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मुरब्बे से विज्ञान, नकली नोट से गणित पढ़ेंगे सीबीएसई के छात्र

संतोष कुमार/पीयूष बबेले|नई दिल्ली विनोद मित्तल|जयपुर, प्रतीक भट्‌ट|अहमदाबाद बच्चों के बस्ते का बोझ 2019-20 के...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 02:05 AM IST

संतोष कुमार/पीयूष बबेले|नई दिल्ली

विनोद मित्तल|जयपुर, प्रतीक भट्‌ट|अहमदाबाद

बच्चों के बस्ते का बोझ 2019-20 के शैक्षणिक सत्र से कम हो जाएगा। इसकी मांग करीब दो दशक से चली आ रही थी। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने दो साल के मंथन के बाद 26 फरवरी को इसका एेलान किया था। भास्कर ने अपनी पड़ताल में देश की शिक्षा व्यवस्था को जड़ से बदलने वाली परियोजना के हर चरण को बारीकी से जांचा। मंत्रालय ने पिछले साल अप्रैल से लेकर नवंबर तक देशभर के पांच रीजनल सेंटर पर कार्यशाला का आयोजन किया, जिसके बाद दिल्ली में 6-7 नवंबर को चिंतन शिविर में लंबी चर्चा के बाद इसका एेलान किया गया। इस एेलान के बाद एनसीईआरटी की टीम के साथ जावडेकर ने कई दौर की बैठक कर तत्काल इस दिशा में कदम उठाने का निर्देश दिया है। सरकार ने अभी कक्षा एक से आठवीं तक के पाठ्यक्रम में बदलाव का पूरा खाका तैयार नहीं किया है। यह काम देशभर के िशक्षाविदों से परामर्श के बाद किया जाएगा। लेकिन हर क्लास में हर विषय में कुछ बुनियादी बदलावों को मंत्रालय ने हरी झंडी दे दी है। इससे बाकी अध्यायों में बदलाव के लिए शिक्षाविदों को लाइन मिल जाएगी। मंत्रालय ने जो स्पष्ट नीति बनाई है उसके तहत दो कक्षाओं में रिपीट होने वाले पाठ्यक्रम को बाहर कर किताबों का बोझ कम किया जाएगा।

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दैनिक भास्कर ने अपनी पड़ताल में सरकार द्वारा एनसीईआरटी से तैयार करवाया गया लर्निंग आउटकम डॉक्यूमेंट खंगाला। इसी के आधार पर सिलेबस में बदलाव किए जाने की तैयारी है। सामाजिक विज्ञान की आठवीं कक्षा में पढ़ाया जाएगा कि ईस्ट इंडिया कंपनी किन आर्थिक स्वार्थों की वजह से देसी राजाओं के आपसी झगड़ों में दिलचस्पी लेने लगी। अपने आर्थिक हितों को साधते हुए कैसे वह देश पर काबिज हो गई। उसके आर्थिक षडयंत्र को पढ़ाया जाएगा। महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह को पढ़ाने के साथ ही यह समझाया जाएगा कि कैसे अंग्रेजों की नील की खेती की नीति ने भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी। अध्यापकों को इस बात को आज किसानों की दशा से जोड़कर समझाना होगा। सामाजिक विज्ञान और भाषाओं जैसे हिंदी, इंग्लिश और उर्दू के पाठ्यक्रमों को इस तरह बनाया जाएगा ताकि वह नैतिक शिक्षा तो दे ही साथ ही उस में समसामयिक घटनाओं और बिंबों का इस्तेमाल भी किया जा सके। इतिहास को भी इस तरह पढ़ाया जाना है कि वह युद्धों के वर्णन और तारीखाें को रटने तक सीमित न रहे। कक्षा सातवीं में सत्लनत काल की इकलौती महिला शासक रजिया सुल्तान और महान मुगल बादशाह अकबर के जीवन को न सिर्फ पाठ्यक्रम बरकरार रखा जाएगा बल्कि उनको नाटक का मंचन कर बच्चों को समझाया जाएगा। बच्चों को धर्मों के बुनियादी मूल्यों को समझाने के लिए उन्हें भजन, कीर्तन, कव्वाली सुनने के लिए धार्मिक स्थलों पर ले जाया जाएगा।

लर्निंग आउटकम डॉक्यूमेंट के अनुसार बच्चों को गणित समझाने के लिए कक्षा एक में 20 रुपये तक की नकली मु्द्राओं के जरिए गिनती समझाई जाएगी। साथ ही शून्य का महत्व समझाया जाएगा। कक्षा चार के बच्चों को वर्ग, आयत जैसी आकृतियां समझाने के लिए घरों के डिजाइन, उनमें लगी अलग-अलग तरह की टाइल्स की मदद ली जाएगी। कक्षा आठवीं में जीएसटी के जरिये ब्याज का गणित समझाया जाएगा। पर्यावरण की किताब में कक्षा तीन में ही बच्चों को अच्छे-बुरे स्पर्श का फर्क समझाया जाएगा। विज्ञान को घर से समझाने के लिए 8वीं के बच्चों को पढ़ाया जाएगा कि अचार में नमक और मुरब्बे में शक्कर क्यों डाली जाती है। एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जे.एस. राजपूत कहते हैं कि आज के समय में सूचना के स्रोत इतने हो गए हैं कि सभी चीजें बच्चों को पढ़ाने की जरुरत नहीं है। जरुरत है समझ बढ़ाने की। किताबों की साइज बढ़ी है क्योंकि हर बार जब विद्वान किताब बनाने बैठते हैं तो अपना ज्ञान उड़ेलने लगते हैं। पाठ्यक्रम को कम करना संभव है। कक्षा 10 तक सुरुचि वाले विषय पढ़ाने चाहिए। जैसे- मैंने अपने समय एनसीईआरटी में एक बदलाव किया था। पहले नागरिक, शास्त्र, भूगोल, इतिहास को मिलाकर कुल कुल 800 पन्नों की चार किताबें होती थी। लेकिन इसे मिलाकर एक किया और 200 पन्नों में उसे समेट दिया। वे बताते हैं कि 1962 में मैने एमएससी की पढ़ाई के वक्त टर्मन की 700 पेज की किताब पढ़ी जो आज 7-8 पेज तक सीमित हो गई है। यानी जो आवश्यक नहीं है उसे पाठ्यक्रम नहीं रखना चाहिए।

मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर कहते हैं कि सिलेबस बदलने के लिए हमने जो छह शिविर किए उसमें 200 से ज्यादा शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन, सभी राज्यों के अधिकारी, शिक्षक, मुख्य अध्यापक और शिक्षाविद आदि से हमारी बारी-बारी से चर्चा हुई। सबने यह माना कि सिर्फ परीक्षा की शिक्षा ही शिक्षा नहीं है। हम इसी सप्ताह में हमारी वेबसाइट पर पूछेंंगे कि कौन सा पाठ बिलकुल आवश्यक है और कौन सा अनावश्यक है। इस मामले में लेखक और शिक्षाविद विजय बहादुर सिंह कहते हैं कि प्रकाशकों और स्कूलों की मिलीभगत से सिलेबस का बोझ बढ़ा दिया जाता है। जो चित्रकला नहीं जानता उसे बचपन में ही चित्रकला सिखाना सही नहीं है। खेलकूद से स्वास्थ्य ठीक रहता है जिसे अनिवार्य किया जाना चाहिए। सामाजिक जीवन से जोड़ने वाली चीजें पाठ्यक्रम में शामिल की जानी चाहिए। एनसीईआरटी में विज्ञान कमेटी के विशेषज्ञ और एम्स के डॉक्टर डॉ. अमित डिंडा कहते हैं कि विज्ञान में कटौती नहीं की जा सकती। लेकिन सूचनाओं को बहुत संक्षिप्त करके किया जा सकता है। अमेरिका में इस तरह का मॉडल अपनाया जाता है। भारत भी इसी दिशा में कदम बढ़ाएगा।

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यूरोपीय इतिहास व टेलीग्राम कम करें, हमारा संविधान पढ़ाएं

1. राजस्थान के ज्ञान विहार स्कूल के डायरेक्टर कनिष्क शर्मा के अनुसार सिलेबस में कम से कम संविधान के आर्टिकल एक से तीस तक की जानकारी होनी चाहिए। कक्षा 9 के चैप्टर में पोस्ट ऑफिस, टेलीग्राम के बारे में विस्तार से पढाया जा रहा है। इसकी जरुरत नहीं है। पानी बचाने पर भी चैप्टर दें। अभी बल्ब के बारे में ही पढ़ाया जा रहा है। जबकि एलईडी आ चुकी है। जीपीएस मोबाइल, इंटरनेट के बारे में विस्तार से पढ़ाने की जरूरत है।

4. गुजरात के शिक्षाविद डॉ. किरीट जोशी कहते हैं कि इतिहास में फ्रेंच क्रांति, चीन की स्वतंत्रता का इतिहास आदि छोटा करके पढ़ाना ठीक है। विज्ञान में नैनो टैक्नोलॉजी, रोबोटिक्स, जीनेटिक्स सहित विकसित हो रही नई विधाओं को जगह देनी चाहिए। भाषाओं के विषयों में धर्मनिरपेक्षता को स्थान मिले इसलिए ऐसी मिसालपेश करने वाली कहानियां आत्मकथाएं पाठ्यक्रम में शामिल होनी चाहिए।

कैसा हो बच्चों का सिलेबस? आप भी बता सकते हैं

सिलेबस बदलने के लिए लर्निंग आउटकम के जरिए वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाएगा। लर्निंग आउटकम को एनसीईआरटी ने ही तैयार किया है। बदलाव पर एनसीईआरटी की करिकुलम कमेटी ही अंतिम रिपोर्ट देगी। लेकिन उससे पहले मंत्रालय अब इसी हफ्ते में ही वेबसाइट पर प्रस्ताव का ड्राफ्ट रखेगी। इस पर शिक्षक, शिक्षाविद, पूर्व छात्र, माता-पिता राय दे सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक पाठ्यक्रम पर सुझाव के लिए मार्च से अप्रैल तक ही समय दिया जाएगा। सरकार की रणनीति दिसंबर के आखिर तक सिलेबस को अंतिम रूप देने की है ताकि जनवरी से उसे प्रकाशन के लिए भेज दिया जाए। नए सिलेबस को 2019-20 के शैक्षणिक सत्र से लागू कर दिया जाएगा।

2. हरियाणा के सर्वहितकारी केशव विद्या निकेतन के प्रिंसिपल मनोज कुमार कहते हैं कि नौंवीं- दसवीं कक्षा की हिस्ट्री की किताबों में विश्व इतिहास के कई चैप्टर निकाले जा सकते हैं जिसमें सारा फोकस यूरोप पर है। उन हिस्सों को निकालकर भारत के इतिहास को डाला जा सकता है। गणित और विज्ञान में ‌वैदिक गणित को जोड़ना चाहिए।

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5.छत्तीसगढ़ के शिक्षविदों ने बताया कि कक्षा 9 में कनवर्सेशन आॅफ प्लांट एंड एनिमल्स पढ़ाया जाता है। यह सामान्य ज्ञान में पढ़ाया जाता है। इसकी विज्ञान में जरूरत नहीं है। ऐसे ही हिंदी में एक निबंध है - सांस सांस में बांस। ये रोचक नहीं है। ऐसे ही कक्षा 9 में विज्ञान विषय में सम नेचुरल फेनोमना चैप्टर पढ़ाया जाता है। यह एन्वायरमेंटल स्टडीज में भी पढ़ाया जाता है।

3. हरियाण के शिक्षक जतिंदर सिंह ने बताया कि 11वीं-12वीं में फिजिक्स के 10 यूनिट में से 4 यूनिट हटाने चाहिए। उसकी जगह प्रेक्टिकल होना चाहिए। 10वीं कक्षा में रे ऑप्टिक्स और मिरर का चैप्टर बिना मतलब डाला गया है। उसे छोटी कक्षाओं मे पढ़ाना चाहिए। दसवीं में साइंस के दो भाग होने चाहिए। जिन्हें 11वीं में विज्ञान लेना है वे तो दोनों भाग पढ़ें और जिन्हें दूसरे विषय लेने हैं उन्हें सिर्फ रोजमर्रा का विज्ञान पढ़ाना चाहिए।

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