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गृहस्थ जीवन के पिता के देहांत की सूचना के बाद भी प्रवचन देते रहे मुनिश्री प्रबुद्ध सागर

एक वर्ष पहले
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उन्होंने अपने घर त्याग के समय का संस्मरण सुनाया

यह जीवन झणभंगुर है, कब मौत आ जाए कोई ठिकाना नहीं। मौत राजा रंक में भेद नहीं करती, लेकिन एक की मृत्यु निर्वाण में बदल जाती एक कि मौत में अंतर सिर्फ यह है जिसने अपने जीवन मे अच्छे कर्मों को करते हुए अपने जीवन का सदुपयोग किया। वह जाने के बाद भी अमर हो जाता है और दूसरा अपनी मौत पर पछताता है। ये बात आचार्यश्री विद्यासागर मुनिमहाराज के परम शिष्य मुनिश्री प्रबुद्ध सागरजी ने अपने ग्रहस्थ जीवन के पिताश्री के जबलपुर में देहावसान के अवसर पर अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए कही।

उन्होंने कहा अगर इंसान जीवन के रहते मौत को याद रखते हुए कार्य करे तो वह भटक नहीं सकता। वहीं जब वह जीवन की विलासिता में अपनी मौत को भूल जाता है तो बुरे कर्मों में फंसकर जीवन को व्यर्थ में गंवा देता है। उन्होंने आगे अपने घर त्याग के समय का संस्मरण सुनाते हुए कहा कि जब वह अपने घर को छोड़कर सन्यास मार्ग की ओर बढ़ रहे थे तो अंतिम समय में उन्होंने अपने पिताश्री के चरणस्पर्श किए तो वह भावुक तो हुए लेकिन प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान किया। और कहा तुम बहुत अच्छे मार्ग पर जा रहे हो जाओ। धन्य हैं ऐसे पिता जिन्हें ऐसा पुत्र मिला, जिसने संसार से तरने के लिए भरा पूरा संपन्न परिवार धन दौलत का त्याग कर कंटीले त्यागमय व कठिन मार्ग पर दिया। उन्होंने कहा प्रत्येक मनुष्य के जीवन का एक वह क्षण होता है। जब उसकी साधना की परीक्षा होती है। वह अपनों के विछोह पर होती है। जब मुनिश्री को अपने गृहस्थ जीवन के पिताश्री के देवलोक गमन के समाचार मिला, तो बगैर विचलित हुए अपने शिष्यों को कल्याण के मार्ग का उपदेश दिया और कहा अपने जीवन के रहते ऐसे कर्म करते रहना चाहिए। इसके न रहने पर कोई पछतावा न हो यह एक संत की ही साधना का परिणाम है। गौरतलब है कि जबेरा में विराजमान मुनिश्री प्रबुद्ध सागरजी मुनिमहाराज के गृहस्थ जीवन के पिताश्री प्रबोधचंद जैन विद्यार्थी 86 का जबलपुर में अपने पूरे परिवार के साथ निवास करते हुए 13 मार्च को सुबह देहावसान हो गया था।

अपने पापों का प्रायश्चित करना ही प्रतिक्रमण: संजय भैया

पथरिया| नगर में चल रहे सिद्धचक्र महामंडल विधान के सातवें दिन 512 अर्घ्यों के साथ सिद्धों की आराधना की गई। जिसकी पूर्व संध्या पर अपने पापों के प्रायश्चित करने का प्रतिक्रमण कराया।

इस मौके पर ब्रम्ह. संजय भैया ने कहा हमारे द्वारा जाने अनजाने में अगर किसी भी प्रकार के पाप होते हैं तो हम प्रतिक्रमण के करके उन पापों का प्रायश्चित कर उसके दुष्परिणाम से बच सकते हैं। सांध्यकालीन आरती में अतुल एंड ग्रुप द्वारा संगीतमयी आरती की प्रस्तुति दी गई। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अंशुल एंड ग्रुप टीकमगढ़ द्वारा सेठ धनंजय की भक्ति नाटिका की सुंदर प्रस्तुति दी गई। वहीं पुजारी राजकुमार जैन ने 108 प्रकार की अलग-अलग आवाज निकलीं। जिसका दर्शकों ने भरपूर आनंद लिया। नाटक में 7 साल के नन्हें कलाकार शुभ जैन की अदाकारी खूब चर्चाओं में रही। शनिवार को 1024 अर्घ्यों के साथ प्रभु की अर्चना की जाएगी। तथा सांध्यकालीन आरती के पश्चात सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे।

पथरिया। नगर में चल रहे सिद्ध चक्र विधान के दौरान उपस्थित मुनिश्री व आर्यिका।

जबेरा। नगर के जैन मंदिर में प्रवचन देते मुनिश्री प्रबुद्ध सागर महाराज। इसी दाैरान उन्हें अपने पिता के देहावसान की जानकारी मिली।
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