--Advertisement--

स्कूल के लिए जमीन दान कर खुद झोपड़ी में रह रहे ‘शिक्षा के पुजारी आशाराम’

स्कूल बनाकर जनता को समर्पित किया है बल्कि खुद घास से बनी झोपडी में रहकर शिक्षा के पहरेदार बन गए हैं।

Dainik Bhaskar

Jan 22, 2018, 09:11 AM IST
Elderly living in cottage after donating land to school

मुरैना. गरीबी के कारण अक्षरज्ञान से मौहताज रहे आशाराम ने गरीब का पुरा गांव में शिक्षा की ऐसी अलख जगाई है कि वह अनपढ़ होने के बाद भी ‘शिक्षा के पुजारी’ नाम से विख्यात हैं। आशाराम ने गांव के बच्चों की पढ़ाई के लिए न केवल अपनी बेशकीमती जमीन पर स्कूल बनाकर जनता को समर्पित किया है बल्कि खुद घास से बनी झोपडी में रहकर शिक्षा के पहरेदार बन गए हैं।


आशराम अंबाह से पांच किमी दूर बसे गरीब का पुरा गांव के निवासी हैं। बचपन में गरीबी के कारण वह खुद पढ़ाई नहीं कर सके क्योंकि गांव में कोई स्कूल नहीं था। जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो गांव में स्कूल बनवाने के लिए शासन से मदद की गुहार लगाई ताकि गांव का कोई बच्चा अनपढ़ न रह जाए। बरसों तक इंतजार करने के बाद भी हर तरफ से असफलता हाथ लगने पर उन्होंने अपनी निजी जमीन पर स्कूल बनाना शुरू कर दिया। स्कूल तैयार करने के बाद उसे शासन को समर्पित किया और देखते ही देखते कुछ साल पहले गांव में प्राथमिक विद्यालय शुरू हो गया, जिसमें गांव के बच्चे पढ़ने लगे। इसके बाद अपने खेत की 6 बिस्वा जमीन शासन को दी तो वहां मिडिल स्कूल बनकर तैयार है। कुछ महीने पहले से गांव के बच्चों की मिडिल स्कूल तक की पढ़ाई अब गांव में ही हो रही है।


गांव की मिट्‌टी से थापी ईंट, खेत में लगाई चिमनी


ग्रामीण बताते हैं कि प्राथमिक स्कूल बनाने के लिए बाजार से ईंट काफी महंगी मिल रही थी। इसलिए आशाराम ने बाहर से मजदूरों की टीम बुलाई और गांव की ही मिट्‌टी से ईंट थपवाना शुरू कर दिया। ईंटों को पकाने के लिए खेत में चिमनी बनाई गई, जिसमें ईंटों को तपाकर मजबूत किया गया। गांव की मिट्‌टी से बनी इन ईंटों से प्राथमिक स्कूल की बिल्डिंग का निर्माण आशाराम ने खुद व ग्रामीणों की मदद से तैयार किया है।

घास की झोपडी में कर रहे बसर
गांव के राम हरी शर्मा बताते हैं कि निजी जमीन पर स्कूल बनवाने के बाद आशाराम खुद घास-फूस से बनी झोपडी में निवास कर रहे हैं। यह झोपडी उन्होंने स्कूल के दरवाजे पर ही बनाई है और वहां बैठकर पहरेदारी करते हैं। तन पर सूती धोती लपेटे 63 वर्षीय आशाराम एक महात्मा की तरह जीवन यापन कर रहे हैं।

कंप्यूटर सिखाने जेब से दे रहे शिक्षक को वेतन जनरेटर भी लगवाया
आशाराम ने एक युवक को कम्प्यूटर सिखाने के लिए नियुक्त है। इस युवक को 1500 रुपए का भुगतान वह अपनी जेब से करते हैं। इसके एवज में उक्त युवक हर दिन एक घंटे बच्चों को कंप्यूटर सिखाता है। कम्प्यूटर सिखाने के दौरान कोई व्यवधान न आए इसके लिए उन्होंने एक जनरेटर भी खरीदकर स्कूल को दिया है। स्कूल में कोई चपरासी नहीं है इसलिए आशाराम शिक्षा के इस मंदिर में खुद ही साफ-सफाई करते है।

X
Elderly living in cottage after donating land to school
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..