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यूनिवर्सिटी में वरिष्ठता का नियम तोड़कर प्राचार्य काेटे से बनाए कार्यपरिषद सदस्य, उठे गंभीर सवाल

देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी की कार्यपरिषद में प्राचार्य कोटे से की गई नियुक्तियों में बड़ी चूक सामने आई है।...

Dainik Bhaskar

May 03, 2018, 02:40 AM IST
देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी की कार्यपरिषद में प्राचार्य कोटे से की गई नियुक्तियों में बड़ी चूक सामने आई है। यूनिवर्सिटी की तरफ से जो नाम भेजे गए और राजभवन से तय होकर आए, उनमें नियमों की अनदेखी की गई। यूनिवर्सिटी एक्ट की धारा 23-4 के तहत वरिष्ठता सूची की प्राथमिकता के आधार पर प्राचार्यों को सदस्य बनाया जाना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिन तीन प्राचार्यों का वरिष्ठता सूची में सबसे आगे नाम था, उनके बजाय चौथे से छठे नंबर की वरिष्ठता वाले प्राचार्यों को सदस्य बना दिया गया। यूनिवर्सिटी की इस बड़ी चूक पर गंभीर सवाल उठे हैं। विरोध भी शुरू हाे गया है। वहीं यूनिवर्सिटी प्रबंधन मामले में चूक तो मान रहा, लेकिन इसके पीछे तकनीकी वजह बता रहा।

कैसे हुई चूक

दरअसल, धारा 23-4 के तहत प्राचार्य कोटे से कार्यपरिषद में चार सदस्यों की नियुक्ति की जाती है। तीन पद खाली थे। वरिष्ठता में पहला नंबर डॉ. राजेश व्यास और दूसरा नंबर डॉ. तरनजीत सूद का था। चूंकि ये दोनों पहले ही सदस्य रह चुके हैं, इसलिए तीसरे, चौथे और पांचवें नंबर वाले प्राचार्यों का चयन होना था। इसमें डेंटल कॉलेज के प्रो. बंजारा, जीएसीसी की प्रिंसिपल डॉ. वंदना अग्निहोत्री और क्लॉथ मार्केट गर्ल्स कॉलेज के प्राचार्य डॉ. मंगल मिश्रा के नाम थे, लेकिन इन तीनों में से किसी को भी सदस्य नहीं बनाया गया, जबकि इनके बाद वाले डॉ. सुमित्रा वास्केल और डॉ. कुसुम लता निंगवाल के नाम तय हो गए।

तकनीकी खामी के कारण हुआ

कुलपति प्रो. नरेंद्र कुमार धाकड़ के मुताबिक, नियमों के तहत ही नियुक्ति हुई है, अगर एक-दो नाम की बात है तो ऐसा तकनीकी खामी के कारण हुआ है। मैंने पूरी फाइल मांगी है। जहां संशोधन की गुंजाइश होगी करेंगे। पहले यह देख रहे हैं कि क्या वाकई में नियुक्ति में वरिष्ठता का उल्लंघन हुआ है। फिर आगे की प्रक्रिया तय करेंगे।

ये चूक चौंकाने वाली है

क्लॉथ मार्केट गर्ल्स कॉलेज के प्राचार्य प्रो. मंगल मिश्रा के मुताबिक, कार्यपरिषद जैसी महत्वपूर्ण और यूनिवर्सिटी की सर्वोच्च बॉडी के नाम तय करते समय ये चूक वाकई चौंकाने वाली है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि वरिष्ठता सूची को आखिर किस आधार पर नजरअंदाज किया गया। तीन में से एक भी नाम शामिल नहीं किया गया।

क्या कहता है नियम?

एक्ट 1971 की धार 23-4 में स्पष्ट उल्लेख है कि प्राचार्य कोटे में दो सरकारी कॉलेज के प्राचार्य होंगे। यह चयन वरिष्ठता के आधार पर होगा और रोटेशन से ही होगा।

कार्यपरिषद सदस्यों की नियुक्ति

दरअसल, यूनिवर्सिटी के तमाम फैसलों का अधिकार कार्यपरिषद के पास होता है। ऐसे में सदस्य का रोल बेहद अहम होता है। चूंकि कॉलेजों का परीक्षा-रिजल्ट, डिग्री और मूल्यांकन को लेकर यूनिवर्सिटी से सीधा जुड़ाव होता है, इसलिए प्राचार्य कोटे के सदस्यों की भूमिका बेहद अहम होती है।

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