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केसरबाग रोड निवास

फ्लैट के लिए 11.75% ब्याज पर लिया 23 लाख का लोन; दो के बजाय छह साल में भी पजेशन नहीं, रेरा ने मुआवजा दिलवाया महज पांच हजार...

Danik Bhaskar

Mar 02, 2018, 02:40 AM IST
फ्लैट के लिए 11.75% ब्याज पर लिया 23 लाख का लोन; दो के बजाय छह साल में भी पजेशन नहीं, रेरा ने मुआवजा दिलवाया महज पांच हजार


केसरबाग रोड निवासी शैलेंद्र सिंह भदौरिया ने 2012 में 25 लाख रुपए में तलावली चांदा स्थित एक कॉलोनी में फ्लैट बुक किया था। इसके लिए 23 लाख रुपए का लोन लिया था। 2014 में इन्हें पजेशन दिया जाना था, लेकिन निर्माण अब तक अधूरा है। भदौरिया ने पैसे वापसी के लिए रेरा (भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण) में केस लगाया। रेरा ने पिछले महीने ही फैसला दिया कि बिल्डर 10.5% ब्याज के साथ पूरा पैसा वापस करें। इसके साथ ही मानसिक क्षतिपूर्ति के रूप में बिल्डर से पांच हजार रुपए देने को कहा गया, जबकि एलआईसी से लिए गए होम लोन के लिए उन्होंने अधिकतम 11.75 प्रतिशत तक का ब्याज चुका दिया है। रेरा के न्याय निर्णायक अधिकारी ने अपने फैसले में तर्क दिया है कि उन्हें एसबीआई की वर्तमान दर के हिसाब से अधिकतम 10.5% ब्याज ही दिलवाया जा सकता है। ऐसा सिर्फ शैलेंद्र सिंह भदौरिया के साथ ही नहीं, बल्कि कई लोगों के साथ हुआ। रेरा ने पिछले महीने शहर से जुड़े पांच-छह फैसले इसी तरह दिए।

2017 में रेरा एक्ट लागू होने के बाद उम्मीद जगी थी कि प्रॉपर्टी खरीदने वाले लोगों को राहत मिलेगी। कुछ फैसलों में ऐसा हुआ भी, लेकिन अब खरीदारों को निराशा ही मिल रही है। एक तो पूरा पैसा भरने के बावजूद उन्हें सालों किराए के मकान में गुजारने पड़े। दूसरा, प्रोजेक्ट में देरी होने से उन्हें पुरानी दर से ही पैसे वापस किए जा रहे हैं, जबकि इन पांच साल के दौरान कलेक्टर गाइडलाइन के साथ-साथ प्रॉपर्टी की कीमतें भी बढ़ी हैं। नए सिरे से मकान खरीदने पर अब उन्हें 20 से 30% ज्यादा खर्च करना होगा।

चार साल देरी, मुआवजा पांच हजार

पुष्पा सिंह ने तलावली चांदा के एक प्रोजेक्ट में 2012 में फ्लैट बुक किया था। लोन लेकर साढ़े 16 लाख दिए, पर चार साल बाद भी उन्हें मौके पर निर्माण नहीं मिला। रेरा में नवंबर 2017 में मुकदमा लगाया था। तीन माह बाद आए फैसले में बिल्डर को महज 9% सालाना ब्याज के साथ पैसा लौटाने का आदेश दिया गया। पुष्पा सिंह को जो मानसिक त्रास हुआ उसके एवज में बिल्डर को महज पांच हजार रुपए देने को कहा गया है। जबकि आवेदन की फीस के एक हजार रुपए पुष्पा सिंह को ही भुगतना होंगे। यानी, पजेशन में चार साल की देरी पर उन्हें हर साल 1000 रुपए का ही मुआवजा मिला।

केस
8 साल में न फ्लैट मिला न मुआवजा तय नहीं

ऐसा ही संजीव दुबे के साथ हुआ। उन्होंने वर्ष 2008 में एक टाउनशिप में फ्लैट बुक किया था, जिसका पजेशन 2010 में मिलना था, लेकिन यह अब तक नहीं मिला, जबकि किस्तों में देरी पर अनुबंध में 24% की पेनल्टी का प्रावधान है। मुकदमा लगाने के पांच माह बाद भी मुआवजा तय नहीं हो पाया है।

केस
आवेदन की फीस ही एक हजार रुपए

रेरा में केस लगाने के लिए आवेदनकर्ता को एक हजार रुपए की फीस जमा करना पड़ती है। मानसिक क्षति पूर्ति के रूप में जो पांच हजार मिलेंगे, उनमें से भी एक हजार तो आवेदक को फीस के रूप में जमा करना है। वकील पर होने वाला पांच से 10 हजार का खर्च अलग। पेशियों में आने-जाने पर होने वाला समय और खर्च भी आवेदनकर्ता को भुगतना पड़ता है।

बिल्डर जमा किए पैसे लौटाएगा 10.5% की दर से, जबकि खरीदार बैंक को दे रहा इससे ज्यादा ब्याज

…... लेकिन बिल्डर को तो होता है दोहरा फायदा

किस्त में देरी पर 24% लेते हैं पेनल्टी

अधिकांश बड़े बिल्डर्स किस्त में देरी होने पर खरीदार पर पेनल्टी लगाने का प्रावधान रखते हैं। शहर की बड़ी टाउनशिप में से एक पारसनाथ डेवलपर्स में ही 24% ब्याज के साथ पेनल्टी वसूलने का प्रावधान है, जबकि 2010 में कॉलोनी विकसित का दावा करने का वादा अब तक पूरा नहीं हुआ है। न प्लॉटधारकों के पैसे लौटाए जा रहे हैं और न सभी खरीदारों को पजेशन दिया गया।

रेरा में अपील करने जा रहे हैं तो यह जरूर करें

किराएदारी का अनुबंध सुनिश्चित करें

कई आवेदनकर्ताओं ने मानसिक क्षतिपूर्ति के साथ मकान के किराए में हुआ खर्च भी मांगा है, लेकिन उन्हीं की गलती के कारण बिल्डर से भरपाई नहीं करवाई जा रही है। रेरा के न्याय निर्णायक अधिकारी का तर्क है कि आवेदनकर्ताओं ने मकान की किरायेदारी का अनुबंध नहीं जमा किया है। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि वह किराए के मकान में रह रहे हैं। हालांकि कानूनविदों का कहना है कि ऐसी स्थिति में किराए की सरकारी दर के हिसाब से भुगतान करवाया जाना चाहिए। कुछ मामलों में बिल्डर के खिलाफ मुकदमा लगाने वालों ने मेंटेनेंस की रसीदें पेश की हैं, जिन्हें फैसले में मान्य नहीं किया गया। इसलिए रेरा के समक्ष कोई मुकदमा लगाने जा रहे हैं तो किराएदारी का अनुबंध सुनिश्चित कर लें।

प्रोजेक्ट में देरी होने के बावजूद पुराने रेट में ही पैसे वापस मिल रहे, जबकि प्रॉपर्टी की कीमतें बढ़ गईं

बाजार की अपेक्षा कम देना पड़ता है ब्याज

बाजार में निजी स्रोतों से रुपए उधार लेने पर ब्याज दर दो से छह प्रतिशत सैकड़ा मासिक यानी 24 से 60% सालाना है। वहीं, रेरा में ब्याज की अधिकतम दर 11% सालाना निर्धारित है। यही रकम बिल्डर बाजार से उधार लेता तो उसे एक लाख पर सालाना 24 से 50 हजार रुपए चुकाना पड़ते। ऐसे में खरीदार को पजेशन में देरी होने पर इस दर पर भुगतान करना बिल्डरों के लिए फायदेमंद है।

पजेशन की तारीख तय करवाएं

फिलहाल रेरा में जो भी मुकदमे आ रहे हैं, उनमें से अधिकांश में बिल्डरों ने चालाकी से पजेशन की तारीख नहीं लिखी है। मुआवजा निर्धारण और पैसे वापस दिलाने के विवाद की स्थिति में यह महत्वपूर्ण बिंदु है। आप मकान खरीदने जा रहे हैं तो पजेशन में देरी की स्थिति में बिल्डर की क्या जवाबदारी होगी, यह भी अनुबंध में शामिल करवाएं। रेरा के दर्जनों मुकदमों में रेरा की तरफ से यह बात आ चुकी है कि अनुबंध में प्रावधान ही नहीं तो हम क्षतिपूर्ति कैसे दिलाएं? ज्यादातर अनुबंध में इस बात का उल्लेख ही नहीं है कि देरी होने पर छतिपूर्ति और ब्याज की दर क्या होगी? अतः प्राधिकरण को मजबूरन रेरा एक्ट के तहत तह ब्याज दर से मुआवजा निर्धारित करना पड़ता है।

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