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खातेगांव में अष्टाह्निका पर हुआ चौंसठ रिद्धि विधान, 64 जोड़ों हुए शामिल
जैन परंपरा में अष्टाह्निका पर्व का बड़ा महत्व है। आचार्य विद्यासागरजी चौंसठ रिद्धि विधान की अपूर्व महिमा को बतलाते हैं। अपने द्वारा दीक्षित शिष्यों काे अभ्यास और निर्विघ्नता के उद्देश्य से चौंसठ रिद्धि का व्रत (उपवास) देते हैं। रिद्धि संपन्न केवलज्ञानी अरहंत भगवान और गंधर्व से लेकर विशेष रिद्धि संपन्न मुनिराजों के गुणों की आराधना इस व्रत में है।
ये बातें मुनिश्री समतासागरजी ने विधान के दौरान कही। उन्होंने कहा आचार्यश्री के चरणों में सिद्धक्षेत्र नेमावर में मैंने चौंसठ रिद्धि व्रत के रूप में 64 उपवास का संकल्प लिया था, जिस व्रत को संपन्न करने का यह पहला मंगलाचरण है।
फाल्गुन माह की अष्टाह्निका में खातेगांव में मुनिश्री समतासागरजी एवं ऐलकश्री निश्चयसागरजी महाराज के सान्निध्य में मुनिसुव्रतनाथ जिनालय बड़ा मंदिर में भक्तामर विधान, शांति विधान, चौंसठ रिद्धि विधान भक्तिभाव से संपन्न हुए। प्रतिदिन नंदीश्वर जिनालय की पूजन भी सामूहिक रूप से की गई। मुनिश्री की प्रेरणा से 64 इंद्र-इंद्राणी जोड़े चौंसठ रिद्धि विधान में शामिल हुए। साथ ही अनेक श्रद्धालुओं ने भी इन विधानों और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होकर प्रभु का गुणानुवाद किया। मुनिश्री और ऐलकजी ने निर्जल उपवास होते भी विधान के संपूर्ण रिद्धि मंत्रों का उच्चारण अपने मुखारविंद से किया और समाजजनों को उनका अर्थ और महत्व समझाया। इस अवसर पर पाठशाला की शिक्षिकाओं का सम्मान भी किया गया।
खातेगांव. मुनिश्री एवं ऐलकजी।
खातेगांव. विधान में शामिल श्रद्धालु।