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भारतीय संस्कृति में भक्ति का रंग सर्वोपरि: मंथन
11 मार्च को होगा 40 दिवसीय फागोत्सव का समापन
संवेदनशील स्थलों पर रही तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था
होली के मद्देनजर शहर के सभी संवेदनशील स्थलों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रही। शहर के ख्यावदा चौराहा, बूढ़े बालाजी, श्रीराम कॉलोनी, बजरंगगढ़ रोड, गुलाबगंज, बांसखेड़ी, पुरानी नगरपालिका, शिवाजी नगर, कर्नलगंज, शनि मंदिर जगनपुर बस्ती सहित करीब एक दर्जन क्षेत्र संवेदनशील माने जाते हैं। सोमवार को अंचल के होलिका दहन स्थलों पर पूजन के लिए भारी भीड़ उमड़ी। इस मौके पर हिउस प्रमुख कैलाश मंथन ने विशेष पूजा अर्चना की एवं अपनी बुराइयों को होलिका में भस्म करने का आग्रह समाज से किया। मंगलवार को धुलेंडी एवं 13 मार्च को रंग पंचमी पर भव्य कार्यक्रम विराट हिन्दू उत्सव समिति के तहत संपन्न होंगे।
पिछले 40 दिनों से गुना-बमोरी अंचल के दो सैकड़ा से अधिक गांवों में पुष्टिभक्ति केंद्रों पर होली मनाई जा रही है।
गुना| भारतीय संस्कृति में होली का रंगारंग पर्व उल्लास उमंग और उत्साह का प्रतीक है। दुखों में डूबा मानव मात्र होली के अवसर पर विभिन्न रंगों में डूबता उतराता है। नई चेतना, स्फूर्ति प्राप्त करता है। अंतर्राष्ट्रीय पुष्टिमार्गीय वैष्णव परिषद के प्रांतीय प्रचार प्रमुख कैलाश मंथन ने होली पर आयोजित दोलोत्सव के तहत सत्संग सभा में कहा कि भगवान कृष्ण की भक्ति का रंग जिस पर चढ़ता है उसका बेडा पार हो जाता है।
हिउस प्रमुख कैलाश मंथन ने बताया कि पुष्टिमार्गीय केंद्रों पर 40 दिवसीय फागोत्सव का समापन 11 मार्च को दोलोत्सव पर संपन्न होता है। पिछले 40 दिनों से गुना-बमोरी अंचल के दो सैकड़ा से अधिक गांवों में पुष्टि भक्ति केंद्रों पर भगवान कृष्ण को विशेष लाड लड़ा कर भक्तगण वल्लभकुल आचार्यों की उपस्थिति में भगवान के साथ होली खेलने का आनंद ले रहे हैं। अंचल के करीब डेढ़ सौ गांवों में होली फाग महोत्सव के भव्य आयोजनों के दौरान हजारों लोगों ने भागीदारी की।
पर्यावरण की रक्षा का संकल्प, कंडों की होली जलाने का प्रचलन बढ़ा : हिउस के मुताबिक जिन इलाकों में लकड़ी का अभाव रहता है वहां कंडों की होली जलती है। इसको लेकर शहर में जागरूकता देखने को मिल रही है। शहर में बड़ी संख्या में अनेक स्थानों पर होलिका दहन पर कंडों की होली का दहन किया गया। श्री मंथन के मुताबिक हरे वृक्ष न काटे जाएं, पर्यावरण संतुलित बना रहे, वातावरण पवित्र रहे, गोबर से बने कंडे सहज सुलभ रूप से मिल जाते हैं, इसलिए अंचल में होली में कंडों का प्रयोग करने का आव्हान किया गया था। जिसका असर होलिका दहन पर देखने को मिला जब अधिकांश स्थानों पर लकड़ी के साथ कंडों का भी अधिकाधिक प्रयोग हुआ। अंचल की बस्तियों में घरों के सामने गृहणियों द्वारा कंडों के साथ गोबर की मलरियों की होली जलाई गईं।