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फ्लाइट पकड़ने व रहने में मदद की थी, 29 साल बाद मिलने आया बेल्जियम का परिवार

सुधीर सप्रा ने 1988 में त्रिवेंद्रम एयरपोर्ट पर मिले बेल्जियम के लॉरेंस एंजेल परिवार को दी थी मदद

bhaskar news | Last Modified - Jan 14, 2018, 06:05 AM IST

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    बेल्जियम के लॉरेंस एंजेल और उनके बेटे शासा ग्वालियर में सुधीर सप्रा के साथ।

    ग्वालियर.एक नागरिक के तौर पर विदेशी सैलानियों के साथ आपका व्यवहार ही देश की छवि बनाता व बिगाड़ता है। ग्वालियर के सुधीर सप्रा ने 1988 में त्रिवेंद्रम एयरपोर्ट पर मिले बेल्जियम के लॉरेंस एंजेल परिवार को फ्लाइट पकड़ने व मालदीव में रहने के लिए भाई के जरिए जगह उपलब्ध कराई और दिल्ली तक वापसी की व्यवस्था भी कराई थी। इस मदद का असर ये हुआ कि 29 साल बाद वह परिवार उन्हें मिलने के लिए फिर से भारत आया।

    सप्रा को ढूंढ़ने के लिए लॉरेंस ने इंटरनेट पर ग्वालियर पुलिस को ई-मेल कर पूछा, पुलिस ने कोई रिप्लाई नहीं दिया। इसके बाद गूगल, फेसबुक, व्हाट्स एप ग्रुपों पर पूछताछ की गई तो एक ग्रुप ने सुधीर सप्रा को बताया कि बेल्जियम का कोई लॉरेंस नाम का व्यक्ति उन्हें तलाश रहा है। तब जाकर दोनों एक दूसरे के संपर्क में आए और हाल ही में एंजेल परिवार कुछ दिन पहले ग्वालियर आकर सप्रा परिवार के साथ चार दिन तक रहे। अभी भी यह परिवार भारत में ही घूम रहा है।

    गांधी व ग्वालियर को भूल नहीं सकता
    गांधी और ग्वालियर को कभी भूल नहीं सकता। पहली बार गांधी को समझा रिचर्ड एटनबरो की ऑस्कर विनिंग मूवी गांधी को देखकर। समझ आया कि पिछली शताब्दी में हुए वे ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिनकी दी हुईं सीख और बताए हुए रास्ते सदियों तक प्रासंगिक बने रहेंगे। सच की ताकत, शांति और अहिंसा का रास्ता, लक्ष्य को पाने का संकल्प, आत्मा के उत्साह के साथ किसी मुकाम को हासिल करने की इच्छाशक्ति ये सबकुछ हमें गांधी सिखाते हैं। इसलिए मैं चाहता था कि मेरे बच्चों में ये सारे गुण आएं। इसलिए उनके नाम के साथ गांधी जोड़ा, जिससे वे खुद और दूसरों को भी गांधी के आदर्शों को समझा सकेंगे। बेटे का नाम शासा गांधी रखा और बेटी का नाम इंदिरा, क्योंकि मेरे जैसे यूरोप वासी जो 60 के दशक में पैदा हुए थे, वे आपके देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इंडिया के फेस के तौर पर जानते हैं। वह एक मजबूत संकल्पों वाली महिला थी और वर्ष 1984 में उनकी मौत ने हमें भी बहुत दुखी किया था। ग्वालियर में मैंने जीवन के कई रंग देखे। नैरोगेज, खेत-खलिहान, रंगों से भरे लोगों के घर और खासतौर पर वो जगह जहां से गांधी को मारने हथियार भेजा था।
    (जैसा लॉरेंस एंजेल ने दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में बताया)

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    लॉरेंस के बेटे शासा गांधी का पासपोर्ट।
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