विवाद पर काफी ऊर्जा, संपत्ति खर्च हुई; अब शिक्षा, सेहत और आवास सुधारने की बारी

Dhar News - अयोध्या के विवादित भूमि पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णायक फैसले का स्वागत इसलिए भी अवश्य किया जाना चाहिए कि इससे शांति...

Bhaskar News Network

Nov 10, 2019, 07:40 AM IST
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अयोध्या के विवादित भूमि पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णायक फैसले का स्वागत इसलिए भी अवश्य किया जाना चाहिए कि इससे शांति और सद्भाव का वातावरण बनने, साम्प्रदायिक उन्माद शांत होने और वास्तविक विकास की दिशा में तेज़ी से बढ़ने की राह खुलती है। इसका कोई ठीक-ठीक हिसाब नहीं बन सकता कि 1980 के दशक से राम मंदिर-बाबरी मस्ज़िद का जो विवाद वोटों की राजनीति में बदला उसने मानव-विकास का कितना बड़ा नुकसान किया। उत्तर प्रदेश के सरकारी खजाने पर तो इस विवाद ने डाका डाला ही, उत्तर भारतीय राज्यों की अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा नकारात्मक असर पड़ा। सरकारों की जितनी ऊर्जा और सम्पत्ति इस विवाद ने खर्च कराई, वह हमारे जैसे पंथ-निरपेक्ष देश के लिए तो शर्मनाक है ही, शिक्षा, चिकित्सा, आवास और ग्रामीण-विकास जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ते जाने का बड़ा कारण भी है।

उत्तर प्रदेश को ही लें तो यहां सरकारी विद्यालयों में पांचवीं में पढ़ने वाले 43 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा का हिंदी पाठ नहीं पढ़ पाते। सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा का हाल इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रदेश में प्रति व्यक्ति चिकित्सा-व्यय मात्र 1112 रु. सालाना है और पिछले नौ साल से इसमें वृद्धि नहीं हुई है। गोरखपुर समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश में दिमागी बुखार से हर साल सैकड़ों बच्चे मरते और उससे ज़्यादा अपंग हो जाते हैं। राजधानी लखनऊ के अस्पतालों में भी आवश्यकता से बहुत कम वेंटीलेटर हैं। खेती और किसान लगातार उपेक्षित हैं। तमाम दावों के बावज़ूद गंगा नदी इतनी गंदी है कि कुंभ के दौरान संगम पर थोड़ा साफ पानी पाने के लिए नदी किनारे के सभी कल-कारखाने बंद करने पड़े। गउद्योगों के मामले में यह देश के सबसे पिछड़े प्रदेशों में गिना जाता है। विकास के कुछ मानकों पर तो बिहार से भी पीछे है। पिछड़ेपन का एकमात्र कारण अयोध्या विवाद नहीं रहा लेकिन यह भी सच है कि इस झगड़े ने सरकारों और प्रशासन को विकास-केंद्रित होने के दबाव से मुक्त रखा. इससे उपजी अशांति ने, वोटों के लिए इसकी राजनीति ने समाज को गहरे बांटा। परिणामस्वरूप जिस जनता को अपनी मूल आवश्यकताओं के लिए सरकारों पर दबाव बनाना था, विकास को चुनावी मुद्दा बनाना था, वह मंदिर-मस्ज़िद की भावनाओं के ज्वार बहती रही। एक सुखद तथ्य यह रहा कि 1992 में बाबरी मस्ज़िद-ध्वंस के बाद भी अयोध्या ने साम्प्रदायिक सद्भाव नहीं खोया। जब देश उबल रहा था और अयोध्या के पड़ोसी जिले भी तनावग्रस्त थे। तब भी अयोध्या शांत रही और विवाद के हिंदू-मुस्लिम वादी-परिवादी एक ही रिक्शे पर बैठकर कोर्ट आते-जाते रहे। 1992 से पहले बाबरी मस्ज़िद और साथ का राम चबूतरा एवं सीता रसोई तक लोगों का आना-जाना सहज था, वहीं छह दिसम्बर 1992 के बाद विवादित स्थल के इर्द-गिर्द केंद्रीय बलों की छावनी कायम हो गई। रामलला के दर्शन दुर्लभ हो गए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले किए गए भारी सुरक्षा बंदोबस्त से ज़रूर अयोध्या कुछ सहमी है। अयोध्यावासियों को पता नहीं कब तक अपनी सद्भावपूर्ण विरासत का इम्तेहान देना होगा। राम मंदिर तो अब भव्य बनेगा ही, क्या उम्मीद की जाए कि बढ़िया शिक्षा और बेहतरीन चिकित्सा देने वाला अस्पताल भी अयोध्या के हिस्से आएगा?

इस फैसले के बाद सांप्रदायिक उन्माद शांत होने और वास्तविक विकास की दिशा में तेजी से बढ़ने की राह खुलती है

सद् भाव

अयोध्या के बहु-विवादित बाबरी मस्ज़िद-राम जन्मभूमि विवाद के सुखद कानूनी पटाक्षेप के बाद क्या राजनीति की दिशा बदलेगी?

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