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जनरल बाजवा के बयान का मतलब क्या है?

पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल उमर जावेद बाजवा अचानक बहुत मुखर हो गए हैं। हाल में वे कई मंचों से अपने देश के लिए आगे की...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 03, 2018, 02:40 AM IST

जनरल बाजवा के बयान का मतलब क्या है?
पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल उमर जावेद बाजवा अचानक बहुत मुखर हो गए हैं। हाल में वे कई मंचों से अपने देश के लिए आगे की राह को लेकर विचार रख रहे हैं और कई बार तो पड़ोसियों को भी सलाह दे रहे हैं। काकुल में पाकिस्तान सैन्य अकादमी के कैडेटों की पासिंग आउट परेड के मौके पर दिए भाषण में उन्होंने सुझाव देते हुए कहा, ‘कश्मीर के मूल मुद्दे सहित भारत-पाक विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का रास्ता व्यापक और सार्थक संवाद से ही होकर जाता है।’ देश की विदेश नीति निर्धारण में पाक फौज की केंद्रीयता को देखते हुए इसके महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि जनरल बाजवा का यह कहना कि पाकिस्तान एक शांतिप्रेमी देश है, जो सारे देशों के साथ, खासतौर पर पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण संबंध चाहता है, नई दिल्ली व काबुल को पाखंडपूर्ण लग सकता है।

मार्च में पाकिस्तानी मीडिया से ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में जनरल बाजवा यह कहते दिखाई दिए थे कि जहां फौज पाकिस्तान के नागरिक लोकतंत्र को पटरी से नहीं उतारना चाहती लेकिन, यदि राजनेता अक्षम नज़र आए तो यह खड़े होकर देखती नहीं रहेगी। जब पाकिस्तान की न्यायपालिका का मुख्यधारा के राजनीतिक दलों खासतौर पर पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) से टकराव हो रहा था तो उन्होंने नेताओं को सबक सिखाने की न्यायपालिका की भूमिका का पक्ष लिया था। विदेश नीति पर पाकिस्तानी फौज के मुखिया ने इस आरोप से इनकार किया था कि वह प्राय: ऐसे घृणास्पद पड़ोसी की भूमिका निभाता है, जो दूसरों को अस्थिर करने का प्रयास करता है। उन्होंने जोर दिया था कि ‘पाकिस्तान को ऐसे स्वाभीमानी, शांतिप्रेमी देश के रूप में स्थापित करना उनका उद्देश्य है, जो दुनिया के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व चाहता है।’ लेकिन, कहीं उन्हें गलत न समझ लिया जाए इसलिए उन्होंने दावा किया कि ‘यदि भड़काया, धमकाया या दबाव डाला गया तो पाक शत्रु को पूरी सैन्य शक्ति दिखाएगा।’ बताते हैं कि उन्होंने कहा है कि मोदी सरकार बात न करने को लेकर अड़ियल रवैया दिखा रही है।, ‘लेकिन, दो से तीन साल के भीतर अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण उसे अहसास होगा कि उसे पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता की जरूरत है।’

इन बयानों को बाजवा डॉक्ट्रिन का नाम दिया गया है। जिससे फिर संकेत मिलता है कि कैसे पाकिस्तानी फौज न सिर्फ पाकिस्तान की विदेश नीति में बल्कि लोकतंत्र के भी अंतिम मध्यस्थ होने की भूमिका पर जोर देने की कोशिश कर रही है। 2013 में प्रधानमंत्री के रूप में नवाज शरीफ का लौटना पाकिस्तानी लोकतंत्र में उच्चांक था। पहली बार चुनाव के माध्यम से एक से दूसरी सरकार को सत्ता का राजनीतिक हस्तांतरण हुअा था। लेकिन, जल्दी ही पाकिस्तान के सैन्य-खुफिया तंत्र ने वापसी कर पाकिस्तान के नागरिक शासन के लिए लाल रेखाएं खींच दी थीं। पिछले साल शरीफ पाकिस्तान के 18वें ऐसे प्रधानमंत्री बने थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपात्र करार देने के बाद कार्यकाल पूरा किए बिना इस्तीफा देना पड़ा था। पिछले माह की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 62(1)(एफ) का इस्तेमाल करते हुए नवाज शरीफ के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया। इस अनुच्छेद में निर्वाचित प्रतिनिधियों से बेदाग चरित्र की अपेक्षा की जाती है। राजनीतिक क्षेत्र में इसे शरीफ का पतन मानकर जश्न मनाया गया। उन्हें अहसास नहीं था कि यहां उनके भी पर कतरे गए हैं। पाकिस्तान में लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था ढह रही है और जिन राजनीतिक दलों को इसका विरोध करना चाहिए था उन्हें इसकी दीर्घावधि राजनीतिक कीमत का अहसास ही नहीं है।

पीएमएल (एन) के नेता बनने वाले नवाज के भाई शाहबाज शरीफ पंजाब के मुख्यमंत्री हैं अौर वे चुनाव बाद प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी होंगे पर उन्हें भी न्यायपालिका के खिलाफ नवाज़ के बयानों से खुद को अलग करने में संघर्ष करना होगा। इन बयानों में उन्होंने उचित ही कहा था कि न्यायपालिका फौज का ही विस्तार हो गई है। फौज-न्यायिक गठबंधन से यह पक्का होगा कि कमजोर सरकारें आम बात हो जाएगी और इस तरह सत्ता का संतुलन फौज के पक्ष में हो जाएगा। फिर इसका मतलब नहीं है कि अर्थव्यवस्था गोता खा जाए और हाल में हासिल सारी उपलब्धियां गंवा दी जाए। पाकिस्तान में आसन्न चुनाव और कमजोर नागरिक सरकार होने के अासार दिन ब दिन बढ़ने के साथ भारत के विकल्प और भी सीमित हो जाएंगे। इमरान खान की पाकिस्तान तेहरीक-ए-इंसाफ को कई लोग पाकिस्तान के चुनाव में सबसे आगे देख रहे हैं लेकिन, यह अपने बल पर बहुमत प्राप्त करने के नजदीक भी नहीं है। पाकिस्तान से चर्चा में कठोर रवैया अपनाने के बाद भी नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच परदे के पीछे संवाद जारी है। इस बात की संभावना नहीं है कि भारत के रवैये में निकट भविष्य में कोई बदलाव आएगा, क्योंकि वहां भी अगले साल होने वाले चुनाव असर डालने लगेंगे।

भारत अब चीन के साथ अपना ‘विराम’ खोजने की कोशिश कर रहा है और इसका कुछ असर भारत-पाकिस्तान संबंधों पर भी पड़ेगा। यदि चीन भारत के साथ दोनों के लिए फायदेमंद भागीदारी के वाकई पक्ष में है तो फिर इसे पाकिस्तान को भारत के साथ किसी प्रकार की सहमति की ओर धकेलना होगा। भारत लगातार वैश्विक स्तर पर ऊंचा उठ रहा है जबकि पाकिस्तान सामाजिक-आर्थिक संकट में फंसा हुआ है। इसके कारण पाक फौज में आई हताशा और भी स्पष्टता से महसूस की जा सकती है। नई दिल्ली इंडो-पेसिफिक शक्ति के रूप में उभरना चाहती है वहीं भारत के साथ अपनी समानता बरकरार रखने का उत्सुक पाकिस्तान अब भी दुनिया को अपने वैचारिक चश्मे से ही देखता है। इस तरह वह भारत को कमजोर करने और रियायतें पाने के लिए जेहादी आतंकवाद का इस्तेमाल जारी रखे हुए है। ‘हिंदू इंडिया’ का हव्वा पाकिस्तानी सत्ता में देश के अंतिम तारणहार के रूप में पाकिस्तानी फौज का दर्जा बनाए रखता है। फौज आज राष्ट्र की विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और रोजमर्रा के शासन के केंद्र में है। इसी से अगस्त 2018 में होने वाले चुनाव की रूपरेखा तय होगी। जहां तक भारत का सवाल है जनरल बाजवा के हाल के बयान वैसे ही हैं। वे सिर्फ यह संकेत दे रहे हैं कि अब पाकिस्तानी फौज का पूरा नियंत्रण है। इससे न अधिक कुछ है और न कम। शुक्र है कि इसके प्रति भारत में ज्यादातर लोग जागरूक हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

हर्ष वी पंत प्रोफेसर, इंटरनेशनल रिलेशन्स, किंग्स कॉलेज, लंदन

harsh.pant@kcl.ac.uk

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