Hindi News »Madhya Pradesh »Gwalior» Invitation To Meet The Mango Tree In This Village Is 100 Years Old.

इस गांव में आम के पेड़ से मिलता न्यौता, 100 साल पुरानी है ये परंपरा

शहर से 150 किमी दूर एक ऐसा गांव है जहां आज भी घर घर शादी का कार्ड नहीं दिया जाता है।

नरेश कुशवाह | Last Modified - Feb 07, 2018, 03:56 AM IST

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    इस गांव में आज भी कार्ड पेड़ पर टांगा जाता है।

    शिवपुरी (ग्वालियर).शहर से 150 किमी दूर एक ऐसा गांव है जहां आज भी घर घर शादी का कार्ड नहीं दिया जाता है। इसे गांव में बने शंकर मंदिर के पास आम के पेड़ पर टांग दिया जाता है। इसके बाद लोग इसे आकर पढ़ लेते हैं। ये परंपरा इस गांव में पिछले 100 सालोें से चली आ रही है। क्या है मामला...

    - दरअसल आज के समय में घर कोई शादी का कार्ड लेकर देने नहीं आए तो आप नाराज हो जाएंगे। लेकिन शहर से 50 किमी दूर बामौर गांव ऐसा है, जहां घर-घर इनविटेशन कार्ड नहीं भेजा जाता।

    - इनविटेशन कार्ड को गांव से बाहर बने शंकर मंदिर के पास के एक आम के पेड़ पर टांग दिया जाता है। जिस किसी परिवार के नाम से इनविटेशन आता है, वह यहीं आकर उसे पढ़ लेता है।

    - इस गांव में ये परंपरा करीब 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है। गांव की 60 साल की बुजुर्ग महिला बिसना बाई यादव का कहना है कि उन्होंने जब से होश संभाला है, तब से ही वे इस आम के पेड़ पर ही इनविटेशन पत्रों को आता देख रही हैं।

    पहले भगवान को चढ़ाने आते थे कार्ड, बाद में पेड़ पर टंगने लगे

    - गांव की पूर्व संरपंच ब्रम्हाबाई ने बताया कि इस आम के पेड़ के पास भगवान शिव का एक पुराना मंदिर है। गांव के आसपास और गांव में जिस किसी के भी घर में कोई शादी ब्याह या न्यौते का कार्यक्रम होता था तो वो मंदिर पर भगवान को कार्ड चढ़ाने आता था।

    - देखते ही देखते ये परंपरा इस पेड़ तक पहुंच गई और अब जिस किसी को भी गांव में किसी को इनविटेशन देना होता है तो वो सीधे इस पेड़ पर ही कार्ड टांग जाता है। गांव के लोग यहां आकर कार्ड को पढ़ लेते हैं।

    सभी सामूहिक कार्ड यहीं आते हैं: प्रेमसिंह
    - गांव में रहने वाले बुजुर्ग प्रेम सिंह ने बताते हैं कि हमारे गांव में आसपास के गावों से जो भी न्यौते आते हैं, उस चिट्ठी में सामूहिक तौर पर ग्रामीणों के नाम लिखे होते हैं।एक चिट्ठी में पचास से 70 नाम तक होते हैं।

    - वो इसी पेड़ पर इनविटेशन पत्र टांग कर चले जाते हैं। कई बार तो यह देखने में आया कि कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर इनविटेशन देने गए तो लोग बुरा मान गए कि पेड़ पर टंगे कार्ड में हमारा नाम क्यों नहीं लिखा।

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    100 से चली आ रही है ये परंपरा।
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