2003 से नहरों से पानी मिलने लगा तो 17 साल में तीन गुना हो गया गेहूं का रकबा, किसानों की संपन्नता भी बढ़ी

Datia News - जिले में बनी नहरें किसानों की आर्थिक संपन्नता बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। वर्ष 2002 में जब रबी की फसल केवल...

Bhaskar News Network

Oct 13, 2019, 07:11 AM IST
Datia News - mp news from 2003 when water from the canals started the acreage of wheat tripled in 17 years the prosperity of the farmers also increased
जिले में बनी नहरें किसानों की आर्थिक संपन्नता बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। वर्ष 2002 में जब रबी की फसल केवल बारिश और निजी बोरवेल के पानी पर निर्भर थी, तब महज 55 हजार हेक्टेयर में गेहूं की फसल होती थी। वर्ष 2003 से नहरों का पानी मिलने के बाद पिछले 17 साल में गेहूं का रकबा तीन गुना बढ़कर डेढ़ लाख हेक्टेयर के करीब पहुंच गया है। नहरों से पानी मिलने के बाद किसानों ने कम पानी वाली फसलों की बोवनी कम कर दी। इस कारण चना, मसूर, सरसों सहित अन्य रबी फसलों का रकबा घट गया। गेहूं की अच्छी पैदावार से किसानों की आर्थिक स्थिति में भी काफी बदलाव आया है।

वर्ष 2003 से राजघाट परियोजना की नहरों से जिले में रबी फसल को पानी मिलना प्रारंभ हो गया था। हर साल जल संसाधन विभाग जिले में एक लाख 44 हजार 958 हेक्टेयर में सिंचाई के लिए लगभग 26.50 टीएमसी पानी फसलों की सिंचाई के लिए देता है। नहरों में पानी अक्टूबर माह के अंत या नवंबर माह के प्रथम सप्ताह से छोड़ दिया जाता है और मार्च के अंत तक चलता है। इस पानी से सबसे ज्यादा सिंचाई दतिया तहसील में होती है। राजघाट नहर की मुख्य कैनाल से दतिया तहसील को 56 हजार 583 हेक्टेयर में पानी मिलता है, जबकि भांडेर में 24 हजार और सेंवढ़ा तहसील की 21 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होती है। तीन हजार 744 हेक्टेयर पानी कासना, हथलई व अन्य माइनरों द्वारा खेतों में पहुंचता है। 1800 हेक्टेयर भूमि मध्यम परियोजना खर्रा घाट से सिंचित होती है। किसान नहरों पर डीजल पंप, मोटरपंप व नहर से सीधे खेतों में भी सिंचाई करते हैं। इससे पैदावार बढ़ी और किसान आर्थिक संपन्न होने लगे।

राजघाट परियोजना से 2003 में पानी मिलना शुरू हुआ तो गेहूं की बोवनी शुरू की, कम पानी की फसलों का रकबा घटा

राजघाट नहर, जिससे रबी सीजन की फसल में होती है सिंचाई।

दाे उदाहरण... नहराें से पानी मिलने के बाद सुधरे किसानाें के अार्थिक हालात

1. ग्राम बहादुरपुर निवासी किसान रामप्रकाश प्रजापति की इमलिया और भिटौरा मौजे में 20 बीघा से ज्यादा जमीन है। वे बताते हैं कि 17 साल पहले वे केवल चना की बोवनी करते थे, लेकिन इतनी उपज नहीं होती थी। इसके बाद नहर का पानी आना शुरू हो गया तो गेहूं की बोवनी शुरू कर दी। उससे आए दोगुनी बढ़ गई। रबी सीजन में ही दो से ढाई लाख रुपए की फसल घर आती है। इससे परिवार आर्थिक रूप से संपन्न हुआ है।

2. बहादुरपुर निवासी कुंअर राज पाल का कहना है कि 20 बीघा खेती है। नहरों से पहले पूरी तरह से बारिश पर निर्भर थे। गेहूं की फसल करने पर सोचना पड़ता था। नहरें आई तो पानी का साधन मिला। अपनी खेती के साथ अन्य किसानों की खेती भी ठेका कर लेना शुरू कर दिया। गेहूं की पैदावार शुरू की। जिससे फसल में अच्छा फायदा होने लगा। आज ट्रैक्टर सहित फसल के काम आने वाले सभी साधन है।

2002 में मात्र 55 हजार हेक्टेयर में हुई गेहूं की फसल, अब 1 लाख 42 हजार हेक्टेयर में हो रही

वर्ष 2002 में जिले में रबी फसल की बोवनी 1 लाख 35 हजार 480 हेक्टेयर में हुई थी। इसमें से गेहूं की फसल मात्र 55 हजार 660 हेक्टेयर में बोई गई थी। 79 हजार से ज्यादा हेक्टेयर में चना, सरसों, मसूर की फसलें बोई जाती थीं क्याेंकि इन फसलों के लिए अधिक पानी की जरूरत नहीं होती। वर्ष 2003 से नहरों में पानी आना शुरू हो गया तो किसानों ने गेहूं की बोवनी शुरू कर दी। वर्ष 2018 में 2 लाख 11 हजार 740 हेक्टेयर में बोवनी हुई थी। इसमें सबसे ज्यादा 1 लाख 42 हजार हेक्टेयर में अकेले गेहूं की बोवनी हुई थी। 69 हजार 740 हेक्टेयर में बाकी फसलों की बोवनी हुई। वर्तमान में 1 लाख 48 हजार हेक्टेयर में गेहूं की बोवनी का लक्ष्य है।

नहरों से जिले का 60 फीसदी रकबा सिंचित


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