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यह है मरखेड़ा का सूर्य मंदिर,पुरातत्व विभाग की अनदेखी से प्रतिमाएं हो रहीं दुर्दशा का शिकार

3 वर्ष पहले
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मरखेड़ा का सूर्य मंदिर टीकमगढ़ से लगभग 20 किमी की दूरी पर है। इस मंदिर के विषय में जानकारी के लिए कोई भी सूचना पटल इस स्थान पर नहीं है। मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के अधीन यह मंदिर दुर्दशा का साक्षी बनता जा रहा है। शिखर आमलक युक्त इस मंदिर में लघु मंडप है, जो चार स्तंभों पर खड़ा है। गर्भ गृह में सूर्य की स्थानक प्रतिमा है। जिसका जल चढ़ाने के कारण क्षरण हो रहा है। मंदिर में स्थापित सभी प्रतिमाओं पर जल चढ़ाने से क्षरण हाे रहा है।

मंदिर के द्वार पट में मिथुन शाखा एवं पुष्प वल्लरी शाखा निर्मित है, इसके दोनों तरपऊ गंगा एवं यमुना नदी देवियों का परिचारिकाओं के संग स्थापन है। द्वार के सिरदल पर मुख्य सप्त अश्वरथारुढ भगवान सूर्य विराजमान हैं। उसके अतिरिक्त नवग्रह भी दिखाई देते हैं। इसके अतिरिक्त व्यालांकन भी है। भित्तियों में कुबेर, दिक्पाल, अश्वारुढ़ सूर्य, ब्रह्माणी, बारह अवतार, नृसिंह अवतार, स्थानक गणपति, निर्मांसा चामुंडा, कीर्तिमुख, अप्सराएँ, गंधर्व, दंडधर इत्यादि स्थापित हैं। प्रतिमा अलंकरण की दृष्टि से यह मंदिर समृद्ध है। इसके समक्ष एक प्राचीन कुंआ भी है। इसके अतिरिक्त कुछ प्रतिमाएं प्रांगण में भी रखी हुई हैं। भारत में सूर्य मंदिरों की संख्या कम ही है, परन्तु बुंदेलखंड में सूर्य मंदिर बहुत सारे हैं। टीकमगढ़ जिले में ही लगभग नौ सूर्य मंदिर बताए जाते है। बुंदेलखंड में वाकाटकों का शासन भी रहा है। मरखेड़ा के सूर्य मंदिर का निर्माण वाकटकों ने कराया था।

टीकमगढ़। मड़खेरा का सूर्य मंदिर।

भास्कर संवाददाता। टीकमगढ़

मरखेड़ा का सूर्य मंदिर टीकमगढ़ से लगभग 20 किमी की दूरी पर है। इस मंदिर के विषय में जानकारी के लिए कोई भी सूचना पटल इस स्थान पर नहीं है। मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के अधीन यह मंदिर दुर्दशा का साक्षी बनता जा रहा है। शिखर आमलक युक्त इस मंदिर में लघु मंडप है, जो चार स्तंभों पर खड़ा है। गर्भ गृह में सूर्य की स्थानक प्रतिमा है। जिसका जल चढ़ाने के कारण क्षरण हो रहा है। मंदिर में स्थापित सभी प्रतिमाओं पर जल चढ़ाने से क्षरण हाे रहा है।

मंदिर के द्वार पट में मिथुन शाखा एवं पुष्प वल्लरी शाखा निर्मित है, इसके दोनों तरपऊ गंगा एवं यमुना नदी देवियों का परिचारिकाओं के संग स्थापन है। द्वार के सिरदल पर मुख्य सप्त अश्वरथारुढ भगवान सूर्य विराजमान हैं। उसके अतिरिक्त नवग्रह भी दिखाई देते हैं। इसके अतिरिक्त व्यालांकन भी है। भित्तियों में कुबेर, दिक्पाल, अश्वारुढ़ सूर्य, ब्रह्माणी, बारह अवतार, नृसिंह अवतार, स्थानक गणपति, निर्मांसा चामुंडा, कीर्तिमुख, अप्सराएँ, गंधर्व, दंडधर इत्यादि स्थापित हैं। प्रतिमा अलंकरण की दृष्टि से यह मंदिर समृद्ध है। इसके समक्ष एक प्राचीन कुंआ भी है। इसके अतिरिक्त कुछ प्रतिमाएं प्रांगण में भी रखी हुई हैं। भारत में सूर्य मंदिरों की संख्या कम ही है, परन्तु बुंदेलखंड में सूर्य मंदिर बहुत सारे हैं। टीकमगढ़ जिले में ही लगभग नौ सूर्य मंदिर बताए जाते है। बुंदेलखंड में वाकाटकों का शासन भी रहा है। मरखेड़ा के सूर्य मंदिर का निर्माण वाकटकों ने कराया था।

टीकमगढ़ जिले में ही लगभग नौ सूर्य मंदिर बताए जाते है
अछरु माता मंदिर,जहां नौ देवियां विराजमान हैं
मंदिर एक कुंड के लिए भी प्रसिद्ध है, जो सदैव जल से भरा रहता है

टीकमगढ़-निवाड़ी रोड पर स्थित तहसील पृथ्वीपुर के पास मडिय़ा ग्राम से 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर स्थित अछरू माता का मंदिर है। इस पहाड़ी पर स्थित अछरू माता का मंदिर बहुत चर्चित है। मंदिर एक कुंड के लिए भी प्रसिद्ध है, जो सदैव जल से भरा रहता है। हर साल नवरात्रि के अवसर पर ग्राम पंचायत की देखरेख में मेला लगता है। जहां हजारों की संख्या में भीड़ आती है। जिसमें दूर-दूर से लोग आकर शिरकत करते हैं। माना जाता है कि इस कुंड से माता अपने भक्तों को कुछ न कुछ देती है जैसे गरी,दही,फल आदि। जिस भक्त को माता रानी के द्वारा (कुंड के माध्यम से) कुछ ना कुछ फल दिया जाता है उस का कार्य पूरा होता है। ग्राम मडिया,तहसील पृथ्वीपुर,जिला टीकमगढ़ में है। यहां मूर्ति नहीं है, एक कुंड के आकार का गड्ढा है। यहां चैत्र-नवरात्र में प्राचीनकाल से मेला लगता आ रहा है।

मंदिर में विराजी अछरू माता।

मंदिर एक कुंड के लिए भी प्रसिद्ध है, जो सदैव जल से भरा रहता है

टीकमगढ़-निवाड़ी रोड पर स्थित तहसील पृथ्वीपुर के पास मडिय़ा ग्राम से 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर स्थित अछरू माता का मंदिर है। इस पहाड़ी पर स्थित अछरू माता का मंदिर बहुत चर्चित है। मंदिर एक कुंड के लिए भी प्रसिद्ध है, जो सदैव जल से भरा रहता है। हर साल नवरात्रि के अवसर पर ग्राम पंचायत की देखरेख में मेला लगता है। जहां हजारों की संख्या में भीड़ आती है। जिसमें दूर-दूर से लोग आकर शिरकत करते हैं। माना जाता है कि इस कुंड से माता अपने भक्तों को कुछ न कुछ देती है जैसे गरी,दही,फल आदि। जिस भक्त को माता रानी के द्वारा (कुंड के माध्यम से) कुछ ना कुछ फल दिया जाता है उस का कार्य पूरा होता है। ग्राम मडिया,तहसील पृथ्वीपुर,जिला टीकमगढ़ में है। यहां मूर्ति नहीं है, एक कुंड के आकार का गड्ढा है। यहां चैत्र-नवरात्र में प्राचीनकाल से मेला लगता आ रहा है।

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