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‘प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग- अंग बास समानी’

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 02, 2018, 03:20 AM IST

संत रविदास भारत के आध्यात्मिक आकाश में दैदीप्यमान नक्षत्र है, वे ध्रुव तारा है। कबीर और रविदास आपस में गुरुभाई है।...
संत रविदास भारत के आध्यात्मिक आकाश में दैदीप्यमान नक्षत्र है, वे ध्रुव तारा है। कबीर और रविदास आपस में गुरुभाई है। गुरु रामानंद से दो धाराएं कबीर और रविदास के रूप में प्रवाहित है। रविदास अद्भुत है। इन अर्थों में मीरा जैसी भक्तिन उनकी शिष्या बनी। मीरा और रामानंद को जोड़ने वाले सेतु है रविदास। रविदास जी ने कर्म को महत्ता दी है, तभी कठौती में गंगा जैसी कहावत प्रचलन में आई। उनका यह पद ‘प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी’ भक्त का अनुपम चित्र निरूपित करता है। वे लोक के कवि है। यह बात अनिरुद्ध सिंह सेंगर ने कही। वह मप्र लेखक संघ गुना एवं हिंदी विभाग शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के संयुक्त सहयोग से हुई संत रविदास जयंती के उपलक्ष्य में हुई कवि गोष्ठी में बोल रहे थे। श्रीकृष्ण सरल शोध संस्थान गुना में डॉ. हरकांत अर्पित की अध्यक्षता में यह गोष्ठी हुई। इसका शुभारंभ संत रविदास जी के चित्र के समक्ष दीप जलाकर किया। नीलम कुलश्रेष्ठ ने सरस्वती की। डाॅ. सतीश चतुर्वेदी ने कहा कि- ‘चल चल रे उठ, मजदूर है हम, धरती मां के पांव की पनही, माथे का सिंदूर है हम।’ डाॅ. लक्ष्मीनारायण बुनकर ने कहा कि- ‘इस मायावी दुनिया ने यह खेल गजब का खेला है, भीड़ भाड़ इतनी है लेकिन फिर भी मनुज अकेला है। ’ डाॅ. हरकांत अर्पित ने कहा कि- ‘स्वप्न को साकार होता देखकर, हर कौम को गर्व है संत रविदास पर। शायर प्रेमसिंह ‘प्रेम’ ने कहा कि- ‘मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे और चर्च से बहुत दूर, तमाम उम्र जीना चाहता हूं बच्चों की तरह।’ गीतकार सुनील शर्मा ‘चीनी’ ने कहा कि- ‘वक्त बहुत उदास है, रो रही है यह सदी, कांक्रीट के जंगल में खो गई है इक नदी। मधुबाला सक्सेना ने कहा कि-‘ये सूरज ये चंदा ये पर्वत ये नदियां, ये झरने ये ताले, ये फूलों की कलियां। नीलम कुलश्रेष्ठ ने कहा कि- ‘मनवा बन देखो रैदास, तन पिंजरे में मन का पंछी, दूर गगन की आस। परदुख दुखिया परसुख सुखिया जीवन होगा खास। इसमें कीर्ति मोरोलिया गौतम, कवि दिनेश चंदेल, बाल कवयित्री ऋतंभरा ओझा ने भी कविता पाठ किया। इसमें बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।

कवि गोष्ठी में मौजूद कवि और साहित्यकार।

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Web Title: ‘प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग- अंग बास समानी’
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