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2020 में पीएचडी प्रवेश परीक्षा नहीं करा पाएगी यूनिवर्सिटी

एक वर्ष पहले
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यूजीसी की गाइड लाइन में भले ही पीएचडी प्रवेश परीक्षा साल में दो बार यानी छह माह में एक बार कराने का जिक्र हो, लेकिन डीएवीवी साल में एक बार भी नहीं करा पा रही है। 2018 की प्रवेश परीक्षा 2019 में हुई, वह भी जून के बजाय दिसंबर में। अब 2020 की जो परीक्षा जून में होना है, वह दिसंबर तक भी नहीं हो पाएगी। वजह यह है कि पिछली परीक्षा के पास हुए छात्रों की ही अब तक पीएचडी शुरू नहीं हो पाई है।

हद तो यह है कि गाइड के नामों की सूची और खाली सीटें तक पता नहीं चल सकी हैं। पहले ही ढाई साल में यूनिवर्सिटी पांच बार के बजाय महज दो बार प्रवेश परीक्षा कर पाई है, जबकि हर परीक्षा के बाद उसकी औसत 300 सीटें खाली रहती हैं। कॉमर्स, मैनेजमेंट, केमिस्ट्री और एजुकेशन जैसे विषयों में पीएचडी की डिमांड होती है, इनमें सीटें भी खाली रह जाती हैं, पर यूनिवर्सिटी की लेटलतीफी के कारण समय पर प्रवेश परीक्षा ही नहीं हो पाती।

कई कोर्स में एक-दो सीट, डिमांड 30 गुना तक

पीएचडी की इस बार की परीक्षा में भी कई कोर्स में एक या दो ही सीट थी, लेकिन डिमांड 30 गुना से ज्यादा रही। इसमें जर्नलिज्म, लॉ जैसे अहम विषय शामिल हैं। इसके अलावा जूलॉजी और अंग्रेजी जैसे विषय में भी कम सीटें हैं। मीडिया प्रभारी डॉ. चंदन गुप्ता का कहना है कि अगली प्रवेश परीक्षा में अभी समय है, लेकिन हम समय से पहले प्रक्रिया शुरू कर देंगे। कोशिश होगी कि इसी साल नवंबर-दिसंबर में प्रवेश परीक्षा हो जाए। इसी दिशा में प्रयास करेंगे। दरअसल, कॉमर्स और मैनेजमेंट सहित 14 कोर्स ऐसे हैं, जिनमें सीटों की तुलना में 35 फीसदी या उससे भी कम परीक्षार्थी पास हो पाते हैं। ऐसे में यह सीटें खाली रह जाती हैं। न तो गाइड को शोधार्थी मिल पाते हैं और न शोधार्थी को गाइड। इसलिए साल में दो बार परीक्षा होने से सीटें आसानी से भर सकेंगी। एक शोधार्थी को पीएचडी पूरी करने में कम से कम तीन साल लगते हैं। गाइड को रिटायर होने के बाद सीट अलॉट करने पर भी यूजीसी की रोक है।
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