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तेलों पर आयात शुल्क घटाने-बढ़ाने की प्रथा हमेशा के लिए बंद की जाए

केंद्र सरकार को आयात शुल्क बढ़ाने या घटाने वाली प्रथा को हमेशा के लिए तिलांजलि दे देना चाहिए। इससे न तो किसानों का...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 02:40 AM IST

केंद्र सरकार को आयात शुल्क बढ़ाने या घटाने वाली प्रथा को हमेशा के लिए तिलांजलि दे देना चाहिए। इससे न तो किसानों का भला होना है और न उपभोक्ताओं का। कुछ सटोरियों को जरूर अल्पकालीन लाभ मिल जाता है। नीति आयोग भारत में किस माह कितनी मात्रा में खाद्य तेलों की आवश्यकता है, उतनी ही मात्रा में आयात की मंजूरी देने की प्रथा लागू करना चाहिए। यदि यह पद्धति अपनाई गई तो तिलहनों का उत्पादन बढ़ने लगेगा और किसानों को अच्छे भाव मिलने लग सकते हैं। खाद्य तेलों की आपूर्ति बढ़ाने का एक मात्र विकल्प यही है कि देशी तिलहनों की पैदावार बढ़ाई जाए। बाजारों में धन की तंगी से ग्राहकी कमजोर चल रही है, किंतु खाद्य तेलों में बड़ी मंदी के संयोग कम है। कमजोर सोया प्लांट हर भाव पर तेल बेच जाते हैं।

खेरची में भाव बढ़े

केंद्र सरकार एवं नीति आयोग को खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटाना या बढ़ाने वाली नीति का बारीकी से परीक्षण कर हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए। पिछले दशकों में कई बार खाद्य तेलों पर आयात शुल्क बढ़ाए गए, किंतु तिलहनों का उत्पादन तो नहीं बढ़ा। यदि बढ़ा होता तो इतनी मात्रा में खाद्य तेलों का आयात नहीं करना पड़ता। आयात शुल्क बढ़ाने का सबसे बड़ा प्रभाव आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है। पिछले वर्ष सोया तेल 68 से 70 रुपए बिक रहा था, वर्तमान में 83 से 85 रुपए लीटर बिकने लगा है। आखिर आयात का भार गरीब उपभोक्ताओं पर क्यों डाला जा रहा है। इसके अलावा तिलहनों का उत्पादन भी तो नहीं बढ़ रहा है। ऐसे में तेल उद्योग द्वारा बार-बार शुल्क बढ़ाने की मांग करना उचित नहीं कहा जा सकता है। केंद्र सरकार को इस संबंध में स्पष्ट आदेश निकाल देना चाहिए, जिससे वायदों में आए दिन सट्टेबाजी होती है, उस पर भी रोक लगे।

मिलावट को प्रोत्साहन

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि उद्योग द्वारा आए दिन शुल्क बढ़ाने की मांग करने से थोक-खेरची व्यापारियों की नींद हराम होती रहती है, क्योंकि खड़े सौदों में विवाद पैदा होते हैं, इसके अलावा खाद्य तेलों के भाव बढ़ने से ग्राहकी कम पड़ जाती है। मिलावट का दौर अलग से शुरू हो जाता है। भारतीय संस्कृति में यह अजब स्थिति है कि जो जिंस सस्ती बिकती है, वह शुद्ध होती है और जो महंगी होती है, उसमें मिलावट के अवसर अधिक पैदा हो जाते हैं। वर्तमान में मिलावट का दौर चालू है। केंद्रीय और राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रालय के बारे में लिखने का मतलब है, अपनी कलम की स्याही को खराब करना है। राज्यों के स्वास्थ्य विभाग स्वयं होकर संज्ञान क्यों नहीं लेते हैं? वर्तमान में खाद्य तेल, वनस्पति, नकली घी के अलावा अनेक वस्तुएं खुलकर मिलावटी या नकली बिक रही है। इसे कहते हैं रामराज्य। ऐसा रामराज्य तो कभी नहीं देखा है। आम व्यक्तियों के स्वास्थ्य के साथ खुली खिलवाड़ हो रही है।

भारतीय वस्तुओं पर निगाह

हाल ही में अमेरिका-चीन ट्रेड वार में अमेरिका की निगाह-भारत की वस्तुओं पर भी चली गई है। देखना यह है कि आगे क्या प्रभाव पड़ता है। यदि कुछ छेड़छाड़ होती है तो भारतीय निर्यात की स्थिति जोखिम भरी हो सकती है। इसके लिए भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। विशेषज्ञों का मत है कि आयात शुल्क बढ़ाने की बजाए अल्प समय के लिए खाद्य तेलों का आयात रोक दें। देश में सीजन के समय कितनी मात्रा में और ऑफ सीजन के समय कितनी मात्रा में खाद्य तेल की आवश्यकता होती है। उन महीनों में उस मात्रा में खाद्य तेलों के आयात की अनुमति देना चाहिए। वर्तमान में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विदेशों से खाद्य तेल लाना और भारतीय बाजारों में उड़ेलना ही एकमात्र उद्देश्य रह गया है। इस वजह से तेल उद्योग संकट में आ गया और तिलहन उत्पादक किसानों की खेती नष्ट हो गई।

दर्शन दुर्लभ हो जाएंगे

वर्षों से तिलहनों के लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहे हैं, कुछ किसान पारंपरिक तौर पर खेती कर रहे हैं, जिससे सरसों, सोयाबीन, मूंगफली एवं तिल्ली की खेती हो रही हैं। जिस दिन किसानों के मन में बदलाव की भावना आ जाएगी, तिलहनों के दर्शन दुर्लभ हो जाएंगे। वर्षों पूर्व मूंगफली, तिल्ली और सरसों की खेती बड़ी मात्रा में होती थी। खाद्य तेलों का आयात भी काफी कम था।

केंद्रीय एजेंसियां खरीदी-बिक्री बंद करें

केंद्र सरकार के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने पिछले कुछ महीनों से वर्ष 2022 में समर्थन मूल्य से डेढ़ गुना किसानों को मूल्य दिलाने की बात बार-बार कहीं जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से समर्थन मूल्य के साथ बोनस की घोषणा भी की जा रही है। समर्थन मूल्य और बोनस के बाद अधिकृत मूल्य काफी ऊंचा हो जाता है। जिस पर उत्पादक खरीदी करने का दबाव डालते हैं। पिछले महीनों में गुजरात में मूंगफली रखने के लिए गोदाम खाली मिलना मुश्किल हो गए थे। किसान चाहते हैं कि यदि समर्थन मूल्य की घोषणा की गई है तो सरकार उसकी पूरी फसल को खरीदें, किंतु यह कभी भी संभव नहीं है। इतना रुपया न तो सरकार के पास है और न रखने के लिए गोदाम। अत: सरकार को खरीदी-बिक्री का व्यापार करना छोड़ देना चाहिए। व्यापार करना सरकार का काम नहीं है। ऐसे सरकारी अड़ंगों से व्यापार पूरी तरह से खराब हो रहा है। इसका भी बारीकी से अध्ययन कर लेना चाहिए। कारोबार जिन्हें सौंप रखा है, उन्हें भी करने दें।

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