर्वेदी ने संभाल ली थी। कर्मवीर में 17 जुलाई 1920 को गौ वध की सरकारी तैयारी शीषर्क से संपादकीय लिखकर इसका तीखा विरोध किया गया। अब्दुल गनी ने कर्मवीर के सागर संवाददाता के तौर कई लेख लिखे। जिसे दादा माखन लाल चतुर्वेदी ने प्रकाशित करने के साथ ही संपादकीय टिप्पणियां लिखीं। अब्दुल गनी ने समाचार पत्रों में लेखन के साथ ही गली गली गांव गांव घूमकर कसाई खाना खोलने के विरोध में अलख जगाई। इस कार्य को सागर के तत्कालीन नेताओं मास्टर बल्देवप्रसाद, स्वामी कृष्णानंद, केशव रामचंद्र खांडेकर, गोविंद दास लोकरस, फौदालाल जैन, भैयालाल तिवारी, कालीचरण तिवारी, मौलवी चिरागउद्दीन, रामकृष्ण पांडे, बाबू असफ खां सहित अनेक सेनानियों ने सहयोग देकर आगे बढ़ाया।

यह सम्मान भी पाए गनी ने

6 फरवरी 1982 को मप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा विशेष सम्मान।

टोटल रिकॉल: क्रांतिकारी भाई अब्दुल गनी

कत्लखाने में 1400 पशु रोजाना काटे जाने की थी योजना: अखबारों ने आंदोलन खड़ा किया, लोग साथ आए तो अंग्रेज सरकार को वापस लेना पड़ा था अपना फैसला

रतौना आंदोलन के 100 साल पूरे

जन्म: 1868 खुरई, जिला-सागर, निधन: 2 मार्च 1989

25 अक्टूबर 1988 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह द्वारा कौमी एकता के लिए विशेष सम्मान।

28 मई 1987 को तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा द्वारा प्रथम लाल बल्देव सिंह सम्मान।


फैसला वापस हुआ तो हिंदू-मुसलमानों
ने सागर में मनाई थीं खुशियां


इसके बाद तत्कालीन मध्य प्रांत सरकार के अधिकारियों का पं विष्णुदत्त शुक्ल को संदेश मिला कि रतौना में कसाईखाना खोलने की योजना वापस ले ली गई है। वे कांग्रेस के अधिवेशन में यह प्रस्ताव न रखें। इस तरह ब्रिटिश सरकार को रतौना कसाईखाना खोलने के मामले में झुकना पड़ा। सरकार की इस कड़ी शिकस्त से तत्कालीन स्वतंत्रता आंदोलन को भी बल मिला। सागर में इसकी जानकारी आते ही हिंदू मुसलमानों ने मिलकर खुशियां मनाईं। दादा माखन लाल चतुर्वेदी ने इसका श्रेय अब्दुल गनी को दिया तो अब्दुल गनी इसे दादा के कर्म का फल बताया।

सागर. देश में आज भी जब गाय काटने के नाम पर फसाद हो रहे हैं। माब लिंचिंग जैसी घटनाएं हो रही हैं। हिंदू-मुस्लिम की दृष्ट्रि से देखकर इसे सांप्रादायिक रंग दे दिया जाता है। ऐसे में 100 साल पहले सागर में जो कुछ हुआ था। उससे आज भी पूरा देश सबक और सीख ले सकता है। करीब 100 साल पहले सागर के रतौना मेंे ब्रिटिश सरकार ने आधुनिक पशुवध गृह यानि कसाईखाना खोलने का प्रस्ताव किया था। जिसमें करीब 1400 गायों को रोजाना काटा जाना था। इस प्रस्ताव का सबसे पहले विरोध दो मुसलमान युवकों ने किया था। सागर के प्रखर पत्रकार अब्दुल गनी चचा और जबलपुर के पत्रकार भाई ताजुद्दीन ने कसाई खाना खोलने के विरोध में आवाज उठाई और अपने अपने अखबारों में इसके खिलाफ लेख लिखे। दोनों पत्रकारों के विरोध के स्वरों को आगे बढ़ाते हुए पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने इसे कर्मवीर अखबार के माध्यम से प्रांत से राष्ट्रव्यापी बनाने में महती योगदान दिया। अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और सभी समाजों ने मिलकर ऐसा आंदोलन खड़ा किया कि ब्रिटिश सरकार को कड़ी शिकस्त मिली। अंग्रेजों को रतौना में कसाईखाना खोलने का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। इस साल जून में रतौना आंदोलन के 100 साल पूरे हो रहे हैं। ऐसे में रतौना आंदोलन और भी प्रासंगिक हो जाता है । (रिपोर्ट संकलन: प्रवीण पांडेय)

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