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संयम में कोई तो ऐसी चीज है जो सुख ना मिले तो भी सुख देता है

परमात्मा जब भी निराकार से साकार होकर धरती पर अवतरित होते हैं तो मानवता के लिए कोई ना कोई संदेश देकर जाते हैं...

Dainik Bhaskar

Sep 13, 2018, 02:35 AM IST
Dhar - संयम में कोई तो ऐसी चीज है जो सुख ना मिले तो भी सुख देता है
परमात्मा जब भी निराकार से साकार होकर धरती पर अवतरित होते हैं तो मानवता के लिए कोई ना कोई संदेश देकर जाते हैं परमात्मा कहीं नहीं जाते हैं, उनके ही एक अंश से सारी दुनिया चल रही है। सभी के ह्रदय में विद्यमान है सिर्फ उसे खोजने की जरूरत है। साधु को समय पर आहार और कोई सुख सुविधा नहीं मिले तो भी वह मस्त रहता है लेकिन संसारी व्यक्ति कुछ भी मिलने से रह जाए तो विचलित हो जाता है। आखिर संयम कुछ तो होता है जिससे साधु हर समय जितना मस्त रहता है उतना आम आदमी नहीं रहता है।

यह बात राजेंद्र भवन बड़ा रावला स्थित मंदिर में जैन मुनि का चतुर्मास प्रवचन और धार्मिक कार्यक्रम मुनि हितेशचंद्र विजयजी ने कही। उन्होंने कहा कि सकारात्मक सोच के साथ चुनौती का सामना करना चाहिए। यही मानव जीवन की एक उपलब्धि है मनुष्य के सामने विपत्ति और विषम परिस्थितियां युगों-युगों से चुनौती बनती आ रही है। जब राजतिलक की घोषणा होने वाली थी तभी राम को वनवास का आदेश मिला था। मगर उन्होंने विपत्तियों को चुनौती मानकर स्वीकार किया इसीलिए वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाए हैं। ऐसे में हर इंसान को विपत्तियों से घबराने या डिप्रेशन में रहने और जीवन को नष्ट करने खुद को हार जाने से पहले आशावादी बनना चाहिए, सफलता की उम्मीद नहीं छोड़ना चाहिए। जिनका मन पवित्र होता है उनके मन में लोभ नहीं रहता तीर्थंकरों और शालिभद्र गौतम कुमार आदि कई महापुरुषों ने संसार का त्याग कर सब कुछ पा लिया। हमारे अंदर वह चीज आज तक पैदा नहीं हुई। भक्ति भाव और सच्ची दृढ़ता से उसे खोजे भगवान रजाई में ही मिल जाएंगे। परमात्मा ने हमें दुर्लभ मानव जन्म दिया है। हमें भी परमात्मा को याद करना चाहिए तभी हम इस माया रुपी संसार से मुक्ति पा सकते हैं। पर्युषण पर्व का अवसर आत्मा समीक्षा का है इसमें अधिक से अधिक त्याग तपस्या कर अपनी आत्मा निर्मल बनाएं बनाएं।

चतुर्मास में तपस्वियों का कर्म भी निरंतर चल रहा है। इसमें गुरुदेव की महाआरती का चढ़ावा, गुरु महाराज की आरती का लाभ पुखराज मलजी प्रशांत कुमार बोकडिया को मिला।

धार. राजेंद्र भवन में धर्मसभा करते मुनिद्वय।

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