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ये महिलाएं पहले अपने पैरों पर खड़ी हुईं, फिर बच्चों को भी डॉक्टर-सीए बनाया

श्योपुर और विजयपुर की दो महिलाएं हैं, जिन्होंने खुद को आत्मनिर्भर बनने के साथ अपने बच्चों को भी अच्छा भविष्य दिया।

​जावेद आलम | Last Modified - Jan 22, 2018, 09:05 AM IST

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    श्योपुर.हमने पिता के बलबूते पर तो बच्चों को सबकुछ पाते देखा है, लेकिन महिलाएं भी पिता की जिम्मेदारी निभाने में पीछे नहीं हैं। ऐसी ही श्योपुर और विजयपुर की दो महिलाएं हैं, जिन्होंने खुद को आत्मनिर्भर बनने के साथ अपने बच्चों को भी अच्छा भविष्य दिया। महिलाओं ने पति की मौत के बाद भी बच्चों की परवरिश की और उन्हें पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बनाया।

    पति ने नौकरी मिलते ही छोड़ा तो मायके में रहकर बेचे फूल, आत्मनिर्भर बनने के साथ बेटे को बनाया डॉक्टर


    विजयपुर की माया बाथम की शादी 1973 में सुमावली के अनंतराम बाथम के साथ हुई, लेकिन पति अनंतराम का सलेक्शन जब एसआई के लिए 1987 में हो गया तो उसने पत्नी माया को दो बच्चों के साथ छोड़ दिया। जब पति ने छोड़ा तो बेटे की उम्र महज 1 साल थी तो बेटी की 3 साल। माया अपने दोनों बच्चों की जिम्मेदारी मायके से संभालने लगी और फूल बेचकर उसने न सिर्फ घर चलाया बल्कि, बच्चों को पढ़ाया। फूल बेचने के साथ बेटे भारत को पैसा जुटाकर डॉक्टरी कराई और आज वह डॉक्टर बन चुका है। जबकि बेटी फूलवती को नर्सिंग का कोर्स कराया, जिसके बाद वह अस्पताल में नर्स बनकर अच्छा कमा रही है।

    खास बात यह है कि, महिला ने 1990 में पति के छोड़े जाने पर केस भी किया, जिसमें वह 2004 में जीत गई। लेकिन महिला ने कोर्ट में पति अनंतराम से उसकी प्रॉपर्टी और भरण-पोषण की राशि लेने से इनकार कर दिया। महिला ने कोर्ट में कहा कि, वह चाहती है कि उसका पति (पीएचक्यू में डीएसपी) उससे माफी मांगे। इसके बाद पति ने कोर्ट में ही महिला से माफी मांगी और महिला ने उससे सारे नाते तोड़ दिए। साथ ही कहा कि वह तो उससे कुछ भी नहीं चाहती, लेकिन अगर उसके बच्चे उनका हक मांगने के लिए कोई कार्रवाई करते हैं तो वह उन्हें नहीं रोकेगी।

    पति की मौत के बाद आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बन आत्मनिर्भर बनी, बेटे को बनाया सीए


    शहर के वार्ड क्रमांक 9 स्थित टेलीफोन एक्सचेंज के पास रहने वाली रेखा गुप्ता के पति की मौत 20 साल पहले 1997 में हो गई। इसके बाद वह तीनों बच्चों के साथ रहने के लिए मायके आ गई। इस समय बड़े बेटे निखिल की उम्र 5 साल, छोटे बेटे की उम्र 3 साल और बेटी की उम्र एक साल थी। तीनों बच्चों की जिम्मेदारी उठाने के साथ रेखा गुप्ता ने आंगनबाड़ी की भर्ती में हिस्सा लिया। वह आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बन गईं। तीनों बच्चों को श्योपुर में ही पढ़ाया, इसके बाद बड़े बेटे निखल गुप्ता ने इंदौर जाकर पढ़ाई करने का मन बनाया तो मां ने खर्च के आगे घुटने न टेकते हुए उसे इंदौर सीए की पढ़ाई के लिए भेज दिया। इसके लिए महिला ने बेटे को सीए बनने के लिए पैसों की कमी नहीं आने दी और कुछ कर्ज के सहारे व कुछ दुकान किराए से लगभग 4 लाख रुपए खर्च किए। जबकि दूसरे बेटे के ग्रेज्यूएशन करने के बाद उसे शहर में जनरल स्टोर व आर्टिफिशल ज्वैलरी की शॉप खुलवा दी।

    इंदौर में सीए की पढ़ाई में बेटे निखल गुप्ता ने एक साल पहले ही अच्छे अंक प्राप्त किए और श्योपुर आकर सीए बन गया। आज वह 50 हजार रुपए महीने कमा रहा है। जबकि छोटा बेटा कपिल गुप्ता दुकान से 20 हजार प्रति माह तक की कमाई कर रहा है। बेटी भी पढ़ाई जारी बनी हुई है। ऐसे में महिला खुद तो आत्मनिर्भर बनी ही साथ ही अपने बच्चों का भी भविष्य बना दिया।

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Web Title: Success Story Of Woman
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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