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श्राद्ध पक्ष प्रारंभ, 15 दिन की अवधि में किए जाएंगे श्राद्धकर्म

Dhar News - पितृ पक्ष 13 सितंबर से प्रारंभ हुए। पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन माह की अमावस्या तक 15 दिन की विशेष...

Sep 14, 2019, 07:22 AM IST
पितृ पक्ष 13 सितंबर से प्रारंभ हुए। पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन माह की अमावस्या तक 15 दिन की विशेष अवधि में श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। श्राद्ध को पितृपक्ष और महालय के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में ऐसी मान्यता है पितृपक्ष के दिनों में हमारे पूर्वज जिनका देहान्त हो चुका है वे सभी पृथ्वी पर सूक्ष्म रूप में आते हैं और पृथ्वी लोक पर जीवित रहने वाले अपने परिजनों के तर्पण को स्वीकार करते हैं।

श्राद्ध किसे कहते हैं : ज्योतिषाचार्य डाॅ. अशोक शास्त्री के मुताबिक श्राद्ध का मतलब श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों को प्रसन्न करना। हिंदू शास्त्रों के अनुसार जिस किसी के परिजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं, उनकी तृप्ति और उन्नति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें।

कौन कहलाते हैं पितर : जिस किसी के परिजन चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित हों, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष उनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है। डाॅ. अशोक शास्त्री ने बताया कि पितृपक्ष में मृत्युलोक से पितर पृथ्वी पर आते हँ और अपने परिवार के लोगों को आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए उनको तर्पण किया जाता है। पितरों के प्रसन्न होने पर घर पर सुख शान्ति आती है।

कब बनता है पितृपक्ष का योग : हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है। ज्योतिषाचार्य डाॅ. अशोक शास्त्री ने कहा कि पितृपक्ष के 15 दिन पितरों को समर्पित होता है। शास्त्रों अनुसार श्राद्ध पक्ष भाद्रपक्ष की पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलते हैं। भाद्रपद पूर्णिमा को उन्हीं का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन वर्ष की किसी भी पूर्णिमा को हुआ हो। शास्त्रों में कहा गया है कि साल के किसी भी पक्ष में, जिस तिथि को परिजन का देहांत हुआ हो उनका श्राद्ध कर्म उसी तिथि को करना चाहिए।

श्राद्ध किसे करना चाहिए : डाॅ. शास्त्री ने बताया कि श्राद्ध का अधिकार पुत्र को प्राप्त है, लेकिन यदि पुत्र जीवित न हो तो पौत्र, प्रपौत्र या विधवा प|ी भी श्राद्ध कर सकती है। पुत्र के न रहने पर प|ी का श्राद्ध पति भी कर सकता है।

2019 की महत्वपूर्ण तिथियां

पूर्णिमा श्राद्ध -
14 सितंबर को प्रतिपदा, 15 को द्वितीया, 16 को तृतीया, 17 को चतुर्थी, 18 को पंचमी महाभरणी, 19 को षष्ठी, 20 को सप्तमी, 21 को अष्टमी, 22 को नवमी, 23 को दशमी, 24 को एकादशी, 25 को द्वादशी, 26 को त्रयोदशी, मघा श्राद्ध, 27 को चतुर्दशी श्राद्ध, 28 सितंबर को पितृ विसर्जन, सर्वपितृ अमावस्या।

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