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होली की राख डालने की परंपरा, इसलिए दहन के बाद मनाते हैं धुलेंडी

एक वर्ष पहले
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आज रंग, गुलाल के त्योहार होली में सभी डूबेंगे। फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन के बाद चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को मनाए जाने वाले होली के इस पर्व को धुलेंडी कहा जाता है। इस दिन होली की राख से एक दूसरे को सराबोर करने की परंपरा थी। इसीलिए इसका नाम धुलेंडी पड़ा। समय के साथ लोग जागरुक हुए तो राख को छोड़ कर लोगों ने रंग गुलाल से सराबोर करना शुरू कर दिया।

पंडित ललित बिहारी व्यास के बताते है कि हुड़दंग, उमंग, उत्साह व मस्ती का पर्व होली भाईचारे के लिए जाना जाता है। इस पर्व को लेकर कई परंपराएं थी। सबसे बड़ी परंपरा यह पर्व हमें छुआछुत, छोटे बड़े, अमीर गरीब के बंधन से मुक्त करता है। पंडित व्यास के अनुसार होलिका दहन के बाद चैत्र प्रतिपदा को मनाए जाने वाले पर्व को धुलेंडी कहा जाता है। पूर्व में परंपरा थी कि लोग होलिका दहन के दूसरे दिन एक दूसरे पर होली का राख डाल कर उल्लास मनाते थे।

होलिका दहन के साथ ही चढ़ने लगा लोगों पर रंगों का खुमार सोमवार को होलिका दहन का मुहूर्त शाम 6.40 बजे से शुरू होने के कारण शाम ढलते ही होलिका दहन का क्रम शुरू हो गया। गलीमोहल्ले के लोगों ने पहले होलिका पूजन किया। विधि विधान से पूजन के साथ विभिन्न पकवान अर्पित किए। होलिका की परिक्रमा के बाद लोगों ने एक दूसरे को गुलाल लगा कर होली की शुभकामनाएं दी। जैसे ही गुलाल लगाने का क्रम शुरू हुआ। लोगों पर रंग, गुलाल का खुमार चढ़ने लगा। लोग एक दूसरे को रंगने के लिए आतुर हो गए। सबसे अधिक उत्साह बच्चों में देखने को मिला।

बुधवार को गोविंद जी के नगाड़े

के साथ होना समापन

होलिका दहन के बाद चढ़ा होली का खुमार बुधवार को उतरेगा। बुधवार चैत्र कृष्ण द्वितीया को भाई दौज पर बड़े गोविंद मंदिर गोविंद गंज से नगाड़ा निकाले जाने की परंपरा है। हुरियारे फाग गायन के साथ सड़क पर मिलने वाले लोगों पर गुलाल की बारिश करते हुए प्रमुख मार्गो से निकलते है। नगाड़ा निकल जाने के बाद होली का समापन मान लिया जाता है। होली का हुड़दंग समाप्त हो जाता है। इसी के साथ बहनें दौजिया पूजन करने लगती है तो भाई बहिनों के पास टीका के लिए निकल जाते है।

होलिका दहन करते नगरवासी।
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