दिवंगत को मदद देने का विज्ञान है श्राद्ध कर्म

Dhar News - पितृ पक्ष हमारी उन सभी पिछली पीढ़ियों को समर्पित होता है, जिन्होंने हमारे जीवन में किसी न किसी रूप में अपना योगदान...

Bhaskar News Network

Sep 13, 2019, 07:10 AM IST
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पितृ पक्ष हमारी उन सभी पिछली पीढ़ियों को समर्पित होता है, जिन्होंने हमारे जीवन में किसी न किसी रूप में अपना योगदान दिया है। इस पक्ष में विशिष्ट धार्मिक क्रियाओं से हम उनके प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसान और उनके पूर्वज दो करोड़ वर्षों से इस धरती पर हैं। यह एक बहुत लंबा समय है। इस धरती पर हमसे पहले रहने वाली इन लाखों पीढ़ियों ने हमें कुछ न कुछ जरूर दिया है। हम जो भाषा बोलते हैं, जिस तरह बैठते हैं, हमारे कपड़े, हमारी इमारतें आज हम जो कुछ भी जानते हैं, लगभग हर चीज हमें पिछली पीढ़ियों से मिली है।

जब इस धरती पर सिर्फ पशु थे, उस समय सिर्फ जीवित रहने की जद्दोजहद थी। बस खाना, सोना, प्रजनन करना और एक दिन मर जाना ही जीवन था। फिर धीरे-धीरे उस पशु ने विकास करना शुरू किया। पशु की तरह चलने की जगह उसने खड़ा होना शुरू किया, धीरे-धीरे उसका दिमाग विकसित होने लगा और उसकी क्षमताएं तेजी से बढ़ने लगीं। विकसित होकर वह पशु, इंसान बना। इंसान होने की सबसे महत्वपूर्ण चीज यह है कि हम औजारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। औजारों का इस्तेमाल कर सकने की इस साधारण क्षमता को हमने बढ़ाया और उसे तकनीकों के विकास तक ले गए। हम आज इस रूप में सिर्फ इसलिए हैं, क्योंकि इतनी सारी चीजें हमें विरासत में मिली हुई हैं।

हमारे पास आज जो भी चीजें हैं, हम उनका महत्व नहीं समझते, लेकिन हमसे पहले आने वाली पीढ़ियों के बिना, पहली बात तो हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। दूसरी बात, उनके योगदान के बिना हमारे पास वे चीजें नहीं होतीं, जो आज हमारे पास हैं। इसलिए पितृ पक्ष में हम उनका महत्व समझते हुए उन सबके प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं। वैसे तो लोग अपने दिवंगत माता-पिता अथवा पूर्वजों को अपनी श्रद्धांजलि देने के तौर पर एक धार्मिक रिवाज के रूप में यह पक्ष मनाते हैं, दरअसल यह उन सभी पीढ़ियों के प्रति अपना आभार प्रकट करने का एक जरिया है, जो हमसे पहले इस धरती पर आईं थी।

इस समय भारतीय उपमहाद्वीप में नई फसलों का पकना भी शुरू हो जाता है। इसलिए पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने के प्रतीक रूप में सबसे पहला अन्न उन्हें पिंड के रूप में भेंट करने की प्रथा रही है। इसके बाद ही लोग नवरात्रि, विजयादशमी और दिवाली जैसे त्योहारों के जश्न मनाते हैं। भारतीय संस्कृति में मृतकों के कल्याण के लिए मृत्यु अनुष्ठान एक गूढ़ प्रक्रिया थी। मृतक की आयु, उसके जीवन और मृत्यु की प्रकृति के आधार पर इन अनुष्ठानों को बहुत सावधानी से तैयार किया जाता था, जिससे एक जीव को जीवन के एक चरण से दूसरे में सहज रूप में प्रवेश करने में मदद मिलती थी और उसका आध्यात्मिक विकास भी सुनिश्चित होता था। ऐसा नहीं है कि श्राद्ध की क्रियाओं का कोई आधार नहीं है, लेकिन समय के साथ इसमें विकृति आती गई और यह व्यवसाय हो गया। कई बार ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति जीवित रहते अपनी माता या पिता के लिए कुछ कर नहीं पाया तो वह इन क्रियाओं के माध्यम से खुद को मनोवैज्ञानिक रूप से राहत दे पाता है।

इसका आध्यात्मिक पहलू यह है कि हर व्यक्ति अलग ज़िंदगी जीता है और इसीलिए वह यहां से विदा भी अलग तरह से होता है। यदि किसी मकान की छत गिरने से वहां जमा लोग मर जाएं तो इस दुनिया से जाने की उनकी स्थिति तो समान होगी पर हर व्यक्ति अलग ढंग की मृत्यु को प्राप्त होगा। जब किसी व्यक्ति की किसी खास तरह से मृत्यु होती है तो उसे विशेष सहायता की जरूरत होती है। आध्यात्मिक क्रियाएं आध्यात्मिक तरीके से होनी चाहिए पर कई बार इन्हें व्यावसायिक तरीके से अंजाम दिया जाता है।

हमारी जीवन ऊर्जाएं कई तरह से प्रोग्राम की गई हैं। एक जिसमें अभी आप हैं प्रारब्ध कहलाता है। यह एक सॉफ्टवेयर की तरह है। जीवन प्रक्रियाएं इस प्रारब्ध को खर्च करने में लगी रहती हैं। यदि जीवन को इस शरीर में रहना है तो जीवन ऊर्जा की एक तीव्रता चाहिए। एक फ्रिक्वेंसी चाहिए। यदि यह बहुत तीव्र हो गई तो जीवन शरीर छोड़ देगा और हम कहेंगे कि उन्होंने समाधि पा ली। यदि यह बहुत कमजोर हो गई तो जीवन धीरे से निकलकर चला जाएगा। ठीक वैसे जैसे लोग बहुत उम्र होने पर गुजर जाते हैं। यानी यह जीवन जिसके लिए प्रोग्राम किया गया था, उस शरीर ने उसे पूरा जी लिया है। दोनों तरह के लोग कम होते हैं। ज्यादातर लोग इसलिए गुजरते हैं कि उनके शरीर में टूट-फूट हो गई। बहुत ज्यादा काम कर लिया, शराब या सिगरेट पी ली, शरीर का कोई अंग खराब हो गया। दुर्घटना हो गई। उस व्यक्ति ने शरीर को जीवन के रहने लायक नहीं छोड़ा पर जीवन के पास दस साल और रहने की तीव्रता थी। जब जीवन इस तरह बाहर जाता है तो उसे तत्काल दूसरा शरीर नहीं मिलता। उसे इंतजार करना पड़ता है। अब उसके पास शरीर नहीं है। उसके पास सही-गलत का फर्क करने वाला विवेकी मन नहीं है कि वह कोई कर्म कर सके। इनकी सहायता से जो प्रोग्राम दस साल में खत्म हो सकता था, इसके बिना उसे पूरा करने में सौ साल, पांच सौ साल भी लग सकते हैं। यह उसके कर्मों के चरित्र पर निर्भर है। अब हम मदद करना चाहते हैं कि वह इन कर्मों को जल्दी से खत्म कर ले ताकि वह लंबे समय तक अधर में न रहे। तो श्राद्ध कर्म के पीछे पूरा विज्ञान है, लेकिन अब इसे जानने वाले लोग दुर्लभ है, इसलिए दुर्भाग्य से सिर्फ रस्में रह गई हैं। आधुनिकता के प्रभाव से अब हमें इन पर शर्म आती है। आधुनिक जीवन ज्यादा से ज्यादा सतही होते जा रहा है, जिसकी कीमत हमें यहां और इसके बाद चुकानी पड़ेगी।

दुर्भाग्यवश, पिछली दो सदियों में इन परंपराओं को काफी हद तक तोड़-मरोड़ दिया गया है और वे समाज से लुप्त होने लगी हैं। काल भैरव शांति सद्‌गुरु द्वारा तैयार एक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर छोड़ने वाले व्यक्ति को इस संवेदनशील अवस्था में महत्वपूर्ण मदद मिलती है।

सद््गुरु रहस्यदर्शी अौर ईशा फाउंडेशन के संस्थापक

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