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गिरते पानी में भी जीवंत दिखी धार की झांकी.... जनता का ये जलसा अमर रहे

एक वर्ष पहले
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श्रद्धा की शक्ति असीम है। श्रद्धा किसी भी बात से प्रभावित नहीं होती। वह चाहे मौसम हो या आर्थिक परिस्थितियां। यह बात फिर एक बार अनंत चतुर्दशी के अवसर पर साबित हुई। झिलमिल रोशनी और गरजते ढोल-ढमाकों ने आकाशीय बिजली की चमक और शोर को भी दबा दिया। उत्साह और उमंग अपने चरम पर थी। जैसे इनकी प्रतिस्पर्धा तेज़ बरसते हुए बादलों की शक्ति से हो रही हो। शाम के धुंधलके से ही शहर के वातावरण में एक सक्रियता नज़र आने लगी थी। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग चल समारोह के मार्गों पर अपने स्थान आरक्षित करने लगे थे। आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग धार शहर में आ रहे थे। कई बार समझना मुश्किल होता है कि इस भौतिक युग में भी ऐसा क्या है जो इन लोगों को इस परंपरा की और खींच लाता है? इस परंपरा के आरंम्भिक समय में जब बिजली सज्जा नहीं होती थी तब भी जनसैलाब ऐसा ही होता था। उस युग की झांकियां को जिंदा झांकी कहा जाता था। इसका कारण यह था की इनमें पुतले नहीं होते थे। जीवित कलाकार फूल पत्तियों से सजी गाड़ियों पर पौराणिक पात्रों की वेशभूषा में अभिनय करते हुए निकलते थे।

वह युग झांकियां में तकनीक प्रदर्शन का नहीं कला प्रदर्शन का युग था। अखाड़ों का स्थान अधिक महत्वपूर्ण होता था। अखाड़ों में सिर्फ़ एक दिन प्रदर्शन करने के लिए पहलवान पूरे साल अभ्यास करते थे कई लोगों ने तो अपना पूरा जीवन एक - एक कला के प्रति समर्पण में ही खपा दिया। निस्संदेह परिवर्तन संसार का नियम है। धीरे - धीरे कला का स्थान तकनीक ने ले लिया। अब स्वचालित पुतले और विद्युत सज्जा झांकियां के आधार हो गए हैं। बांस की खिपचियों से सजने वाली झांकियां लेज़र लाइट से रोशन हो रही हैं । झांझ -मझिरों का स्थान कानफोड़ू ध्वनि विस्तारक ने ले लिया है। वैसे इस बार इन पर प्रतिबंध होने के कारण आम जनता ने काफ़ी राहत की सांस ली। समय के साथ -साथ सब कुछ बदला है। अगर कुछ अपरिवर्तित है तो वह है आस्था और विश्वास। यह आस्था और विश्वास ही इन जन पर्वों की शक्ति है। इसी के दम पर ये सारी भव्यता और चकाचौंध है। केवल जनसमूह अपनी शक्ति से ये सालाना जलसे कर लेते हैं। कल्पना कीजिए की ये पर्व अगर सरकारी होते तो क्या - क्या होता? ये शुद्ध रूप से जनता के, जनता द्वारा जनता के लिए, आयोजित होते हैं।

एक बात और विशेष रेखांकित करने लायक़ है। वह है इन झांकियां के विषयों के जन सरोकार और राष्ट्र सरोकार। इनके विषयों में सदैव केवल पौराणिक और धार्मिक मिथक ही नहीं होते। इनमें राष्ट्रीय संदर्भ भी होते है। झांकी में चंद्रयान का प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है। झांकी के विषय में टाइटेनिक का होना भारत की सार्वभौमिक स्वीकार्यता को बताता है। जन चेतना अक्सर राष्ट्रचेतना के समानांतर चलती है।

भले ही वर्षों से झांकियां में जटायु सीता हरण को रोकने का प्रयास कर रहा हो, ये विषय उबाऊ नहीं होते। ये अब घटना नहीं प्रतीक की तरह प्रस्तुत होते हैं। जब दक्षिण भारत के पारम्परिक नृत्य झांकियां का हिस्सा बनते हैं तो ये निस्संदेह भारत की क्षेत्रीय एकता को आधार प्रदान करते हैं।

सही मायने में अनंत चतुर्दशी का ये चल समारोह एक बार फिर धार्मिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय जागरण का एक अवसर साबित हुआ। हर-हर बप्पा, घर-घर बप्पा।

झांकियों के बीच से

कवि संदीप शर्मा

त्रिमूर्ति चौराहे पर वीराना ग्रुप की झांकियाें को निहारते लोग।

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