देशी चने का व्यापार, बड़ी कंपनियों के हाथ
गुड़ की आवक कमजोर होने से भाव घटे
नई दिल्ली| आवक की अपेक्षा मांग कमजोर होने से हाल ही में गुड़ के भाव 300 रुपए प्रति क्विंटल घट गए। भविष्य में इसमें घटने की गुंजाइश नहीं है। मौंसम साफ होने के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मंडियों से आवक बढ़ने तथा मांग कमजोर होने से एक माह के दौरान गुड़ के भाव 300 रुपए गिरकर गुड़-पेड़ी 2700 से 2800 रुपए, चाकू 2800 से 2900 रुपए तथा ढैया के भाव 2900 से 3000 रुपए प्रति क्विंटल रह गए। गत वर्ष इन दिनों इसके भाव 2600 से 2800 रुपए प्रति क्विंटल थे। मुजफ्फरनगर मंडी में भी 7 से 8 हजार कट्टों के लगभग होने से गुड़ के भाव 50 से 75 रुपए घटकर चाकू 1000 से 1030 रुपए, लड्डू 1050 से 1080 रुपए तथा खुरपा के भाव 980 से 1000 रुपए प्रति 40 किलो रह गए। मंडी में गुड़ का स्टॉक 4.78 लाख कट्टों के लगभग का रहा। जो कि गत वर्ष 2.20 लाख कट्टे कम है। हापुड़ मंडी में भी आवक बढ़ने से गुड़ बाल्टी के भाव 100 रुपए गिरकर 950 से 960 रुपए प्रति 40 किलो रह गए। मुंबई में भी गुड़ के भाव उठाव न होने से 3500 से 4000 रुपए 400 रुपए प्रति क्विंटल नीचे आ गए।
नई दिल्ली| देशी चने का व्यापार बड़ी कंपनियों के हाथ में चले जाने से बाजार में माल आने व बिकने से तेजी-मंदी की धारणा समाप्त हो गई है तथा पूरे वर्ष को देखकर ऐसा लगा है कि कारोबारी चने के व्यापार में लाभ की बजाय खोए ही हैं।
गत सीजन वर्ष 2019 की फसल वर्ष में देशी चने का व्यापार, कारोबारियों के लिए बहुत ही निराशाजनक रहा। इस पर सरकार की ओर से ध्यान न देकर केवल बाजारों में मंदा फैलाना ही उद्देश्य देखा गया। विडंबना यह रही कि देशी चने का समर्थन मूल्य 4875 रुपए प्रति क्विंटल होने के बावजूद डिब्बे में चने का व्यापार 600 से 800 रुपए प्रति क्विंटल तक नीचे हुआ तथा फिर भी सरकार मौन बैठी रही। इस स्थिति में जब भी कारोबारियों ने देशी चने की खरीद की, उनको भारी नुकसान हुआ। कारोबारी अपना नाम न छपवाने की शर्त पर यह कहते रहे कि सरकारी चना, नेफेड जैसी एजेंसी द्वारा 4000 रुपए से नीचे बेच दिया गया जिससे व्यापारी तो नुकसान में रहे ही, किसानों को भी इसका नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि किसानों द्वारा चना जून तक ही बेच दिया गया था जिसमें मुश्किल से 10 से 15 प्रतिशत किसानों ने सरकार को समर्थन मूल्य पर बेचा होगा। जबकि 80-85 प्रतिशत किसानों का चना मंदे भाव पर बिका। सरकार द्वारा 4620 रुपए पर खरीदा गया चना 3950 से 4000 रुपए में बेच देने से राजस्व की कितनी हानि हुई होगी, वह विभाग ही जानता होगा। अत: सरकार को आपात स्थिति में बफर स्टॉक को बेचना चाहिए। इस बार तो कोई ऐसी तेजी भी नहीं आ पाई थी। देशी चने के अलावा इसके कई उदाहरण गत 3 सालों में मसूर, मूंग, तुवर, उड़द एवं सरसों में भी देखा गया है। अत3 सरकार को यह पता लगाना चाहिए कि डिब्बे में अनावश्यक मंदा किसके इशारे पर आता है एवं क्यों आता है?