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जनता को भुगतने पड़ सकते हैं शी की तानाशाही के परिणाम

बयान सिर्फ चंद शब्दों का था लेकिन, इसमें बम धमाके जैसी शक्ति थी, जिसकी गूंज 24 फरवरी को दुनियाभर में सुनाई दी : चीन की...

Danik Bhaskar | Mar 04, 2018, 02:05 AM IST
बयान सिर्फ चंद शब्दों का था लेकिन, इसमें बम धमाके जैसी शक्ति थी, जिसकी गूंज 24 फरवरी को दुनियाभर में सुनाई दी : चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) देश के राष्ट्रपति पद पर किसी व्यक्ति के पांच साल के दो कार्यकालों की सीमा समाप्त कर रही है।

इसका मतलब है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अब दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश पर जब तक मर्जी हो हुकूम चला सकते हैं, जिससे आशंका पैदा हुई है कि एशियाई महाशक्ति फिर तानाशाही की ओर जा रही है। चीनी राजनीति पर ‘द कॉन्फ्रेंस बोर्ड’ बीजिंग स्थित रिसर्चर ब्लैंचेट कहते हैं, ‘यह चीन के एक-व्यक्ति संचालित सिस्टम में रूपांतरित होने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन, अभी इस यह कहना थोड़ा कठिन है कि चीन अथवा दुनिया के लिए यह कितना बड़ा कदम है।’ चालीस साल से सीसीपी ने देश के तनाशाही शासन को संस्थानीकरण का लबादा पहनाए रखा है कि एक व्यक्ति या परिवार की बजाय सभी 1.40 अरब लोगों के कथित कल्याण के लिए पार्टी के पास सत्ता के सूत्र हैं। आयु और कार्यकाल की निर्धारित सीमा जैसे कड़े प्रोटोकॉल ने इसकी वैधता स्थापित करने में मदद की।

लेकिन, 2013 में राष्ट्रपति बनने के बाद से शी ने सेंसरशिप बढ़ाकर, वकीलों व आंदोलनकारियों को जेल में डालकर और खुद के बारे में चापलुसी भरे प्रचार को हवा देकर इन संरक्षक उपायों से धीरे-धीरे मुक्ति पा ली। उनकी छाप वाली राजनीतिक फिलॉसॉफी को पिछले साल संविधान में शामिल कर लिया गया, जिसमें उन्होंने प्रोटोकॉल के मुताबिक अपने संभावित उत्तराधिकारी को चीन की सर्वोच्च कार्यकारी संस्था में नियुक्ति करने की अनदेखी की। इस सब के बाद कार्यकाल की सीमा को खत्म करना तो अगला तर्कसंगत कदम ही कहा जाएगा।

अब वही एक आदमी दुनिया की 2 नंबर की अर्थव्यवस्था पर अपनी मौत, मर्जी से पद छोड़ने या उन्हें हटाए जाने तक शासन करेगा, जिससे यह डर पैदा हुआ है कि एशियाई महाशक्ति फिर तानाशाही की ओर जा रही है। यह इस बात का खुला प्रदर्शन है कि कैसे हाल के वर्षों में तानाशाही राजनीतिक व्यवस्थाओं को सामान्य माना जाने लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की (खुली सराहना से नहीं तो) परोक्ष सहमति से रूस के व्लादिमीर पुतिन, फिलिपीन्स के रोड्रिगो दुदेर्ते और तुर्की के रिसेप एर्दोगन जैसे बाहुबलियों ने अपनी सत्ता मजबूत करने के लिए लोकतांत्रिक असहमति को कुचल दिया। शी के कदम के बारे में पूछने पर व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी सैरा सैंडर्स ने कहा, ‘यह फैसला चीन के लिए है।’

हो सकता है लेकिन, इसका प्रभाव तो उससे आगे भी महसूस किया जा सकता है। घर में अपनी सत्ता मजबूत करने के साथ ही शी विश्व मंच पर भी अपनी चलाने में लगे हैं। उनका खास प्रोजेक्ट बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव -जो प्राचीन रेशम मार्ग पर बनाया जा रहा व्यापार और बुनियादी ढांचे संबंधी नेटवर्क है- चीन के भू-राजनीतिक प्रभाव में आमूल बदलाव के लिए लाया जा रहा है। उन्होंने बीजिंग में एक अंतरराष्ट्रीय विकास बैंक की स्थापना भी की है और डिजिबाउती में चीन का पहला विदेशी सैन्य ठिकाना भी खोला है। अब जब शी ने अपने देश में खुलेआम राजनीतिक कट्‌टरपंथ का अध्याय लिख दिया है, तो विदेश में उनके लिए व्यापार और दक्षिण चीनी समुद्र जैसे क्षेत्रीय सीमागत विवादों पर कानून-कायदों को धता बताना आसान होगा। इसके संकेत तो बहुत पहले मिलते रहे हैं।

इसके परिणाम सबसे अधिक चीन के लोगों को भुगतना पड़ सकते हैं। इस वक्त तो शी का अपने देश में लगभग कोई विरोध नहीं है लेकिन, आर्थिक अस्थिरता या किसी संकट को ठीक से निपट न पाने पर असंतोष भड़क सकता है। इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट में चाइना मैनेजर टॉम रैफर्टी कहते हैं, ‘अपनी स्थिति को लेकर घबराहट में शी जिनपिंग व्यापक दमन और राजनीतिक निष्कासन पर उतारू हो सकते हैं।’

एक और माओ जैसे नेता का उदय न हो इसलिए सुधारक देंग शियाओपिंग के तहत पार्टी नेतृत्व ने पार्टी कार्यकारिणी के मातहत सामूहिक नेतृत्व की अवधारणा लाई और किसी व्यक्ति के राष्ट्रपति पद पर कार्यकाल की सीमा तय की ताकि नेतृत्व का सुगम हस्तांतरण हो सके। लेकिन, अब जब शी इन नियमों को ध्वस्त कर रहे हैं तो आगे जाकर उत्तराधिकारी का संकट खड़ा होने का जोखिम बढ़ जाता है।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी इस संवेदनशील बिंदु को पहचानती है, इसलिए जैसे ही इस विषय पर चर्चा होने लगी उसने हड़बड़ाकर सोशल मीडिया पोस्ट को सेंसर कर दिया और सीएनएन जैसे अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों को ब्लॉक कर दिया। लेकिन, अंतत: देश को इस मुद्‌दे का सामना करना ही पड़ेगा। ब्लैंचेट 40 साल के शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण को वास्तव में विसंगति बताते हुए कहते हैं, ‘यह चीन की हजारों साल पुरानी समस्या है कि सम्राट कितने समय तक सत्ता में रहेगा और वह किस तरह सत्ता छोड़ेगा? अब यह शेष विश्व की भी समस्या है।

खुद शी रहे हैं माओ की मर्जी के शिकार

कि सी अन्य की बजाय शी तानाशाही के क्रूरतम रूप को बेहतर जानते हैं। उनके पिता को पार्टी के पितृ पुरुष माओ त्से तुंग ने बार-बार पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया और चीनी जनता को भी बहुत तकलीफें भुगतनी पड़ीं। सामूहिक औद्योगिकीकरण के विक्षिप्त से प्रयोग ‘ग्रेट लीप फारवर्ड’ के दौरान 1958 से 1962 के बीच 4.5 करोड़ लोग मारे गए थे। अपने लाखों समकालीनों की तरह शी जिनपिंग को भी 1966 से 1976 तक चली सांस्कृतिक क्रांति के दौरान ग्रामीण भागों में निर्वासित कर दिया गया था।