--Advertisement--

पुरुष को मुक्त करें, नारी तो मुक्त ही है...

शीर्षक पढ़कर आश्चर्य होगा। जिस नारी के लिए इतने सारे कानून, संस्कृति और नैतिकता जैसी जंजीरें बनाई गई हैं, जिसकी...

Danik Bhaskar | Mar 04, 2018, 02:25 AM IST
शीर्षक पढ़कर आश्चर्य होगा। जिस नारी के लिए इतने सारे कानून, संस्कृति और नैतिकता जैसी जंजीरें बनाई गई हैं, जिसकी रक्षा के लिए सरकार और समाज रक्षक दिन रात चिंतित रहते हैं वह मुक्त कैसे कहलाएगी? इस साल नारी मुक्ति की ओर थोड़ा नई दृष्टि से देखते हैं। नारी जाति को ऐसा हव्वा बना दिया गया है, मानो एक लड़की नहीं कोई समस्या पैदा होती है। समस्या स्त्री नहीं है, पुरुष की हवस और उसका अहंकार है। बच्ची के पैदा होते ही मां इस चिंता से घिर जाती है कि उसे पुरुष की नजर से कैसे बचाए। सबसे चिंता जनक सवाल है पुरुष स्त्री के शरीर से इतना क्यों बंधा है? कितना ही विद्वान हो, कितना ही सम्मानित हो, स्त्री उसके लिए एक ही मायने रखती है, एक भोग्य वस्तु। दरअसल पुरुष अपनी ही कामुकता से पराजित है, उसके ऊपर नहीं उठ पाता और इसके लिए स्त्री को दोषी ठहराता है।

ओशो की बात सच है। पुरुष कितना ही बाहुबली हो, एक काम नहीं कर सकता जिसके लिए वह स्त्री के सामने हीन अनुभव करता है : वह बच्चे को जन्म नहीं दे सकता। जब पहली बार आदि मानव ने स्त्री के शरीर से एक नया जीवन पैदा होते देखा होगा तो वह आश्चर्य और भय से अभिभूत हुआ होगा। यह जादू वह नहीं कर सका सो उसने इस जादूगरनी को दबाना शुरु किया। मनोवैज्ञानिक इसे हीनता की ग्रंथि कहते हैं यह रोग है। इससे पुरुष मुक्त हो तो ही वह शरीर से ऊपर उठ पाएगा और स्त्री निर्भयता से जी सकेगी।

लर्निंग

अमृत साधना

ओशो मेडिटेशन रिज़ाॅर्ट, पुणे