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ये मात्र मिट‌्टी नहीं है, तुझे तेरे जीवन की मिट्‌टी करके लगानी पड़ेगी, तब कला सीख पाओगे

Dhar News - पद्मश्री फड़केजी की 136वीं जयंती पर उनके शिष्य ने भास्कर से साझा किए पल ये मात्र मिट्‌टी नहीं है, तुझे तेरी जीवन...

Jan 28, 2020, 07:15 AM IST
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पद्मश्री फड़केजी की 136वीं जयंती पर उनके शिष्य ने भास्कर से साझा किए पल

ये मात्र मिट्‌टी नहीं है, तुझे तेरी जीवन की मिट्‌टी करके लगानी पड़ेगी, तब कला सीख पाओगे, ये वे शब्द हैं जो मात्र 12 साल की आयु में मुझे पद्मश्री रघुनाथराव फड़के (अण्ण साहब) ने कहे थे। दरअसल वे उस समय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की मूर्ति बना रहे थे और मैं इस कार्य में उनका हाथ बंटा रहा था।

यह बात धार के फड़के स्टूडियो में 27 जनवरी को फड़के साहब की 136वीं जयंती पर आए सुभाष देव धार (73) ने भास्कर से वे बिरले पल साझा करते हुए कही। देव ने बताया कि फड़के जी का उनके पिताजी के यहां आना-जाना लगा रहता था। वे पिताजी के मित्र थे। उनसे ही मूर्तिकला सीखी। कई मूर्तियों के निर्माण में मैं उनका सहायक रहा। हालांकि अब याद नहीं है, कितनी मूर्तियाें साथ था। वे रात-रातभर जागकर मूर्तियां बनाते थे। मूर्ति बनाने में ऐसे मगन हो जाते कि पांच से दस घंटे भी खड़े-खड़े हो जाते। उन्हें कहना पड़ता था कि अब बैठ जाओ। हालांकि इसी वजह से बाद के दिनों में उनके शिष्य राजभाऊ मेहरूणकर, दिनकरराव, शंकरराव देव और श्रीधर मेहरूणकर उन्हें ठेलागाड़ी पर बैठाकर लाते थे। क्योंकि उनके पैर बहुत दर्द करते थे। सुभाष देव ने फाइन आर्ट में डिप्लोमा किया था। 11 साल पहले वे लोक निर्माण विभाग से सेवानिवृत्त हो गए।

ऐसे बनाते थे मूर्तियां : सुभाष देव बताते हैं कि वे पहले मिट्‌टी की मूर्तियां बनाते थे। उसके बाद उसका सांचा तैयार करते थे। उसी से प्लास्टर की मूर्ति बनाते। इसके बाद कम्पास से उसके हर पाइंट को नापते थे। इसके बाद मार्बल की मूर्ति बनाते थे। साधारणतया वे एक मूर्ति को 15 से एक महीने में बना देते थे। लेकिन कोई बड़ी मूर्ति आती थी तो उसमें जरूर समय लगता था।

159 मूर्तियां हैं फड़के स्टूडियो में : फड़के स्टूडियो की प्रबंधक सतीष देव ने बताया कि स्टूडियो में फड़के जी के द्वारा बनाई गई छोटी-बड़ी 159 मूर्तियां हैं। पहले 63 थी। फड़के साहब का जन्म 27 जनवरी 1884 को महाराष्ट्र के वसई में हुआ था। यह उनकी 136वीं जयंती थी। स्टूडियो की देखरेख के लिए उन्हें किसी से भी आर्थिक सहयोग नहीं मिलता है।

मांडू के कलाकार ने बनाया माटी से रूपमति महल

मांडू से आए कलाकार विजय निनामा ने पहली बार यहां मिट्‌टी से रानी रूपमति का महल बनाया। विजय इसके पहले गणपति, दुर्गाजी की मूर्तियां बना चुके हैं। दीपक निक्कम, प्रोफेसर नवनीत लोकरे, धार्मिक पाल ने चित्रकला बनाकर पेंटिंग बनाई। एकलव्य शासकीय स्कूल के बच्चों सहित 35 बच्चों ने भाग लिया। कला शिक्षिका आरती काले और कविता सालुंके भी उपस्थित थी।

61 साल पहले फड़के जी द्वारा बनाई गई तिलक की मूर्ति दिखाते हुए सुभाष देव, जिसमें उन्होंने हाथ बंटाया था।

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