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दुनिया की महाशक्तियों में संघर्ष का बढ़ता खतरा

पिछले 25 वर्षों में युद्ध ने बहुत ज़िंदगियां ली हैं। फिर चाहे सीरिया, मध्य अफ्रीका, अफगानिस्तान और इराक में नागरिक व...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 03, 2018, 02:00 AM IST

पिछले 25 वर्षों में युद्ध ने बहुत ज़िंदगियां ली हैं। फिर चाहे सीरिया, मध्य अफ्रीका, अफगानिस्तान और इराक में नागरिक व धार्मिक संघर्ष भड़के हों, दुनिया की महाशक्तियों के बीच विनाशक संघर्ष के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता।

अब वैसी बात नहीं है। हाल ही में पेंटागन ने नई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति जारी की है, जिसमें चीन और रूस को अमेरिका के लिए मुख्य खतरा बताया गया है। इन्हें जेहादियों से ऊपर तरजीह दी गई है। उस हफ्ते में ब्रिटेन के सेना प्रमुख ने रूसी हमले की चेतावनी दी थी। इस वक्त भी अमेरिका व उत्तर कोरिया खतरनाक रूप से टकराव के निकट है, जिसमें चीन के उलझने या परमाणु त्रासदी का खतरा है। भूराजनीति में लंबी अवधि के बदलाव और नई टेक्नोलॉजी के विस्तार के साथ अमेरिका व उसके सहयोगियों का असाधारण सैन्य प्रभुत्व घटता जा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उस पैमाने और तीव्रता में संघर्ष देखा नहीं गया पर अब फिर इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

मौजूदा खतरा तो कोरियाई प्रायद्वीप में युद्ध है, शायद इसी साल। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन को अमेरिका पर परमाणु मिसाइल से हमला करने की क्षमता हासिल करने से रोकने का संकल्प लिया है। हाल के परीक्षण बताते हैं कि उत्तर कोरिया ने यह क्षमता हासिल नहीं की है तो कुछ ही महीने में हासिल कर लेगा। पेंटागन की कई आपात योजनाओं में उत्तर कोरियाई परमाणु ठिकानों पर हमले करके उन्हें नाकाम करना शामिल है। इसकी सफलता का पूरा भरोसा न होने के बाद भी यदि ट्रम्प आदेश देते हैं, तो इसके लिए तैयारी रखनी होगी। सीमित हमले से भी पूर्ण युद्ध भड़क सकता है। विश्लेषकों के मुताबिक उत्तर कोरियाई तोपखाना दक्षिण कोरियाई राजधानी सिओल पर 10,000 राउंड प्रति मिनट की रफ्तार से गोले बरसा सकता है। ड्रोन, मिडगेट पनडुब्बियां और सुरंग से मार करने वाले कमांडो जैविक, रासायनिक यहां तक कि परमाणु हथियार तक आजमा सकते हैं। हजारों लोग मारे जाएंगे। यदि परमाणु हथियार इस्तेमाल हुए तो।

चीन इस दूसरे कोरियाई युद्ध से दूर रहे तो भी वह और रूस पश्चिम के साथ महाशक्ति की स्पर्धा में उतर रहे हैं। उनकी महत्वाकांक्षा से निपटना तो और भी कठिन होगा। तीन दशकों की असाधारण आर्थिक वृद्धि ने चीन को अपनी सेना को आमूल बदलने लायक धन मुहैया करा दिया है। फिर इसके नेताओं को भी लगता है कि उनका वक्त आ गया है। विडंबना यह है कि रूस को अब खुद को दमदार देश साबित करना होगा। रूस की सैन्य शक्ति कायम रखने के लिए इसके नेताओं ने बहुत खर्च किया है। अब वे यह जोखिम लेेने को तैयार हैं कि वे सम्मान व अंतरराष्ट्रीय मंच पर वाजिब स्थान के हकदार हैं।

दोनों देशों को उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का लाभ मिला है, जिसे स्थापित करने और उसकी गारंटी लेने के लिए अमेरिका ने सबसे ज्यादा काम किया। लेकिन वे अमेरिका के स्तंभ- मानव अधिकार, लोकतंत्र और कानून का राज छल लगता है। न तो चीन और न रूस अमेरिका से सीधा संघर्ष चाहते हैं, जो उन्हें मालूम है कि वे हार जाएंगे। लेकिन, अपनी वे सैन्य शक्ति को ऐसी जगह इस्तेमाल कर रहे हैं जहां पश्चिम के साथ सैन्य संघर्ष का जोखिम उठाए बिना आक्रामकता और धौंस दिखाई जा सकती है।

रूस व चीन ने अमेरिका द्वारा आविष्कृत सैन्य टेक्नोलॉजी का फायदा उठाया है जैसे लंबी दूरी से अचूक हमला और विद्युत-चंुबकीय संघर्ष। इससे उनके खिलाफ हस्तक्षेप की कीमत नाटकीय रूप से बढ़ गई है। चीन का लक्ष्य अमेरिकी नौसेना को दूर प्रशांत महासागर में धकेलना है, जहां से वे पूर्वी व दक्षिण चीन समुद्र में सुरक्षित रहकर शक्ति प्रदर्शन नहीं कर सकेगा।

विश्व शांति की सबसे अच्छी गारंटी शक्तिशाली अमेरिका है। सौभाग्य से अब भी यह फायदे में है। इसके पास धनी और काबिल सहयोगी हैं। अब भी यह दुनिया की सबसे शक्ति सैन्य शक्ति है। युद्ध लड़ने का नायाब अनुभव है। सर्वश्रेष्ठ सिस्टम इंजीनियर और दुनिया की अग्रणी टेक्नोलॉजी कंपनियां इसके पास है। पर ये सारे फायदे बहुत आसानी से गंवाए जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता और दृढ़ संकल्पित व काबिल प्रतिद्वंद्वियों से इसकी रक्षा करने लायक हार्ड पावर के बिना खतरा बढ़ता जाएगा। यदि ऐसा ही रहा तो भावी युद्ध उससे निकट होगा, जितना आप सोचते हैं।

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स्ट्रेटेजी...टेक्नोलॉजी और भू-राजनीति में बदलाव के साथ चीन, रूस व अमेरिका के बीच टकराव का जोखिम। उत्तर कोरिया के कारण भी बदल सकते हैं हालात।

रूस व चीन ने अमेरिका द्वारा आविष्कृत सैन्य टेक्नोलॉजी का फायदा उठाया है। चीन का लक्ष्य अमेरिकी नौसेना को दूर प्रशांत महासागर में धकेलना है। फिर भी विश्व शांति की सबसे अच्छी गारंटी शक्तिशाली अमेरिका है। सौभाग्य से अब भी यह फायदे में है।

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Web Title: दुनिया की महाशक्तियों में संघर्ष का बढ़ता खतरा
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