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भारी वाहनों में लापरवाही पर प्रशासन नहीं करता कार्रवाई, नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां

3 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता | पृथ्वीपुर

प्रशासन के नियमों को नगर के बस संचालक और अधिकांश स्कूलों के बस संचालक पलीता दिखा रहा है। पिछले साल शासन ने निर्देश जारी किए थे कि जब तक बसों में स्पीड गर्वनर नहीं होंगे। बसों को फिटनेश सर्टिफिकेट नहीं दिए जाएंगे। बावजूद इसके पृथ्वीपुर से झांसी और अन्य शहरों को जाने वाली बसों के संचालक प्रशासन के नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। जिस पर प्रशासनिक अधिकारी भी कुछ कार्रवाई नहीं करते हैं। ऐसे में स्कूल में लगी बसाें में बच्चों के साथ और यात्री बसों में यात्रियों के जान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। वहीं अगर देखा जाए तो इन वाहनों में जबरन सवारियों को ठूंसठूंस कर भर लिया जाता है। जिन पर पुलिस के आला अधिकारी भी ध्यान नहीं दे रहे हैं।

आरटीओ अधिकारी विमेलश गुप्ता का कहना है कि इस संबंध में बस संचालकों की मीटिंग लेकर उनको निर्देशित किया जाएगा। जिन स्कूल बसों में स्पीड गर्वनर नहीं हैं। उनमें लगवाएं जाएंगे। इसके अलावा यात्री बसों की भी जांच होगी। अगर प्रशासन के नियमाें को ताक पर रखकर बसें संचालित की जा रहीं हैं। तो उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी।

जिले के अधिकांश स्कूलों की बसों में न तो महिला अटेंडर नियुक्त हो पाई है और न ही सीसीटीवी कैमरे के साथ जीपीएस सिस्टम लग सका है। स्कूल बसों में सीसीटीवी कैमरे, महिला अटेंडर न होने से बच्चे स्कूल बस में अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हैं।

अब तक बस ऑपरेटर पर नहीं हुई कोई बड़ी कार्रवाई
नगर के लोगों का कहना है कि अक्सर स्कूल बसों की जांच पड़ताल तो हाेती है, लेकिन बस संचालक को सिर्फ हिदायत देकर छोड़ दिया जाता है। अगर बस संचालक और स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाती तो अब तक स्कूल बसों में महिला अटेंडर की नियुक्ति और सीसीटीवी कैमरे लग चुके होते। सुप्रीम कोर्ट के नियम के मुताबिक बस में महिला अटेंडेंट व सीसीटीवी कैमरे लगाना जरूरी है।

इसलिए रखना जरूरी है महिला कंडक्टर
बसों में पुरुष कंडक्टर होने के कारण छात्राएं अपने को असहज महसूस करती हैं। कई बार छात्राएं बस में शिकायत भी नहीं कर पाती। ऐसे में राज्य शासन ने पुरुष कंडक्टर के साथ महिला कंडक्टर रखना भी अनिवार्य किया था।

बसों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ये हैं निर्देश
Á बसों में का नाम व टेलीफोन नंबर लिखा होना चाहिए।

Á स्कूल वाहन पर पीला रंग होना चाहिए। जिसके बीच में नीले रंग की पट्टी पर स्कूल का नाम होना चाहिए।

Á जीपीएस होना चाहिए। खिड़कियों में आड़ी पट्टियां (ग्रिल) लगी हो।

Á ड्राइवर व कंडक्टर के साथ उनका नाम व मोबाइल नंबर लिखा हो।

Á सीसीटीवी भी होना चाहिए ताकि बस के अंदर की दुर्घटना के बारे में पता लगाया जा सके।

लोग ही नहीं है जागरूक
स्कूल से घर तक छोड़ने की जवाबदारी ड्राइवर-कंडक्टर की रहती है। बस लगा ली, लेकिन ड्राइवर और कंडक्टर इतने बेपरवाह रहते हैं कि बच्चों का ध्यान नहीं रख पाते हैं। सालभर में कई ड्राइवर बदल जाते हैं। यह लोगों में जागरूकता का ही अभाव है कि लोग स्कूल बसों में महिला अटेंडर नियुक्त करने के लिए स्कूल प्रबंधन पर दवाब नहीं बना पाते। हमने कुछ लोगों से जब इस संबंध में बात की तो लोगों ने बताया कि सीबीएसई नियमों के अनुसार बसों में लेडी अटेंडेंट तो अब तक नहीं देखी। बच्चों को बस से पुरुष कंडक्टर ही उतारते हैं। बसों में लेडी अटेंडेंट होती ही नहीं।

परिवहन नियमों का पालन नहीं कर रहे : निजी स्कूल सुप्रीम कोर्ट के आदेश और परिवहन नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं, जबकि शासन ने लोक शिक्षण संचालनालय के आदेश थे कि हर हाल में सभी स्कूल बसों में महिला कंडक्टर व सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। शहर की बात करें तो इक्का-दुक्का स्कूल बसों में ही लेडी कंडक्टर हैं।

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