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गृहस्थ जीवन में रहते हुए शुभ कर्म करते रहना चाहिए : पं. रवि शास्त्री

श्री देव जानकी रमण जी बूंदाबहू मंदिर में चल रही मासपारायण श्रीमद् भागवत कथा के 28 वें दिन की कथा सुनाते हुए कथा...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 02:25 AM IST
श्री देव जानकी रमण जी बूंदाबहू मंदिर में चल रही मासपारायण श्रीमद् भागवत कथा के 28 वें दिन की कथा सुनाते हुए कथा व्यास आचार्य पं. रवि शास्त्री महाराज ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को गृहस्थ में रहते हुए धर्म पूर्वक शुभ कर्म करते हुए जीवन यापन करना चाहिए।

कथा व्यास ने कहा कि परमात्मा श्रीकृष्ण उद्धव से कह रहे हैं कि गृहस्थ पुरुषों को बड़ा कुटुंब होने का अभिमान नहीं करना चाहिए। बुद्धिमान पुरूष को समझ लेना चाहिए की जैसे इस लोक की सभी वस्तुएं नाशवान हैं वैसे ही स्वर्गदि परलोक के भोग भी नाशवान हैं। श्री शास्त्री ने कहा कि जैसे स्त्री, पुरुष, भाई, बंधु, और गुरूजनों का मिलना जुलना है, यह वैसा ही है जैसे प्याऊ पर कुछ लोग मिलते और सब अलग अलग रास्ते चले जाते हैं। जैसे स्वप्न नींद टूटने तक रहता है। वैसे ही इन मिलने जुलने वालों का संबंध ही बस शरीर के रहने तक ही रहता है। उसके बाद कोई किसी को नहीं पूछता।

गृहस्थ को चाहिए कि इस प्रकार विचार करके घर गृहस्थी में फंसे नहीं, उसमें इस प्रकार अनासक्त भाव से रहे मानो कोई अतिथि निवास कर रहा हो जो व्यक्ति शरीर आदि में अहंकार और घर आदि में ममता नहीं करता है, उसे घर गृहस्थी के फंदे बंाध नहीं सकते। भक्तिमान पुरूष गृहस्थोचित शास्त्रोंक्त कर्मांे के द्वारा मेरी आराधना करता हुआ घर में ही रहे और यदि पुत्रवान हो तो उसे वानप्रस्थ आश्रम में चला जाना चाहिए। श्रीषास्त्री ने कहां कि परमात्मा श्रीकृष्ण उद्धव से कह रहे हैं कि जो लोग इस प्रकार का जीवन ना बिताकर केवल घर गृहस्थी में ही आसकत हो जाते हैं।

धन की कामनाओंं में फंसकर हाय हाय करते रहते और अज्ञानता बस अधर्म करते हैं वे बंध जाते हैं। वे सोचते रहते हैं हाय हाय मेरे मां बाप बूढ़े हो गए मेरे बच्चे अभी छोटे छोटे हैं। मेरे न रहने पर ये दीन अनाथ हो जाएंगें फिर इनका जीवन कैसे रहेगा। इस प्रकार घर गृहस्थी की वासना से उसका चित्र विक्षिप्त हो रहा है।