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सीता सागर, करण सागर के बाद अब तरन ताल भी जलकुंभी की चपेट में आया, सभी ताल हो गए हरे-भरे

एक वर्ष पहले
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शहर के तालाबों की तस्वीर सुधरने के बजाए और बिगड़ती जा रही है। तालाब पानी से तो लबालब हैं लेकिन कुछ तालाब सूखे हुए तो कुछ हरे भरे पार्क की तरह नजर आ रहे हैं। जिला प्रशासन द्वारा सीतासागर तालाब की सफाई के लिए अभियान शुरू किया था लेकिन नगर पालिका अफसरों की सुस्ती के कारण अभियान मुकाम तक पहुंचने से पहले ही बंद हो गया। इस अभियान में न केवल नगर पालिका बल्कि जिला प्रशासन, महिला बाल विकास समेत अन्य विभाग और समाज सेवी भी बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहे थे लेकिन नपा अफसरों ने इससे रोककर एक बार फिर तालाब के सौंदर्यीकरण पर पानी फेर दिया है।

शहर के तालाबों को गंदगी और बदसूरत होने का ग्रहण लग चुका है जो शायद ही कभी हट सकेगा। पिछले 15 सालों में तालाबों के सौंदर्यीकरण पर नगर पालिका ने रुपया पानी की तरह बहाया लेकिन तालाब का पानी साफ नहीं कर सकी। केवल तालाब को एटीएम के रूप में इस्तेमाल किया। जब पैसों की कमी हुई तब तालाब की सफाई के बहाने लाखों रुपए का बंदरबांट किया गया। तालाब साफ और सुंदर बनने के बजाए और ज्यादा खराब स्थिति में पहुंच गए हैं। लोग इनके किनारे खड़ा होने तक पसंद नहीं करते हैं। यह सब स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के रुचि न लेने के कारण हुआ है। तालाब की सफाई का नवंबर माह में युद्ध स्तर पर काम भी शुरु हुआ लेकिन प्रशासनिक उठापटक के कारण फिर से तालाब की सफाई का काम धरा रह गया। फरवरी माह में कलेक्टर रोहित सिंह ने रुचि दिखाकर सीतासागर तालाब की सफाई के लिए अभियान शुरू किया लेकिन नगर पालिका ने 15 दिन तक तो अभियान में हिस्सा लिया। इस बीच तालाब साफ भी नजर आने लगा था। फुटपाथों की सफाई कराई गई। साथ ही सालों से बंद लाइटें फिर से जलने लगीं। लेकिन पिछले एक सप्ताह से तालाब में जलकुंभी हटाने का काम बंद है। खास बात यह है कि नगर पालिका के आधा सैकड़ा कर्मचारी जल शाखा में पूरे दिन फालतू बैठे रहते हैं। क्योंकि जल प्रदाय का कार्य बानको कंपनी खुद देख रही है। लेकिन नपा ने इन कर्मचारियों को तक सफाई अभियान से नहीं जोड़ा।

तीन साल से सीता सागर, एक साल से करण सागर तालाब जल कुंभी की चपेट में

पिछले तीन साल से सीतासागर तालाब जलकुंभी की चपेट में है। पिछले एक साल से करण सागर तालाब भी जलकुंभी से घिर गया है। दोनों तालाबों की जलकुंभी सूख चुकी है इसलिए ये दोनों ही ताल सूखे हुए पार्क की तरह नजर आ रहे हैं। लेकिन गर्मियों में नई जलकुंभी पनपने से तालाब हरे भरे हो जाएंगे। वहीं नया ताल, लक्ष्मण ताल और तरनतारन ताल भी अब जलकुंभी की चपेट में आ गया है। तरनताल पूरी तरह हरा भरा दिख रहा है और दूर से देखकर ऐसा लगता है मानो कोई फसल खड़ी हो।


ये कोई खेत नहीं, तरन ताल पर जलकुंभी का कब्जा है...

नगर पालिका नहीं चा रही तालाबों की स्थिति सुधरे

नगर पालिका में पिछले 20 साल में एक भी ऐसा जनप्रतिनिधि चुनकर नहीं पहुंचा जिसने शहर को साफ व सुंदर बनाने के लिए काम किया हो। चाहे तालाब हों या फिर अन्य विकास कार्य। जनप्रतिनिधियों ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया और चलते बने। यही कारण है कि शहर के प्राचीन तालाब अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। शहर के लोग भी नगर पालिका के उन प्रतिनिधियों को देखकर किनारा कर लेते हैं जिनकी वजह से इन तालाबों की यह दुर्दशा हुई है। शहर के प्राचीन सीतासागर, करण सागर, नया ताल, लक्ष्मण ताल, लाला का ताल, तरन ताल जब लबालब होते हैं तो पूरे शहर का भू जल स्तर ऊपर रहता है और तालाब सूख जाते हैं तब ही भू जल स्तर नीचे जाता है। लेकिन तालाबों को संरक्षित नहीं किया जा रहा है।

सफाई कराने का प्रयास कर रहे हैं

मोहम्मद ए. गनी, सीएमओ, नपा दतिया

नहीं करते हैं। यह सब स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के रुचि न लेने के कारण हुआ है। तालाब की सफाई का नवंबर माह में युद्ध स्तर पर काम भी शुरु हुआ लेकिन प्रशासनिक उठापटक के कारण फिर से तालाब की सफाई का काम धरा रह गया। फरवरी माह में कलेक्टर रोहित सिंह ने रुचि दिखाकर सीतासागर तालाब की सफाई के लिए अभियान शुरू किया लेकिन नगर पालिका ने 15 दिन तक तो अभियान में हिस्सा लिया। इस बीच तालाब साफ भी नजर आने लगा था। फुटपाथों की सफाई कराई गई। साथ ही सालों से बंद लाइटें फिर से जलने लगीं। लेकिन पिछले एक सप्ताह से तालाब में जलकुंभी हटाने का काम बंद है। खास बात यह है कि नगर पालिका के आधा सैकड़ा कर्मचारी जल शाखा में पूरे दिन फालतू बैठे रहते हैं। क्योंकि जल प्रदाय का कार्य बानको कंपनी खुद देख रही है। लेकिन नपा ने इन कर्मचारियों को तक सफाई अभियान से नहीं जोड़ा।


पूरा तालाब ऐसा लग रहा है जैसे हरी भरी फसल खड़ी हो, लेकिन ये जलकुंभी है।
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