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अप्रैल माह में धन की तंगी और सरकारी एजेंसियों की बिक्री से दलहनों में तेजी नहीं

पीएनबी में हुए घोटाले के बाद बैंकें अब छोटे उद्योगपतियों से रिकवरी करने में लग जाएगी, जिससे अप्रैल माह से बाजारों...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 02:30 AM IST

अप्रैल माह में धन की तंगी और सरकारी एजेंसियों की बिक्री से दलहनों में तेजी नहीं
पीएनबी में हुए घोटाले के बाद बैंकें अब छोटे उद्योगपतियों से रिकवरी करने में लग जाएगी, जिससे अप्रैल माह से बाजारों में धन की तंगी और बढ़ने की आशंका व्यक्त की जाने लगी है। व्यापारियों, उद्योगपतियों को पिछले एक से डेढ़ वर्ष में काफी नुकसान लग चुका है। इनकी हिम्मत टूट चुकी है। सरकारी चाहे जितने उपाय कर लें दलहन-दालों में तेजी आने वाली नहीं है। बंफर स्टॉक सरकारी एजेंसियों, किसानों और व्यापारियों के पास है। सरकारी एजेंसियों की लगातार बेचवाली से स्टॉकिस्टों पर विपरीत असर पड़ने वाला है। महाराष्ट्र में उड़द के स्टॉकिस्टों ने बेचवाली शुरू कर दी है। यहां 6.5 लाख बोरी का स्टॉक सहकारी एजेंसियों के पास है। महाराष्ट्र में 2016 में स्टॉक की गई मसूर का टेंडर 3000 रुपए उड़द 3000 रुपए मोजांबिक तुअर 3000 रुपए में बेची जा रही है। ऐसी स्थिति में किसानों को समर्थन भाव से डेढ़ गुना या दोगुनी राशि कैसे मिलेगी?

व्यापार में घाटा ही घाटा

पिछले एक-डेढ़ वर्ष में लगभग सभी सेक्टरों के व्यापारियों को नुकसान लग चुका है। उसमें भी दाल-दलहन, खाद्यान्न और मसालों का व्यापार करने वालों के घाटे का हिसाब लगाना कठिन है। पिछले महीनों में व्यापार गति तो पकड़ नहीं रहा है, जो स्टॉक है उस स्टॉक पर धीरे-धीरे करके इतना घाटा लग चुका है कि पूंजी बिना कुछ किए आधी रह गई है। लंबे समय से लाभ कैसे कमाया जाए यह तो व्यापारी भूल गए हैं। अब स्थिति यह बन गई है कि वर्तमान में जो पूंजी है, वह कैसे सुरक्षित रह सके। व्यापारी वर्ग अपनी पूंजी को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पिछले 50 वर्षों में ऐसी स्थिति निर्मित नहीं हुई है, जो हाल ही में हुई है और आगे होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। जलगांव की कुछ दाल मिलों के करीब 2.5 करोड़ रुपए हैदराबाद, पूना और बैंगलुरू के व्यापारियों में अटक गए हैं। यह रुपया वापस न आने की आशंका से दाल उद्योग में त्राहि-त्राहि मची हुई है। पिछले वर्ष भी रुपया डूबा है। देश में ऐसे अनेक व्यापारी अथवा दाल-दलहन का व्यापार कर रहे हैं, पुरानी उधारी देने से इनकार कर दिया है अथवा आए दिन टरका रहे हैं अर्थात् अभी तक तो पूंजी डूबी हुई ही मानी जा रही है।

नियत में खोट आ गई

नोटबंदी के बाद नियत में बड़ा फर्क आ गया है। व्यापार का पतन होने की एक बड़ी वजह यह भी है। इस वजह से कारोबार किसी एक का नहीं लेने और देने वाले दोनों का बैठने वाला है। रुपए की वापसी नहीं करने वाला अपने आपको मीर न समझे। कारोबार का कायदा यही कहता है कि जिसका लिया है उसको देना चाहिए, किंतु नोटबंदी ने पूरे व्यापार जगत में जो हड़कंप मचाया है और नियत में खराबी आई है, वर्तमान तो ठीक भविष्य के लिए भी खतरनाक संकेत माने जा रहे हैं। वर्तमान में विदेशों से सरकारी भारतीय बाजारों में दलहन सस्ती हो गई है, किंतु निर्यात जैसी स्थिति नहीं है। दुबई में तुअर दाल 5200, उड़द दाल 4000 रुपए और मसूर दाल 4000 रुपए क्विंटल बताई जा रही है। भारत सरकार ने दलहनों पर आयात शुल्क लगाकर अथवा आयात बंद कर रखा है, जिससे 95 प्रतिशत आयात बंद हो गया है। फिलहाल भारत में आयात की जरूरत भी नहीं है।

दलहनों के सरकारी टेंडर

सरकारी एजेंसियां महाराष्ट्र में 2016 की स्टॉक की गई मसूर के टेंडर 3000 रुपए के आसपास स्वीकार कर रही है। उड़द भी 3000 रुपए में मुंबई में मोजांबिक तुअर 3000 रुपए में बेची जा रही है। तुअर में हाथरस, गुजरात वालों की मांग है। मोजांबिक की मोटी तुअर में होटल-ढाबों वालों की अधिक मात्रा में मांग रहती आई है। 3000 रुपए क्विंटल की तुअर को कौन महंगी कहेगा। सरकारी स्टॉक की बिक्री से किसानी माल ऊंचे भावों पर कैसे बिक सकेगा। बाजार का अघोषित नियम है कि या तो सरकार स्वयं बेच ले अथवा किसानों को बेचने दें। वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारें किसानों के नाम से हल्ला खूब मचा रहे हैं, किंतु स्टॉक अपना हलका कर रहे है। ऐसी स्थिति में किसानों को समर्थन भावों का लाभ कब और कैसे मिलेगा। यह कोई नहीं जानता। कर्नाटक में प्रधानमंत्री ने घोषणा की है कि समर्थन भाव दोगुना करेंगे यह स्वागत योग्य है, किंतु महाराष्ट्र में तुअर खरीदी की घोषणा की है। उसे तो शत-प्रतिशत अमल में लाए।

उड़द स्टॉकिस्टों में घबराहट

दलहनों का स्टॉक सरकारी एजेंसियों और निजी क्षेत्र के स्टॉकिस्टों के पास है। महाराष्ट्र के कुछ स्टॉकिस्टों ने करीब 20-25 प्रतिशत स्टॉक का उड़द बेचकर हलके हो गए हैं। उड़द का स्टॉक हालांकि सस्ते भावों पर की थी, किंतु मांग नहीं निकलने से अंतत: बेचवाली पर मजबूर होने पड़ रहा है। उड़द का स्टॉक किए हुए 4-5 माह हो गए हैं। माल इधर से उधर नहीं हो पा रहा है। ब्याज भाड़े की मार अलग से पड़ रही है। अकोला स्पॉट से उड़द 3050 रुपए क्विंटल बिका है। आम राय यह बनने लग रही है कि मूंग-चना, उड़द आदि का जो स्टॉक रोकेंगे, उनके लाभ पर विपरीत प्रभाव पड़ने वाला है। पीएनबी घोटाले के पहले तक अनेक जानकारों की सहमति बन रही थी कि मार्च से वस्तु बाजारों में तेजी आने वाली है, किंतु अब सभी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। सरकार द्वारा तेजी लाने के जितने भी प्रयास किए हैं वे लगभग फेल हुए हैं। कभी-कभी तो लगे हाथ विपरीत असर भी पड़ा है।

वित्त मंत्री के आदेश के बाद बैंकें वसूली में जुटेगीं

जानकार क्षेत्रों के अनुसार पीएनबी बैंक में हुए घोटाले के बाद हाल ही में वित्तमंत्री ने बैंकों को आदेश दिया है कि 50 करोड़ से अधिक के ऋण दे रखे हैं उनकी जांच करें। यदि ऋणों में गड़बड़ पाई जाए तो प्रकरण सीधे सीबीआई को सौंप दें। यह तय है कि केंद्र सरकार की इस कार्रवाई से बाजारों में धन की तंगी और बढ़ जाएगी। वैसे भी पीएनबी घोटाले के बाद बैंकों से ऋण सुविधा प्राप्त करना सरल काम नहीं रह गया था। बैंकें अब सख्त होने वाली ही थी, किंतु वित्तमंत्री के आदेश के बाद सख्ती और बढ़ जाएगी। बैंकें वसूली में जुट जाएगी। वैसे भी मार्च क्लोजिंग है यह माह तो जैसे-तैसे निकल जाएगा, बाजारों में धन की तंगी अप्रैल से शुरू होगी। उसके बाद वर्तमान में बाजारों में जो ग्राहकी चल रही है, उसमें भी काफी हद तक ब्रेक लग सकता है। अत: यह मानकर चला जाने लगा है कि आने वाले महीने भी व्यापार के लिए अधिक सुखदायी नहीं कहे जा सकते हैं। कुछ व्यापारी धंधा बंद करके बैठ जाने तक का विचार करने लग सकते हैं, क्योंकि संभव है आने वाले महीनों में ऐसी परिस्थितियां निर्मित हो जाए।

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