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समय की कमी महसूस करने वाले लोग चिंता और अवसाद से घिरे रहते हैं

Dhar News - 55 प्रतिशत अमेरिकी सवैतनिक अवकाश का भी उपयोग नहीं कर पाते आधुनिक दौर में बहुत लोग सोचते हैं कि उनके पास समय की...

Feb 16, 2020, 07:16 AM IST
Dhar News - mp news people who are short of time are surrounded by anxiety and depression

55 प्रतिशत अमेरिकी सवैतनिक अवकाश का भी उपयोग नहीं कर पाते

आधुनिक दौर में बहुत लोग सोचते हैं कि उनके पास समय की कमी है। दरअसल, हमारा कीमती वक्त कई फिजूल कामों में बेकार होता है। इस वजह से हम जिंदगी का वास्तविक आनंद नहीं उठा पाते हैं। प्रोडक्टिविटी पर जोर दिए जाने के कारण 55 फीसदी अमेरिकी अपने सवैतनिक अवकाश का उपयोग नहीं कर पाते हैं। मोबाइल फोन की लत, ई मेल, सोशल मीडिया अपडेट, चौबीस घंटे चलने वाली खबरों ने लोगों के बेहतर अनुभवों की छीन लिया है। समय की कमी का अहसास लोगों को मानसिक अवसाद का शिकार बना रहा है। उनमें एक्सरसाइज करने की इच्छा नहीं जागती है। वे स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद खान-पान से दूर रहते हैं। उनका कामकाज प्रभावित होता है। मनोवैज्ञानिकों ने पाया है कि प्रसन्नता और आनंद के लिए भौतिक वस्तुओं से अधिक महत्व अनुभूतियों का है।

इस समय हमारे पास पहले से बहुत अधिक खाली वक्त है। फिर भी, कई कारणों से हम ऐसा महसूस नहीं करते हैं। अपनी किताब-स्पेंडिंग टाइम में डेनियल हमेरमैश लिखते हैं, 1960 के बाद से हमारी आयु 13% बढ़ी है। खर्च करने की ताकत में 198% इजाफा हुआ है। वे लिखते हैं, सब कुछ समेटना मुश्किल होता जा रहा है। हम अधिक वस्तुएं खरीद सकते हैं लेकिन हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम जो खरीदते हैं, उसे अपने जीवनकाल में इस्तेमाल कर सकें।

ऐसे बीतता है समय

4.9

घंटे औसत समय महिलाओं ने
2018 में हर दिन मनोरंजक गतिविधियों में बिताया।

5.7

घंटे औसत
समय पुरुषों ने
2018 में हर दिन मनोरंजक गतिविधियों में व्यतीत किया।

टेक्नोलॉजी कंपनियों ने एप बनाए हैं जो बताते हैं कि आपको मोबाइल फोन पर कितना समय व्यतीत करना चाहिए। वैसे, उनका बिजनेस मॉडल उसके लगातार इस्तेमाल पर आधारित है। समय की कमी महसूस करने वाले लोगों के बेचैन रहने या अवसाद से घिरे होने की आशंका रहती है। उनके एक्सरसाइज करने या सेहतमंद खाना खाने की संभावना कम होती है। वे कार्यक्षेत्र में भी बेहतर काम नहीं कर पाते हैं। इन अनुभवों को देखते हुए हमें खाली वक्त की जरूरत है। लेकिन, प्रोडक्टिविटी पर जोर देने वाली संस्कृति में ऐसा आसान नहीं है।

स्टडी से पता लगा है कि 55% अमेरिकी अपने सवैतनिक अवकाश का उपयोग नहीं करते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि हमें अपनी मनोरंजक गतिविधियों को नए सिरे से तय करने के बारे में सोचना चाहिए। कोलंबिया की सिल्विया बेलेजा, हार्वर्ड के अनत कीनन और जार्जटाउन की नीरू पहारिया ने एक स्टडी में पाया है कि हम नए किस्म की सक्रियता पर ध्यान दें। जैसे कि लगता है यदि बाहर समय बिताना या टेंट में रात गुजारना प्रोडक्टिविटी के लिए बेहतर है तो हम एेसा कर सकते हैं। कीनन और कोलंबिया के रेन किवेट्ज का कहना है, हम अक्सर सामूहिक अनुभवों में बेहतर महसूस करते हैं। हमें लगता है कोई उपलब्धि हासिल कर ली है। उनका यह भी तर्क है कि हम अक्सर सोचते हैं कि आनंददायी गतिविधियों की बजाय काम को प्राथमिकता देकर हमने बुद्धिमानी की है। अगर हम जीवन के आनंद से वंचित होते हैं तो निश्चय ही हमें बाद में अफसोस होता है।

(वॉलमैन टाइम एंड हाउ टू स्पेंड इट और द सेवन
रूल्स फॉर रिचर, हैप्पीयर डेज के लेखक हैं।)

अमेरिकी वयस्क हर दिन लगभग साढ़े तीन घंटे का समय मोबाइल पर बिताते हैं। हमारा ज्यादा वक्त एक तरह से प्रदूषित है। हम एक काम करते समय दूसरी चीज के बारे में सोचते हैं। टि्वटर स्कैन करते वक्त टीवी देखते हैं। लोग सोचते हैं, वे ज्यादा प्रोडक्टिव हैं लेकिन यह स्थिति हमें थका डालती है। फिर तमाम तरह के पॉप अप्स, वर्कशॉप, बहस, नाटक हैं। लिहाजा, कई लोग समय का अकाल महसूस करते हैं। इधर, कई पुस्तकें समय के बेहतर उपयोग पर आई हैं। ये हैं-ब्रिजिड शुल्ज की ओवरव्हेल्मड और जेनी ओडेल की हाउ टू डू नथिंग। मोबाइल फोन की लत छुड़ाने पर एडम एल्टर की इरेसिस्टिबल, निर अयाल की इनडिस्ट्रेक्टेबल और कैल न्यूपोर्ट की डिजिटल मिनिमलिज्म।

टेक्नोलॉजी कंपनियों ने एप बनाए हैं जो बताते हैं कि आपको मोबाइल फोन पर कितना समय व्यतीत करना चाहिए। वैसे, उनका बिजनेस मॉडल उसके लगातार इस्तेमाल पर आधारित है। समय की कमी महसूस करने वाले लोगों के बेचैन रहने या अवसाद से घिरे होने की आशंका रहती है। उनके एक्सरसाइज करने या सेहतमंद खाना खाने की संभावना कम होती है। वे कार्यक्षेत्र में भी बेहतर काम नहीं कर पाते हैं। इन अनुभवों को देखते हुए हमें खाली वक्त की जरूरत है। लेकिन, प्रोडक्टिविटी पर जोर देने वाली संस्कृति में ऐसा आसान नहीं है।

इस समय हमारे पास पहले से बहुत अधिक खाली वक्त है। फिर भी, कई कारणों से हम ऐसा महसूस नहीं करते हैं। अपनी किताब-स्पेंडिंग टाइम में डेनियल हमेरमैश लिखते हैं, 1960 के बाद से हमारी आयु 13% बढ़ी है। खर्च करने की ताकत में 198% इजाफा हुआ है। वे लिखते हैं, सब कुछ समेटना मुश्किल होता जा रहा है। हम अधिक वस्तुएं खरीद सकते हैं लेकिन हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम जो खरीदते हैं, उसे अपने जीवनकाल में इस्तेमाल कर सकें।

अमेरिकी वयस्क हर दिन लगभग साढ़े तीन घंटे का समय मोबाइल पर बिताते हैं। हमारा ज्यादा वक्त एक तरह से प्रदूषित है। हम एक काम करते समय दूसरी चीज के बारे में सोचते हैं। टि्वटर स्कैन करते वक्त टीवी देखते हैं। लोग सोचते हैं, वे ज्यादा प्रोडक्टिव हैं लेकिन यह स्थिति हमें थका डालती है। फिर तमाम तरह के पॉप अप्स, वर्कशॉप, बहस, नाटक हैं। लिहाजा, कई लोग समय का अकाल महसूस करते हैं। इधर, कई पुस्तकें समय के बेहतर उपयोग पर आई हैं। ये हैं-ब्रिजिड शुल्ज की ओवरव्हेल्मड और जेनी ओडेल की हाउ टू डू नथिंग। मोबाइल फोन की लत छुड़ाने पर एडम एल्टर की इरेसिस्टिबल, निर अयाल की इनडिस्ट्रेक्टेबल और कैल न्यूपोर्ट की डिजिटल मिनिमलिज्म।

इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रवर्ती

प्रतिशत अमेरिकी अपने सवैतनिक अवकाश का उपयोग नहीं करते हैं।


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