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श्रीकृष्ण का प्राकट्य कंस वध करने हुआ: रवि शास्त्री

5 महीने पहले
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घांघरी में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन की कथा में कथा व्यास आचार्य पं. रवि शास्त्री महाराज ने भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्य की कथा सुनाते हुए कहा कि भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की प|ी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। द्वापर युग में भोज वंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा।

एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था रास्ते में आकाशवाणी हुई हे कंस जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा। यह सुनकर कंस देवकी को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब वसुदेव ने उससे विनय पूर्वक कहा देवकी के गर्भ में जो संतान होगी उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगा। बहन को मारने से क्या लाभ है कंस ने वसुदेव की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। वसुदेव देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला।

फिर कृष्ण का जन्म हुआ वसुदेव नवजात शिशु रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कंस को सूचना मिली कि देवकी को बच्चा पैदा हुआ है उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और कहा अरे मूर्ख मुझे मारने से क्या होगा तुझे मारने वाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। बाबा नंद मैया यशोदा संपूर्ण बृजवासी आनंद के साथ भगवान का जन्म उत्सव मनाते हैं एवं नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की उदघोष होने लगते हैं। देवता भगवान के ऊपर पुष्पों की बर्षा करते हुए भगवान की स्तुति करते हैं। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही।

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