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नफरत की राजनीति का विरोध करे बॉलीवुड

उस दिन जब कथित करणी सेना प्रदर्शनकारियों के समूह ने गुरुग्राम में एक स्कूल बस पर हमला किया तो मेरे प्राइम टाइम...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 03, 2018, 02:00 AM IST

उस दिन जब कथित करणी सेना प्रदर्शनकारियों के समूह ने गुरुग्राम में एक स्कूल बस पर हमला किया तो मेरे प्राइम टाइम टीवी न्यूज़ शो की गेस्ट को-ऑर्डिनेटर मेरे पास एक असामान्य-सी समस्या लेकर आईं। उन्होंने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री से कोई भी सेना के खिलाफ बोलने को तैयार नहीं है। आखिरकार हम फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा को इंडस्ट्री का दृष्टिकोण व्यक्त करने के लिए मना पाएं। नि:संदेह, शबाना आजमी, जावेद अख्तर, अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर अौर कुछ अन्य जैसे आमतौर पर बोलने वाले लोगों के अलावा इंडस्ट्री के शीर्ष लोगों की तरफ से चूं तक नहीं की गई। यह तो लगभग ऐसा था जैसे ‘पद्मावत’ के खिलाफ हिंसा का उनके लिए कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि यह ‘उनकी’ समस्या नहीं थी। उनका जाहिर मौन हमारे वक्त की झलक देता है, जहां सत्ता और प्रभाव वाले कोई झंझट नहीं चाहते।

यह पहली बार नहीं है जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का चरित्र उजागर हुआ है। आत्म-संतोषी लोगों का समूह, जो प्रसिद्धि, पैसा और स्टारडम में इतने लिप्त हैं कि उनके पास इंडस्ट्री से आगे की दुनिया पर गौर करने का वक्त ही नहीं है। हां यह जरूर है कि उनकी कद्दावर छवि उन्हें 15 सेकंट की ख्याति चाहने वाली किसी भी सेना का आसान निशाना बना सकती है। कुछ साल पहले ‘असहिष्णुता’ पर साधारण से बयान देने पर शाहरुख खान और आमिर खान दक्षिणपंथी ताकतों के विषैले अभियान का शिकार बन गए थे। अमिताभ बच्चन के घर पर भी एमएनएस कार्यकर्ताओं ने तब हमला किया था जब उन्होंने उत्तर प्रदेश में गर्ल्स कॉलेज का उद्घाटन किया था। दीपिका पादुकोण को भी पद्मावत में भूमिका का बचाव करने पर खत्म करने की धमकियां दी गईं।

चूंकि फिल्म इंडस्ट्री का लाखों लोगों के दिलो-दिमाग पर इतना असर है तो ठीक इसी कारण से सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी शख्सियतों को बेबाकी से अपनी बात कहनी चाहिए। यदि फिल्म स्टार स्वच्छ भारत और अतुलनीय भारत जैसे सरकारी कार्यक्रमों के ब्रैंड एम्बेसडर बनने के लिए कतार में खड़े हो सकते हैं तो उन्हीं सितारों को कौन-सी बात अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके बोलने से तब रोक देती है, जब परोक्ष राजनीतिक समर्थन से स्वयंभू प्रदर्शनकारी उनके अभिव्यक्ति के मूल अधिकार का गला घोंट देते हैं?

हिंदी फिल्म सितारे कहेंगे कि उनका इतना कुछ दांव पर लगा होता है कि वे राजनीति के गंदे पानी में कदम भी नहीं रख सकते। एक शब्द भी नहीं बोलने के इनके रवैए की तुलना नफरत व हिंसा की राजनीति के खिलाफ दक्षिण के सितारे प्रकाश राज के बेबाक बयान से कीजिए। फिर चाहे हमले का शिकार हुई मित्र गौर लंकेश का मामला हो या गौरक्षकों के हिंदू धर्म रक्षक होने के दावे को चुनौती देने की बात हो। चाहे राज के पास खान त्रिमूर्ति जैसी राष्ट्रीय छवि न हो लेकिन, वे कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित ऐसे अभिनेता हैं, जिन्होंने दक्षिण की भाषाओं में बड़ी कामयाबी के साथ अभिनय किया है (हिंदी फिल्मों के दर्शकों को ‘सिंघम’ में विलैन का उनका स्मरणीय रोल याद होगा)। भाजपा और खासतौर पर मोदी सरकार के खिलाफ कटु बयान के बाद कहा गया कि वे ‘राष्ट्र विरोधी’ वाम-उदार ताकतों के परोक्ष समर्थन से राजनीतिक एजेंडा आगे बढ़ा रहे हैं। आप उनकी भड़काने वाली टिप्पणियों को चुनौती दे सकते हैं, दलीलें दे सकते हैं लेकिन, राष्ट्र-विरोधी का लेबल लगाना ध्रुवीकृत राजनीति की खासियत है, जिसमें अहमति के अधिकार पर उत्तरोत्तर दबाव बढ़ रहा है। इसकी बजाय राज को तो दक्षिणी फिल्म परम्परा की कड़ी के रूप में देखना चाहिए, जहां अभिनेताओं ने अपने स्टार स्टेटस को सुरक्षित रखने के लिए सत्ता प्रतिष्ठान से समझौता करने की बजाय निर्भीक होकर अपनी राजनीतिक विचारधारा को जाहिर किया है।

चाहे 1980 में राजीव और कांग्रेस की सत्ता की चरमसीमा के दिनों में अपने ‘तेलुगु गौरव’ के नारे से उन्हें चुनौती देने वाले आंध्र के एनटी रामाराव हों या द्रविड़ आंदोलन के आयकनिक लोक नायक बनने वाले एमजीआर हों या हाल में युवा तमिल फिल्म अभिनेता विशाल हों, जिन्होंने चेन्नई के आरके नगर उपचुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राज्य की ‘भ्रष्ट’ राजनीति को चुनौती दी। उन सितारों में यथास्थिति का सामना करने की इच्छा दिखाई देती हैं और इसीलिए दक्षिण के सितारे अलग दिखाई देते हैं।

शायद यही परम्परा कमल हासन को तमिल राजनीति की विस्फोटक धरती पर पैर रखने के लिए प्रेरित कर रही है और रजनीकांत भी सार्वजनिक क्षेत्र में ‘आध्यात्मिक’ यात्रा पर निकलना चाहते हैं। शायद दक्षिण के सितारों की जड़ें अपनी संस्कृति में जमीन हुई हैं, जो उनके लिए आम नागरिकों की चिंताओं से खुद को जोड़ना आसान बना देती हैं। इतने बरसों में दक्षिण के फिल्म निर्माताओं और अभिनेताओं ने जागरूक होकर सिनेमा का ऐसा ब्रैंड बनाने का प्रयास किया है जो गहरे सामाजिक व राजनीतिक विश्वास को प्रतिध्वनित करता है। एमजीआर के मामले में उन्हें ऐसे लोक नायक के रूप में चित्रित करने के लिए पटकथाएं लिखी गईं, जो गलत करने वालों के खिलाफ खड़ा होता है। इससे फिल्म के परदे से राजनीति की दुनिया में उनका आना और आसान हो गया। एनटीआर ने भी जानबूझकर परदे की अपने छवि को राजनीतिक प्रचार के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।

इसके विपरीत हिंदी सिनेमा ऐसा लगता है कि उत्तरोत्तर ऐसे संसार में सिमट रहा है जो आम आदमी से कटता जा रहा है। ऐसा संसार जिसमें सप्ताह के अंत में बॉक्स ऑफिस पर होने वाली अामदनी के अलावा किसी बात का अर्थ नहीं है। इस बुलबुले को फोड़ने की जरूरत है, एेसा कम्फर्ट जोन जिसमें से सितारों को बाहर निकलने की जरूरत है। निश्चित ही करणी सेना का सामना करना उन लोगों के लिए ऐसी कोई चुनौती नहीं है, जिन्होंने परदे की अपनी छवि ऐसे नायक के रूप में विकसित की है, जो सारी बुराइयों पर विजय प्राप्त कर सकता है।

पुनश्च : सेंसर बोर्ड प्रमुख प्रसून जोशी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में नहीं गए, क्योंकि उन्हें करणी सेना के गुस्से का डर था। उसके बाद छाया मौन विचलित करने वाला है। यदि हमारा फिल्म जगत दादागिरी के खिलाफ खड़े नहीं हो सकता, तो उन चौड़े सीने वाले राजनीतिक नेताओं के बारे में क्या कहें, जो भीड़ को खुलेआम धमकाते देखकर भी शर्मनाक चुप्पी साधे रहते हैं? (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

राजदीप सरदेसाई

वरिष्ठ पत्रकार

rajdeepsardesai52@gmail.com

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