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घाटे के बावजूद बेलापुर, नासिक, पूना तरफ की मिलों द्वारा शकर में बेचवाली

महाराष्ट्र की शकर मिलों को वर्तमान भावों पर बिक्री करने पर बड़ी मात्रा में घाटा हो रहा है। उसके बावजूद बेलापुर,...

Dainik Bhaskar

Feb 03, 2018, 02:05 AM IST
महाराष्ट्र की शकर मिलों को वर्तमान भावों पर बिक्री करने पर बड़ी मात्रा में घाटा हो रहा है। उसके बावजूद बेलापुर, पूना और नासिक तरफ की 80 से 90 प्रतिशत मिलें शकर की बेचवाली कर रही हैं। किसानों का भुगतान वर्ष 2012 के बाद सर्वोच्च स्थान पर पहुंच गया है। इस सीजन में शकर की कुल उपलब्धता 3 करोड़ टन से अधिक होगी। शकर का निर्यात कैसे बढ़ाया जाए इस पर सोच-विचार होना चाहिए। बंफर स्टॉक अथवा अन्य विकल्पों से स्टॉक बोझ घटने वाला नहीं है। मंदी के दौर में एक बार फिर किसानों का रुपया मिलों में उलझता जा रहा है। श्रीलंका एवं बांग्लादेश पाकिस्तान और ताईवान से आयात करते हैं। शकर के मामले में वियतनाम की स्थिति भी ठीक नहीं है। मंदी के इस दौर में पानीपत जिले में 3500 टन गन्ने की पैराई क्षमता वाली शकर मिल का निर्माण कार्य शुरू किया गया है।

उत्पादन लागत अधिक

जानकार क्षेत्रों के अनुसार बाजार में ऐसी आम चर्चा है कि 5 फरवरी को प्रधानमंत्री ने शकर उद्योग के प्रतिनिधियों से मिलने का समय दिया है। महाराष्ट्र में गन्ने के भाव 2400 रुपए प्रति टन है जबकि बिना जीएसटी के शकर 2800 से 2850 रुपए क्विंटल में बिक रही है। उद्योग का मानना है कि वर्तमान स्थिति में उद्योग को घाटा हो रहा है। किसानों को गन्ने का भुगतान नहीं कर पाएंगे और न बैंकों को कर्ज चुका सकेंगे। गन्ने को प्रोसेसिंग करने में प्रति क्विंटल 6 से 7 रुपए की लागत आती है और पूंजी पर ब्याज अलग से लगता ही है। प्रधानमंत्री के समक्ष उद्योग निर्यात पर सब्सिडी की मांग कर सकता है अथवा आयात पर 100 शुल्क लगाने, बंफर स्टॉक करने, कोटा प्रणाली लागू करने जैसे कुछ और विकल्प प्रस्तुत कर सकता है। देखना यह है कि प्रधानमंत्री किस तरह की सहायता को स्वीकृति देते है अथवा वित्त मंत्रालय से कुछ अन्य विकल्प तलाशकर सहयोग दिला सकते हैं। अगले 2-3 दिन इंतजार करना होगा।

कमजोर मिलों की बेचवाली

वर्तमान में शकर में मांग सामान्यत: ठीक है। यदि भावों में कुछ और गिरावट आती है तो स्टॉकिस्ट सक्रिय हो सकते हैं। वर्तमान स्थिति में कोल्हापुर तरफ की अधिकांश मिलें आर्थिक रूप से सशख्त हैं उनमें से 80 प्रतिशत मिलों ने शकर बेचना बंद कर रखा है जबकि पूना तरफ की 80 से 90 प्रतिशत बेलापुर एवं नासिक तरफ की 80 से 90 प्रतिशत शकर मिलें टेंडरों के माध्यम से शकर बेच रही हैं, क्योंकि कमजोर मिलों के पास बेचने के अलावा कोई विकल्प भी शेष नहीं है। आखिर किसानों को कब तक भुगतान नहीं करेंगे। इसी वजह से खाद्य मंत्रालय के निर्देश के बावजूद शकर की बेचवाली कर रही है। बताया जाता है कि विदर्भ और महाराष्ट्र के कुछ अन्य उत्पादक क्षेत्रों में गन्ने के मूल्य में वृद्धि से उत्पादन लागत 3500 रुपए क्विंटल से अधिक बैठ रही है। अक्टूबर से अभी तक शकर भावों में 15 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ गई है। इन क्षेत्र की मिलों को बड़ी मात्रा में घाटा होने लगा है।

निर्यात के प्रयास

उद्योग संगठन ने खाद्य मंत्रालय को पत्र लिखकर श्रीलंका और बांग्लादेश से बात करने को कहा है। इन दोनों देशों की वार्षिक खपत 35 लाख टन के आसपास है। श्रीलंका में शकर पर आयात शुल्क 90 और बांग्लादेश ने 190 डॉलर प्रतिटन का लगा रखा है, जिससे भारत से निर्यात संभव नहीं है। वर्तमान में श्रीलंका और बांग्लादेश प्राथमिकता शुल्क के तहत अपनी आवश्यकता की शकर पाकिस्तान और ताईवान से खरीदते हैं। पाकिस्तान ने 15 लाख टन शकर के लिए 1100 रुपए प्रति क्विंटल की इंसेटिव दे रहा है। इस वजह से भारत से निर्यात होना तो संभव ही नहीं लग रहा है। दोनों देशों से चर्चा जरूर की जा सकती है, किंतु लाभ होने के आसार कम हैं। इन दो देशों के अलावा वियतनाम का शकर उद्योग संकट के दौर में था। वियतनाम में 3 लाख हेक्टेयर से अधिक में गन्ने की खेती होती है। पिछले वर्ष के अंत तक 2.40 लाख टन का अनुमानित स्टॉक था। घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता की वजह से शकर कंपनियों के शेयरों में गिरावट आ गई थी। इस वजह से सरकार ने 5 प्रतिशत आयात शुल्क को इस वर्ष अंत तक जारी रखने की घोषणा की है।

पिछले वर्षों मे उत्पादन

दिसंबर अंत तक मिलों पर गन्ने का भुगतान 9,576 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। वर्ष 2012 में 7,840 करोड़ तक भुगतान पहुंचा था। उप्र की मिलों में 3,940 करोड़ रुपए लेना है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2013 में शकर उत्पादन 263 लाख टन 2014 में 251, 2015 में 244, 2014 से 283-2017 में 203 एवं 2018 में 261 लाख टन का अनुदान लगाया गया है। हरियाणा के करनाल और पानीपत जिले के लगभग 232 गांवों में 20 हजार एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में गन्ने की खेती हो रही है। राज्य में 235 करोड़ की लागत से तैयार होने वाली नई सहकारी शकर मिल का शिलान्यास मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों किया। मुख्यमंत्री ने कहा है कि मिल डेढ़ वर्ष में तैयार होकर पैराई कार्य शुरू कर देगी।

शकर की कुल उपलब्धि 3 करोड़ टन से अधिक

इस्मा के अनुसार शकर का उत्पादन अनुमान 2017-18 में 251 से 261 लाख टन का लगाया जा रहा है जबकि राष्ट्रीय सहकारी शकर कारखाना परिसंघ 2.90 लाख से 3 करोड़ टन तक उत्पादन होने की भविष्यवाणी कर रहा है। इसके अलावा 39 लाख टन का केरीओव्हर स्टॉक को सम्मिलित कर लिया जाए तो कुल उपलब्धि 3 करोड़ से 3.30 करोड़ टन हो सकती है। इसके बाद सरकार चाहे जो मदद कर दे भावों में बड़ी तेजी के संयोग बनना कठिन हैं। पिछले महीने में सरकार ने स्टॉक सीमा को समाप्त कर दिया था। हालांकि स्टॉक सीमा बे-मतलब थी। वर्तमान में स्टॉक सीमा हटने का लाभ ऐसे निवेशकों को मिल सकता है जो शकर का स्टॉक करना चाहते हैं। इसमें पूंजी लगाना चाहते हैं। शकर उद्योग को सहयोग करने के लिए केंद्र सरकार अगले एक-दो वर्ष तक शकर पर स्टॉक सीमा लागू नहीं करेगी, ऐसी घोषणा कर दें तब भी थोड़ा-बहुत निवेश शकर में आज नहीं तो कल आ सकता है। कुछ उद्योगपति यहां तक की मांग कर गए हैं कि यदि मिलों के पास किसानों के भुगतान के लिए रुपया नहीं है तो उन्हें पैराई की अनुमति नहीं दी जाना चाहिए। ये उद्योगपति भूल रहे हैं कि यदि मिलों ने पैराई बंद कर दी तो किसानों के गन्ने का क्या होगा? वर्तमान में मिलों के नाम उधारी लिखी तो जा रही है।

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