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संसद में फिल्मी संवादों की गूंज और नेताओं के वादे!

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 02:25 AM IST

संसद में मनोरंजन उद्योग के अस्तित्व के संकट, सिनेमाघरों की कमी, इत्यादि के बारे में कोई चर्चा कभी नहीं होती परन्तु...
संसद में मनोरंजन उद्योग के अस्तित्व के संकट, सिनेमाघरों की कमी, इत्यादि के बारे में कोई चर्चा कभी नहीं होती परन्तु हाल ही में राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘दामिनी’ में सनी देओल द्वारा बोला गया संवाद गूंजता रहा कि ‘तारीख पर तारीख और तारीख पर तारीख’ दी जाती है परन्तु अदालतें फैसला नहीं देतीं। श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ में एक आदमी ताउम्र फैसले की कॉपी के लिए अदालत के चक्कर लगाता है और उसकी जिद है कि वह रिश्वत नहीं देगा। उसके मरने तक फैसले की कॉपी उसे नहीं मिलती। श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’ स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद के भ्रष्ट भारत का वर्णन वैसे ही प्रस्तुत करता है जैसे वेदव्यास की ‘महाभारत’ अपने काल खंड का चित्रण प्रस्तुत करती है परन्तु यह भी सत्य है कि आधुनिक जीवन की कोई समस्या ऐसी नहीं है जिसका संकेत आपको महाभारत में नहीं मिलता। महाभारत को पढ़ना वैसा ही अनुभव है जैसे गहन जंगल में जितना दूर तक चलें उतने नए दृश्य देखने को मिलते हैं।

बहरहाल संसद में कुछ इस आशय की बातें हुई हैं कि ‘अच्छे दिन कब आएंगे, तारीख पर तारीख दी जा रही है परन्तु अच्छे दिन नहीं आते’। किसी समय सरताज नेता ने कहा कि उन्हें तीस दिसम्बर तक का वक्त दें और वह दिसम्बर आकर चला गया परन्तु अवाम आज भी आर्थिक शीत लहर में कांप रहा है। जिसका पेट खाली हो, उसे ठंड भी अधिक ही लगती है। कितने ही बैंक खाते आज भी पंद्रह लाख का इन्तजार कर रहे हैं जिसका वादा चुनाव के समय किया गया था। मुद्रा परिवर्तन से काला धन उजागर नहीं हुआ और बैंक के सामने लगी कतारों में खड़े लगभग डेढ़ सौ लोग मर गए।

संसद में मनोज कुमार की फिल्म ‘उपकार’ के लिए गुलशन बावरा के लिखे गीत मेरे देश की धरती सोना ऊगले, ऊगले हीरे मोती, भी गूंजा परन्तु इस पर चर्चा नहीं हुई कि इस विशाल देश की अल्प जमीन पर खेती होती है और सिंचाई की सहूलियत भी कम ही किसानों को उपलब्ध है। यथार्थ तो यह है कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं। रासायनिक खाद ज़मीन की उर्वरक शक्ति क्षीण कर रहे हैं। गौरतलब है कि कीटनाशक डी.डी.टी. दूसरे विश्वयुद्ध के समय एक हथियार की तरह इज़ाद किया गया था और युद्ध के बाद अमेरिका के गोदामों में रखा डी.डी.टी. भारत भेज दिया गया।

ब्रिटेन की संसद को ‘मदर संसद’ माना जाता है जिसे हमने अपने ढंग से विकृत करके ऐसी संस्था रची जिसमें फिल्मी गीतों के माध्यम से समस्याएं उठाई जाती हैं। चुनाव लड़ने की प्रक्रिया को सस्ता करने पर नेताओं को औद्योगिक घरानों से धन नहीं लेना पड़ेगा तो उनकी हित रक्षा से भी वे बच जाएंगे। हाल ही में मोबाइल को आधार से जोड़ने के लिए भी लंबी कतार में खड़ा होना पड़ा। अंगूठे और ऊंगली के निशान मिलाने पर भी कभी कभी अंतर आता है क्योंकि हताशा में हाथ मलते रहने से भाग्य की रेखाएं बदल जाती हैं। आधार लिंक द्वारा सरकार के पास हर व्यक्ति की पूरी जानकारी होती है और अपनी आलोचना करने वालों पर उस जानकारी द्वारा दबाव बनाया जाता है।

कभी कभी भरम होता है कि संसद भूतपूर्व रजवाड़े और जमींदारों के जलसाघर की तरह बनती जा रही हैं जहां शब्दों का नृत्य जारी रहता है। संसद में दिए गए बयान के खिलाफ अदालत में मानहानि का दावा पेश नहीं किया जा सकता। ज्ञातव्य है कि संसद से जुड़े केन्टीन में सस्ते दामों में स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध होता है। सांसदों को मुफ्त रेल यात्रा की सुविधा भी प्राप्त है। अगर संसद से जुड़े केन्टीन में बाजार भाव से चीजें दी जाएं तो सांसद को यथार्थ की जानकारी मिल सकती है। प्राय: संसद में काम ठप हो जाता है परन्तु सांसदों के भत्ते जारी रहते हैं, सस्ते में स्वादिष्ट भोजन मिलता रहता है।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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Web Title: संसद में फिल्मी संवादों की गूंज और नेताओं के वादे!
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