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अल्प समय में खाद्य तेलों में अकल्पनीय मंदी से छोटे और बड़े उद्योग घाटे की कगार पर

एक वर्ष पहले
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मार्च माह में 10.10 लाख टन खाद्य तेल का आयात

खाद्य तेल बाजार अकल्पनीय रूप से ढेर हो गए हैं। इस वजह से अनेक छोटे-बड़े उद्योग घाटे में चले गए हैं अथवा कगार पर खड़े हैं। कुछ व्यापारियों ने तो धंधा बंद कर दिया है, अथवा बदल दिया है। बड़ी तेजी के बाद इतनी बड़ी मंदी ने अधिक घाटा पहुंचाया है। कोरोना वायरस की वजह से मांग कम, मार्च क्लोजिंग, बाजार में अविश्वास की भावना, आम उपभोक्ताओं की क्रयशक्ति कमजोर, खाद्य तेलों में अभी तक मंदी का दौर जारी रहना आदि कारणों से इस उद्योग से संबंधित सभी व्यापारी परेशानी में पड़ गए हैं। अनेक पार्टियां कमजोर पड़ गई है अथवा पड़ती नजर आ रही है। मार्च माह में कुल 10.20 लाख टन खाद्य तेलों का आयात हो रहा है। इतनी कम मात्रा में आयात के बाद खपत नहीं हो रही है। वास्तव में क्रयशक्ति बढ़ाना चाहिए। संभव है रबी फसल का माल मंडियों में आने के बाद क्रयशक्ति में इजाफा हो। क्रूड तेल की मंदी ने खाद्य तेलों के भावों को अलग से मार की है। वर्तमान में कोरोना वायरस अथवा अन्य कोई वजह से वैश्विक अर्थ व्यवस्था में बिगाड़ आ गया है। फिलहाल इसमें सुधार के आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं।

अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर का अंत

कोरोना वायरस, बाजार में धन की तंगी, ग्राहकी का अभाव, क्रूड तेल के भावों में असोचनीय गिरावट से खाद्य तेलों के भाव पानी-पानी हो गए हैं। भाव वहां जाकर रुकेंगे इसकी कल्पना करना भी फिलहाल आसान नहीं है। राजनीतिक क्षेत्र इस घनघोर मंदी को चीन की चाल बता रहे हैं। अमेरिका-चीन के बीच पिछले डेढ़ वर्ष से ट्रेड वॉर चल रहा था और नए वर्ष के पूर्व चीन-अमेरिका के बीच समझौता भी हो गया था किंतु चीन में लुनार वर्ष के अवकाश के बाद परिस्थितियों में अचानक मोड़ आ गया। चीन में कोरोना वायरस फैलने के साथ कारखाने बंद कर दिए और आयात-निर्यात भी रोक दिया। विश्व के अन्य देशों को इसकी भनक भी नहीं लगने दी। कोरोना वायरस का पता चलने के बाद वैश्विक स्तर पर हलचल बढ़ गई। अनेक उद्योगों को ऐसे कच्चे माल की कमी पड़ने लगी, जो चीन पर आधारित थे। इसका खामियाजा आज भी न केवल भारत भुगत रहा है, वरन् विश्व के अनेक देश परेशानी का सामना कर रहे हैं. नए वर्ष के पूर्व चीन ने मलेशिया से इस कदर पाम तेल की खरीदी की कि भाव उच्च स्तर पर पहुंचा दिए थे।

भारत विरोधी बयान

सोया-पाम, सनफ्लावर तेलों में विश्वव्यापी तेजी आ गई थी। इस वजह से कम से कम भारत का उपभोक्ता तिलमिला गया था। मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री का भारत विरोधी बयान ने आपस में रंजिश पैदा कर दी थी। भारत सरकार ने परोक्ष-अपरोक्ष रूप से मलेशिया से सीपीओ की खरीदी पर भी रोक लगा दी। रिफाइन पाम तेल का आयात केवल लायसेंस के मार्फत होने का नियम बना दिया। हाल में 11 लाख टन के आयात लायसेंस जारी किए हैं, उनका उपयोग इंडोनेशिया में ही किया जा सकेगा अर्थात मलेशिया की हालत खराब करने की पूर्ण कोशिश की थी, किंतु चीन एवं 2020 में बायो डीजल में उपयोग लेने से बड़ा स्टॉक बचने की संभावना कम थी। इंडोनेशिया भी बड़ी मात्रा में पाम तेल अन्य देशों को बायो डीजल के लिए आपूर्ति कर रहा था, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों न केवल खाद्य तेल वरन् क्रूड तेल की भी बदल गई है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव इंडोनेशिया एवं मलेशिया पर पड़ेगा।

सोयाबीन के लेवाल गायब

मप्र की मंडियों में सोयाबीन 3500 से 3550 रुपए बिकने लगा है। प्लांट डिलीवरी भाव 3650 से 3750 रुपए रह गए हैं। बताया जाता है कि इस बार सोयाबीन प्लांटों के बजाय स्टॉकिस्टों के गोदामों में अधिक गया था। इससे स्टॉकिस्ट बुरी तरह से उलझ गए हैं। मालवा क्षेत्र एवं कुछ अन्य भागों में सोयाबीन की फसल खराब हो गई थी। जैसे आवक शुरू हुई खरीदी में स्टॉकिस्ट कूद पड़े। बड़ी मात्रा में माल गोदाम में भरकर बैठ गए। इसी बीच तेजी का दौर भी चला और प्लांट खरीदी भाव 4500 रुपए बोले जाने लगे। कुछ प्लांटों ने इन भावों पर काटा पीटी करके 4400 रुपए का भुगतान किया और कुछ तेजी की धारणा वाले स्टॉकिस्ट प्लांटों से माल वापस ले गए। स्टॉकिस्टों की धारणा थी कि सोयाबीन 5000 रुपए हो जावेगा। इसी धारणा से रोककर बैठे रहे। इसी बीच कोरोना वायरस के हल्ले से सोयाबीन के भाव घटते ही जा रहे हैं। वायदे वाले तो मानो कहर ढा रहे हैं। मंदी के सर्किट तक लगवा दिए हैं।

वैश्विक उत्पादन में वृद्धि

दूसरी ओर एक संस्था ने सोयाबीन उत्पादन में कमी के बजाय वृद्धि बता दी है। बताया जा रहा है कि किसान, स्टॉकिस्टों के पास बड़ी मात्रा में अभी भी स्टॉक है। इस स्टॉक पर खाद्य तेल के व्यापारियों के समान कितनी मात्रा में घाटा होगा, इसका अंदाज लगाना ही कठिन है। सोयाबीन का उत्पादन कम होने के बाद यदि किसानों को घाटा होता है, तो उन्हें अगले सीजन में इस फसल के बारे में सोचना चाहिए। मप्र में सोया प्लांटों की आर्थिक हालात पूर्व वर्ष जैसे नहीं रह गए हैं। वैश्विक स्तर पर सोयाबीन का उत्पादन बढ़ रहा है और सोया डीओसी भारत की अपेक्षा काफी सस्ती है। यदि भारत में सोयाबीन का उत्पादन अधिक हुआ तो सोया डीओसी की बिक्री कहां करेंगे। यदि डीओसी की बिक्री नहीं हुई तो सोयाबीन के लाभकारी मूल्य कौन देगा। वर्ष 2020 में सोयाबीन का उत्पादन अर्जेंटीना 540लाख टन, ब्राजील 1260 लाख टन वैश्विक स्तर पर 3410.8 लाख टन और वैश्विक स्तर पर 1020.40 लाख टन का एंडिंग स्टॉक है। अत: तेजी तो अब दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है।

आंध्र का उड़द 6321 रु. में बेचवाल

आंध्र में नए उड़द की आवक का दबाव बढ़ गया है। नए उड़द की बिक्री 20 फरवरी को 7500 रुपए में शुरू की थी। 12 मार्च को कृष्णा जिले का उड़द 6321 रुपए में मोटर बिल्टी में बेचवाल आ गए। इससे उड़द भावों में और भी मंदी के संयोग बताए जाने लगे हैं। चने के भावों में आंशिक नरमी रही। डबल डॉलर चने की आवक 9500 बोरी की रही। इसमें से 4000 बोरी की आवक इंदौर में हुई। नीलामी में डॉलर चना 4800 से 5200 रुपए। कुछ ट्रालियां 5165, 5190, 5250, 5280, 5300 रुपए बिक गई। कंटेनरों में डॉलर चना 42X44-5950 रुपए 44X46-5750 रुपए 58X60-4800 रुपए। तुवर के भाव 5000 से 5100 रुपए के बोले जाते हैं, किंतु लेवाल नहीं है। दालों में मांग नहीं के समान है। मूंग, उड़द के भाव स्थिर रहे। गेहूं की आवक 6-7 हजार बोरी की रही। मालवराज घटकर 2050 से 2100 मक्का 1450से 1500 रुपए के भाव रह गए।

चना कांटा 3850 से 3875 देशी 3750 तुअर मप्र 4700 से 4850 तुअर महाराष्ट्र 5000 से 5100 मसूर 4350 मीडियम 4100 मूंग 6500 से 7000 बेस्ट 7600 से 7700 उड़द हलका 5500 से 6200 बेस्ट 6400 से 6600 रुपए। चना दाल चलनसर 4700 मीडियम 4900 बोल्ड 5000 मार्केवाली 5100 तुअर दाल फूल 7500 से 7600 मार्केवाली 7900 मसूर 5650 से 5850 उड़द दाल 7200 से 7500 बोल्ड 8300 से 8400 मोगर 8600 से 8800 बोल्ड 9400 से 9500 मूंग दाल 8700 से 8900 बोल्ड 9300 से 9400 मोगर 9600 से 9700 बोल्ड 9900 से 10100 रुपए। गेहूं मिल क्वालिटी 1750 से 1800 लोकवन-पूर्णा 1800 से 2000 मक्का 1450 से 1500 रुपए।

कोरोना वायरस के प्रभाव से अनेक कृषि जिंसों के भाव टूटे

मुंबई| चीन एवं अन्य देशों में जैसे-जैसे कोरोना वायरस का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, कृषि जिंसों के भाव औंधे मुंह गिरते जा रहे हैं। चीन में खपत होने वाली वस्तुओं और औद्योगिक कृषि उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक एवं उपभोक्ता देश है लेकिन इस घातक रोग से बचने के लिए अनेक देशों से आयात-निर्यात रोक दिया है, लेकिन जान लेवा कोरोना वायरस वैश्विक कृषि कारोबार को काफी कुछ चोंटे पहुंचा चुका है और अभी भी पहुंचा रहा है।

चीन के प्रमुख कारोबारी शहर वुहान में इस वायरस के शुरुआती विस्फोट ने भारत की अनेक कृषि जिंसों की कीमतों में औसत रूप से 15 से 25 प्रतिशत की हानि पहुंचा चुका है। खाद्य तेल, हल्दी, जीरा, ग्वार, सोयाबीन आदि जिंसों में गिरावट आ चुकी है। कुछ कृषि अर्थशास्त्रियों का मत है कि चीन के साथ कारोबार रुकने से यह गिरावट एक माह पहले से ही शुरू हो गई थी। रबी कटाई का कार्य अब जोर पकड़ेगा। अत: इस माह में कीमतें कहां जाकर टिकेगी, यह कल्पना करना आसान नहीं है। इस समय चीन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष निर्यात सौदे नहीं होने से कारोबार ठप पड़ा है।

दोनों देशों की अर्थ व्यवस्था पर प्रभाव


सऊदी अरब एवं रसिया क्रूड के उत्पादन कटौती के पक्ष में नहीं है। सऊदी अरब उत्पादन बढ़ाने की बात कर रहा है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पाम तेल उत्पादक देशों पर पड़ेगा। अभी तक ये दोनों देश बायो डीजल कार्यक्रम में अपना उत्पादन खपा रहे थे। इस वर्ष और अधिक खपाने की योजना थी। अब सस्ता डीजल मिलने पर बायो डीजल का उपयोग कौन करेगा। सर्वाधिक उल्लेखनीय है कि कोरोना वायरस से खाद्य तेलों की खपत में गिरावट आ रही है। बायो डीजल में जाने वाला पाम तेल बड़ी मात्रा में बचेगा, उसका क्या होगा? गत वर्ष उत्पादन कम बताकर भावों में तूफानी तेजी ला दी थी। अब भाव कहां जाकर टिकेंगे, इसकी कल्पना करना कठिन है। अत: वर्तमान मंदी इन दोनों देशों की अर्थ व्यवस्था की कमर तोड़कर रख देगी। सोयाबीन का उत्पादन भी अधिक हो रहा है। सोया तेल में भी मांग कम है। पाम तेल के समर्थन में अन्य खाद्य तेल भी टूटते जा रहे हैं। इसका अंतत: प्रभाव भारतीय तिलहन उत्पादक किसानों पर पड़ना शुरू हो गया है।


मंडियों में फसलें आने के बाद क्रयशक्ति बढ़ना संभव

कोरोना वायरस से वैश्विक अर्थ व्यवस्था में बिगाड़

चीन की खरीदी निकलने पर स्थिति में सुधार की आशा

दो वर्ष खराब रहे

नई दिल्ली| भारत पिछले दो वर्षों से कृषि जिंसों के लिए कठिनाई का सामना कर रहा था। वर्ष 2017 एवं 2018 में मानसून की शुरूआत देरी से होना एवं 2019 में वर्षा सामान्य से 10 प्रतिशत अधिक होने से फसलों पर विपरित प्रभाव पड़ा था। वर्ष 2018 में वर्षा की कमी से पूरे वर्ष कृषि जिंसों के भाव तेज रहे थे। वर्ष 2019 में अतिवृष्टि ने पूरा मामला और खराब कर दिया था। वर्ष 2020 तक तेजी रही किंतु आयात-निर्यात नीति दोषपूर्ण एवं रबी फसलें बंपर उतरने से भावों में गिरावट का दौर शुरू हो गया है। सरकार को सस्ते भाव की कृषि जिंसों का स्टॉक करना चाहिए।
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