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साढ़े 5 साल में मासूमों के साथ 511 अपराध, सिर्फ 91 में ही हो पाई सजा

दरिंदे जितेंद्र को फांसी की सजा के बाद बहस छिड़ी- आखिर क्यों बढ़ रहे ऐसे अपराध अंशुल वाजपेयी | ग्वालियर शादी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jul 30, 2018, 03:10 AM IST

साढ़े 5 साल में मासूमों के साथ 511 अपराध, सिर्फ 91 में ही हो पाई सजा
दरिंदे जितेंद्र को फांसी की सजा के बाद बहस छिड़ी- आखिर क्यों बढ़ रहे ऐसे अपराध

अंशुल वाजपेयी | ग्वालियर

शादी समारोह से अगवा कर छह साल की बच्ची से दुष्कर्म कर हत्या करने वाले दरिंदे जितेंद्र कुशवाह को फांसी की सजा के बाद यह बहस भी छिड़ गई है कि आखिर ऐसे मामले बढ़ क्यों रहे हैं? क्या अपराधियों में कानून का भय नहीं है? असल में इसकी जड़ में है ज्यादातर आरोपियों का कानून के फंदे से साफ बचकर निकल जाना। इसलिए समाज में घिनाैनी मानसिकता व इरादे रखने वाले अपराधी बेखौफ हैं और बच्चों के साथ ज्यादती की घटनाएं बढ़ रही हैं।

दैनिक भास्कर ने लैंगिक अपराध से बालक-बालिकाओं का संरक्षण अधिनियम-2012 (पॉक्सो) के मामलों की पड़ताल की तो चौंकाने वाली हकीकत सामने आई। गुजरे साढ़े पांच साल में ग्वालियर जिले में 511 अपराधों में महज 91 मामलों में आरोपियों को सजा हो पाई। शेष मामलों में आरोपियों के बचने के पीछे मुख्य वजहें पीड़िताें का बयान से पलटना और गवाही के दौरान आरोपी को पहचानने से इनकार कर देना है। जबकि कुछ मामलों में पुलिस द्वारा जांच में बरती गई लापरवाही के चलते आरोपी को संदेह का लाभ मिला। यह हाल तब है, जब इन मामलों की सुनवाई विशेष न्यायालय में होती है और एडीपीओ शासन की ओर से पैरवी करते हैं।

पीड़ित के बयान से पलटने व जांच में लापरवाही से बच रहे आरोपी

कानून के फंदे से इसलिए बच रहे आरोपी,2 वजहें

1. बयान से पलटना: अधिकांश मामलों में पीड़ित अपने बयान से मुकर जाते हैं। चूंकि नाबालिग पर अपने दिए गए बयान से मुकरने पर प्रकरण दर्ज करने का प्रावधान नहीं है। इसलिए उनके खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं हो पाती है और अारोपी बचकर निकल जाते हैं।

ये है उदाहरण: डीएनए जांच में लापरवाही से आरोपी काे संदेह का लाभ

वर्ष 2014 में कोर्ट ने 9 साल की बच्ची (निवासी डबरा पिछोर) की दुष्कर्म कर हत्या करने के आरोपी को बरी कर दिया था। क्योंकि जांच अधिकारी कोर्ट में ऐसा एक भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके जिससे अपराध साबित हो सके। पुलिस ने डीएनए सैंपल की जांच में गंभीर लापरवाही बरती थी। पुलिस ने आरोपी के वस्त्र पर लगे खून के दाग की तो जांच कराई लेकिन ये पुष्टि नहीं की कि वह खून मृतका का है अथवा नहीं? रिपोर्ट में केवल ये बात सामने आई कि यह मानव रक्त है। संदेह का लाभ देते हुए आरोपी को बरी कर दिया गया।

सही ढंग से जांच हो तो कोई आरोपी नहीं बचेगा

पॉक्सो एक्ट के मामलों की जांच में पुलिस को विशेष सावधानी बरतना चाहिए। यदि मामला दुष्कर्म का है तो मेडिकल साक्ष्य एकत्रित करने में प्रक्रिया का पालन करना चाहिए, वरना आरोपी पक्ष का वकील इसका फायदा उठा सकता है। डीएनए के सैंपल समय रहते जांच के लिए भेज देना चाहिए, अन्यथा वह डिसइंटीग्रेटेड हो जाते हैं। साथ ही रिपोर्ट भी समय पर नहीं आती। डीएनए रिपोर्ट पॉजिटिव आने की स्थिति में यदि गवाह अपने कथन से पलट भी रहे हैं तो भी आरोपी को सजा होगी।

-जैसा लोक अभियोजक जगदीश शर्मा ने भास्कर को बताया

पिछले साल 110 आरोपी बरी

2. जांच में लापरवाही: केस की विवेचना के दौरान बरती जाने वाली लापरवाही का लाभ आरोपी को ट्रायल में मिलता है। विशेष रूप से मेडिकल इंवेस्टिगेशन में बरती गई लापरवाही आरोपी को संदेह का लाभ दिलाती है।

83

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1

2013 2014 2015 2016 2017 2018

नोट: 320 मामले अभी कोर्ट में विचाराधीन हैं।

ऐसे मामलों की होती है समीक्षा

बच्चों और महिलाओं से संबंधित अपराधों में शत प्रतिशत आरोपियों को सजा दिलाने की कोशिश की जाती है। इसके लिए विवेचना अधिकारियों को साक्ष्य जुटाने से लेकर चालान पेश करने तक की ट्रेनिंग भी दी जाती है। समय-समय पर कोर्ट में निपटे मामलों की समीक्षा भी करते हैं। पॉक्सो के मामलों में आरोपियों के बरी होने की वजह पीड़ित पक्ष का बयान बदलना है। अंशुमान यादव, आईजी, जोन ग्वालियर

110

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बरी

सजा

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