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वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक प्रकोप से तेल व तिलहन बाजार बेहाल

एक वर्ष पहले
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कारोबारी केवल स्टॉक हल्का करने का प्रयास करें


वैश्विक स्तर की अर्थ व्यवस्था कोरोना वायरस की चपेट में आ गई है। प्रत्येक देश इस बीमारी से बचने के उपाय करने में व्यस्त है और कारोबारी असमंजस्य की स्थिति में होने से कारोबार बंद कर दूर खड़े होने लगे हैं। कारोबार में करोड़ों का घाटा लग रहा है, वह अलग से। इसे प्राकृतिक प्रकोप की संज्ञा दी जा रही है। कोरोना वायरस एक महायुद्ध बन गया है। इसके भय से वस्तु बाजारों में भाव रेत के पहाड़ की तरह ढेर हो रहे हैं अथवा बर्फ के पहाड़ की तरह पिघलते जा रहे हैं। यह आर्थिक मंदी के बाद एक अनजान संकट है, जिसका वैश्विक स्तर पर प्रभाव पड़ रहा है। बाजार पर पिछले कुछ दिनों से इस बीमारी का प्रभाव घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है।

10 माह के निचले स्तर पर

अमेरिका का तेल बाजार पिछले 10 माह के निचले स्तर पर पहुंच गया है। इस सप्ताह सोया तेल 8 प्रतिशत से अधिक टूट चुका है। डब्ल्यूएचओ द्वारा कोरोना वायरस को महामारी घोषित करने के बाद विश्व के कई देशों के शेयर, धातु, क्रूड तेल एवं वस्तु बाजारों में गिरावट आई है। शुक्रवार को मलेशिया में वायदा कुछ स्थिर जरूर हुआ था किंतु सोमवार को बाजार नहीं टूटेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। कोई भी फंडामेंटल ऐेसे दिखाई नहीं दे रहे हैं, जिससे सीपीओ वायदे में स्थिरता आ जावे। पिछले 2-3 दिन में मलेशिया, शिकागो, अर्जेंटीना एवं यूक्रेन में तेल के भाव टूटे हैं। उसके बाद मांग बढ़ने के बजाय घटती जा रही है। रुपए की कमजोरी कारोबार को और खराब करेगी। भारत में तेल आयात प्रति माह घट रहा है, उसके बाद भावों में गिरावट आ रही है। अत: सामान्य खपत भी नहीं हो रही है जबकि अन्य देशों की अपेक्षा भारत की स्थिति कोरोना वायरस के संबंध में काफी अच्छी है। केंद्र-राज्य सरकारें अभी से सजग हो गई है। सार्वजनिक समारोह एवं कई जगह सिनेमा घर, स्कूल, कॉलेज बंद कर दिए गए हैं।

दीपावली मुहूर्त में 761 रुपए

उल्लेखनीय है कि दीपावली मुहूर्त पर सोया तेल 761 रुपए बिक गया था। बाद में धीरे-धीरे देश के 2-4 विख्यात बेलगाम सटोरिए बाजार पर पकड़ बनाते गए और बिना मांग के प्रतिदिन 10 रुपए (प्रति 10 किलो) भाव बढ़ाते गए। वायदे में तेजी चल ही रही थी, चलती गाड़ी में हाजर वाले कारोबारी बैठ गए और तेजी को बल देते गए। सटोरियों एवं हाजर वालों ने एक बार भी नहीं सोचा कि क्या सही कर रहे हैं या गलत। शायद सट्‌टेबाजों के पास सोचने का इतना समय नहीं होता है और न हीं वे इस तरह की चिंता पालते हैं। इतनी बड़ी तेजी के बाद केंद्र सरकार ने भी चुप्पी साध रखी थी। बाजार में उपभोक्ता मांग 761 के भाव पर नहीं थी और न 950 रुपए के भाव पर। अत: बाजार को पुन: लौटना ही था, किंतु सटोरियों एवं हाजर व्यापारियों को यह पता था कि आगामी महीनों में 12-13 लाख टन तेल के आयात के बजाय 10 लाख टन के आसपास होगा, अत: एक बार पुन: 950 रुपए के स्तर पर ले जाने का प्रयास करेंगे। इसमें सटोरिए गोता खा गए। भाव धीमी गति से घटाने पड़ रहे हैं।

सटोरिए, हाजर बाजार चपेट में

वर्तमान में आ रही मंदी प्राकृतिक है जिसकी चपेट में आयातक, सटोरिए, हाजर कारोबार करने वाले, रिपैकिंग कर कम वजन एवं मिलावटी तेल भरने वाले सभी आ गए हैं। पिछली तेजी में जिस तरह से उपभोक्ताओं को मार पड़ी थी, इस बार मार मारने वालों का नंबर लग गया। दीपावली बाद से अभी तक 40 रुपए की तेजी-मंदी हो गई है। पिछली तेजी में 20 रुपए किलो बढ़ाए थे। कोरोना वायरस के भय ने 20 रुपए किलो की मंदी अल्प समय में ला दी है। यह मंदी अभी भी रुकी नहीं है। ऐसा माना जा रहा है कि यह मंदी कहां जाकर रूकेगी, इसका आंकलन तो तेजी करने वाले चतुर सटोरिए भी नहीं कर पा रहे होंगे। सर्वाधिक नुकसान शायद आयातकों को हो रहा होगा। सामान्यत: पोर्ट पर पड़तल से नीचे बेचना उनकी आदत में है, किंतु इस बार उन पर कोरोना वायरस भारी पड़ रहा है।

आयात-निर्यात ठप

बंदरगाहों पर कंटेनर सुगमता से उपलब्ध नहीं है। लेवाल यह सोचने लगे हैं कि माल बुलवाकर क्या करूंगा? यदि कंटेनर बंदरगाह पर ही खड़े रह गए तब माल खराब होने की स्थिति बन सकती है। सोया डीओसी मांग रहे हैं किंतु निर्यात चैन पूरी तरह से टूट गई है। अत: आयात-निर्यात कारोबार एक नहीं अनेक देशों के साथ ठप पड़ गया है। इसे किसी भी देश के लिए खरतनाक स्थिति मानना चाहिए। हालात यह हो गई है एयरपोर्ट पर रवाना होने के पहले 6-6 घंटे तक इंतजार करना पड़ता है। भारत में एवं कुछ अन्य देशों में कंटेनर बंदरगाह पर खड़े हैं। आगे-पीछे होने की स्थिति नही बन रही है। वास्तव में सभी तरह के माल का उठाव ठप पड़ गया है और लॉव-लॉव की स्थिति भी नहीं बन सकी है।

स्टॉकिस्टों को नुकसान

पिछले सीजन में मप्र में बाढ़ एवं अतिवृष्टि से सोयाबीन का उत्पादन पिछले वर्ष की अपेक्षा काफी कम हुआ है। इसी धारणा से कुछ बड़े किसान एवं स्टॉकिस्ट नया माल आते ही गीला, सूखा, दागी सभी से गोदाम भरते गए। स्टॉकिस्टों ने 3700 से 3900 रुपए के भाव से स्टॉक किया था। स्टॉक किए 5-6 माह होने आए हैं। इस माल पर ब्याज-भाड़ा, सूखत जोड़कर 500 रुपए की लागत और बढ़ गई। वर्तमान में प्लांट डिलीवरी सोयाबीन 3500 रुपए हो गया है। आगे अभी कितना और घटेगा, इसका आंकलन अभी नहीं किया जा सकता है। अत: सोयाबीन स्टॉकिस्ट भी कोरोना वायरस की चपेट में आ गए। मप्र में कुछ प्लांट दिखावे के लिए भाव खोल रहे हैं। उनके पास शायद माल नहीं है।

पहली बार ऐसा कोहराम मचा


बीते वर्ष में दीपावली बाद से आज तक तेल-तिलहन बाजार में ऐसा कोहराम मचा हुआ है, जिसका वर्णन करना कठिन है। इस बाजार में स्थिरता कब आएगी, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। वर्तमान में तेल बाजार में आ रही वैश्विक मदी है। ऐसा माना जा रहा है कि यह तो अभी शुरुआत है। अंत कब होगा, यह कोई नहीं जानता। वैश्विक स्तर पर मांग ठप पड़ गई है। जब रेस्टोरेंट, सिनेमा घर, स्कूल, कॉलेज, शादी-समारोह आदि स्थगित किए जा रहे हो, तब खपत में गिरावट आना स्वाभाविक है। अब विश्व के कुछ अन्य देशों में स्थिति बिगड़ने लगी है। इसके अलावा चीन में सुधार कब आएगा, यह कोई नहीं जानता। चीन एक चुस्त चालक देश है। वहां की खबरें बाहर नहीं आ सकती है। सरकार का पूरी तरह से सख्त नियंत्रण है। यदि उसे लगेगा कि उसके द्वारा उद्योग बंद करने से अन्य देशों को नुकसान हो रहा है, तब शायद उद्योगों को और अधिक दिन तक बंद रखेगा। अन्य देशों की अर्थ व्यवस्था बिगड़ने में सहयोग करेगा। चीन का अमेरिका नंबर एक का दुश्मन है। उसे भी सबक सिखाने का प्रयास करता रहता है और अमेरिका भी ऐसा ही करता है।


भारतीय बाजारों में सोयाबीन में और भी गिरावट संभव


वैश्विक ऑयल काम्प्लेक्स दबाव में होने से तिलहन भी मंदे


कभी-कभी कारोबार नहीं करने पर लाभ होता है
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