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आंतरिक संपदा के प्रति भी जागरूक रहें

हमें अपनी बाहरी संपत्ति की पूरी जानकारी होती है। होना भी चाहिए। ईमानदारी और व्यवस्थित रूप से टैक्स भरने के लिए हम...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 03, 2018, 02:00 AM IST

हमें अपनी बाहरी संपत्ति की पूरी जानकारी होती है। होना भी चाहिए। ईमानदारी और व्यवस्थित रूप से टैक्स भरने के लिए हम सीए की मदद लेते हैं। वित्तीय प्रबंधन जानकार लोगों के हाथ में देकर बेफिक्र हो जाते हैं। लाभ ही होता रहे, नुकसान नहीं या कम हो इसके प्रति सजग भी रहते हैं। बाहरी संपत्ति का निर्माण जरूरी भी है, क्योंकि हम संसार में रहते हैं। यदि आप किसी परमशक्ति की खोज में हैं तो यह भूल कभी मत करिएगा कि संसार ही छोड़ दें, संपत्ति को ठिकाने लगा दें। सबकुछ छोड़-छाड़कर बाबाजी हो जाने की गलती कभी न करें। लेकिन ध्यान रखिएगा कि जब आप बाहरी संपत्ति के प्रति सजग हों उसी समय आंतरिक संपदा के प्रति भी जागरूक रहें। हमारे भीतर एक ऐसी दौलत है, जिसका पता हम उम्र का लंबा दौर गुजर जाने के बाद भी नहीं लगा पाते। बाहरी संपत्ति को व्यवस्थित करने के लिए हमें दिमाग लगाना पड़ता है। यहां मस्तिष्क की प्रधानता होती है। मस्तिष्क में बहुत सारे तंतु होते हैं। इन्हें लगातार साफ करना पड़ता है तो ही मस्तिष्क ठीक से चल पाता है। इसलिए बाहरी संपत्ति के मामले में व्यवस्थाएं अलग होती हैं। अब भीतरी संपदा को कैसे टटोलने, पहचानने के लिए हृदय पर जाना पड़ेगा। मस्तिष्क यदि तंतु से संचालित है तो हृदय तारों से संचालित होता है। हृदय के तार को ठीक से कसने पर जो स्वर सुनाई देता है वह आपकी भीतरी संपदा है। जब बाहरी संपत्ति और आंतरिक संपदा का तालमेल होता है तब मनुष्य भोगते हुए भी योगी है, संसार के सारे काम करते हुए भी धार्मिक है।

जीने की राह कॉलम पं. विजयशंकर मेहता जी की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें JKR और भेजें 9200001164 पर



पं. िवजयशंकर मेहता

humarehanuman@gmail.com

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