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वोटर लिस्ट के 48 हजार पन्नों में से 42 हजार पर भाजपा कार्यकर्ता थे, हर बूथ पर 10 युवा थे

Dhar News - ‘नरेंद्र मोदी जी कांग्रेस मुक्त भारत कर रहे हैं, लेकिन हम आपको कम्युनिस्ट मुक्त भारत का दायित्व देते हैं।’ ये बात...

Dainik Bhaskar

Mar 04, 2018, 02:05 AM IST
वोटर लिस्ट के 48 हजार पन्नों में से 42 हजार पर भाजपा कार्यकर्ता थे, हर बूथ पर 10 युवा थे
‘नरेंद्र मोदी जी कांग्रेस मुक्त भारत कर रहे हैं, लेकिन हम आपको कम्युनिस्ट मुक्त भारत का दायित्व देते हैं।’ ये बात सुनील देवधर को त्रिपुरा का प्रभारी बनाते वक्त नवंबर 2014 में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कही थी तो उस वक्त वे बेहद सहज नहीं थे। पर 600 दिनों से त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में किराए के मकान में रहकर पार्टी की रणनीति को अंजाम देने वाले देवधर को अब शाह की साढ़े तीन साल पुरानी टिप्पणी का मर्म समझ आ रहा है।

भाजपा में त्रिपुरा की जीत से ज्यादा उत्साह इस बात को लेकर है कि यह वामपंथी विचारधारा पर दक्षिणपंथी विचारधारा की जीत है। ऐसा पहली बार हुआ है कि भाजपा ने किसी वामपंथी गढ़ में जीत हासिल की है। दरअसल, भाजपा की इस जीत के पीछे मजबूत काडर खड़ा करने की रणनीति रही। भाजपा ने 2014 में त्रिपुरा में पहले मंडल स्तर पर मोर्चों का गठन किया, फिर बूथ कमेटियों का गठन शुरू हुआ। राज्य के 3214 बूथों पर यूपी जैसी रणनीति अपनाई। हर बूथ पर भाजपा ने ‘वन बूथ-टेन यूथ’ का फॉर्मूला अपनाया। साथ ही हर बूथ पर 10-10 महिलाएं, एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और किसानों को भी जोड़ा। 2700 बूथों पर 10-10 महिलाओं की टीम तैयार की। इसके अलावा, त्रिपुरा वोटर लिस्ट के कुल 48000 पन्नों में से 42,000 पन्नों पर कार्यकर्ता तैनात किए। यानी एक पेज के 60 वोटर पर एक भाजपा कार्यकर्ता तैनात था। जिसकी ड्यूटी एक पखवाड़े में दो बार सभी वोटर से मिलकर तीन बिंदुओं पर बात करना था। इसी तरह त्रिपुरा में भाजपा ने क्षेत्रीय दल आईपीएफटी से गठबंधन कर 20 आरक्षित आदिवासी सीटों पर कब्जा किया।

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यूपी फॉर्मूला: शाह ने पहले बिप्लव देब को प्रदेश अध्यक्ष बनाया, फिर देवधर को भेजा

अध्यक्ष शाह ने त्रिपुरा में सबसे पहले राज्य के युवा नेता बिप्लव देब को प्रदेश की कमान सौंपी, जो कभी सांसद गणेश सिंह के पीए थे। उसके बाद संगठन से जुड़े और मोदी के वाराणसी संसदीय सीट के प्रभारी रहे सुनील देवधर को त्रिपुरा का प्रभारी बनाया। फिर अमित शाह ने यूपी चुनाव की तर्ज पर त्रिपुरा में भी बूथ और पन्ना प्रमुख की रणनीति को कारगर ढंग से लागू कराया।

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सबसे बड़ा चेहरा: देवधर ने वाम मोर्चा के बूथ काडर की कमजोरी को बड़ा हथियार बनाया

त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधर भास्कर से बातचीत में कहते हैं कि वाम काडर कोई मामूली काडर नहीं है। पर उसकी एक कमजोरी है कि सत्ता में आते ही प्रशासन का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण में लग जाता है। जिससे बूथ स्तर का काडर भी पार्टी पर निर्भर हो जाता है और सरकार की योजना में लाभ उठाने लगता है। इसी वजह से बंगाल में वाम काडर खत्म हो गया।

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विपक्ष में बिखराव: हेमंत शर्मा और त्रिपुरा कांग्रेस अध्यक्ष देबबर्मा की मुलाकात अहम

भाजपा की इस जीत में विपक्ष का बिखराव भी खास है। सबसे अहम फैक्टर भाजपा नेता हेमंत बिश्व सरमा का कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा से चुनाव के दौरान हुई मुलाकात थी। सूत्रों के मुताबिक त्रिपुरा रॉयल फैमिली से जुड़े देब बर्मा की भाजपा से डील हो गई। इसी वजह से भाजपा आदिवासी प्रभाव वाली सभी 20 सीटें जीतने में सफल रही।

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