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यू-टर्न से गुजरात को मिलेगा फायदा, कूनो सेंक्चुरी को नहीं दिया नेशनल पार्क का दर्जा

गिर अभ्यारण्य (गुजरात) से एशियाटिक लॉयन को कूनो में लाने की कानूनी लड़ाई हारने का खतरा है।

Danik Bhaskar | Dec 09, 2017, 05:42 AM IST

ग्वालियर. 1995 से एशियाई शेरों का इंतजार कर रहे कूनो-पालपुर सेंक्चुरी (श्योपुर) में निकट भविष्य में एशियाटिक लॉयन की बसाहट मप्र सरकार के ताजा फैसले की वजह से रुकने की आशंका है। दरअसल, 22 साल पुरानी सिंह परियोजना को दरकिनार कर राज्य वन्य प्राणी बोर्ड ने कूनो में टाइगर बसाने का निर्णय लिया है। प्रस्ताव को मंजूरी के लिए नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) के पास भेजा जाएगा। मंजूरी मिली तो प्रदेश के ही किसी रिजर्व से टाइगर चिन्हित कर कूनो में भेजे जाएंगे। ऐसा हुआ तो गिर अभ्यारण्य (गुजरात) से एशियाटिक लॉयन को कूनो में लाने की कानूनी लड़ाई हारने का खतरा है।

- एक तरह से टाइगर कूनो में बसाने के बाद वहां एशियाटिक लॉयन नहीं लाए जाएंगे। क्योंकि गुजरात सरकार पहले ही सुप्रीम कोर्ट में यह पक्ष रख चुकी है कि कूनो सेंक्चुरी में रणथंबौर से टाइगर की आमदरफ्त है, इसलिए वहां लॉयन नहीं बसाए जा सकते।

- देश में एक भी नेशनल पार्क, सेंक्चुरी में शेर-टाइगर एकसाथ नहीं रहते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि कूनो में टाइगर की बसाहट होने के बाद गुजरात सरकार इसी बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को चैलेंज कर सकती है।
- एक्सपर्ट्स की कमेटी के आदेश के बावजूद राज्य सरकार ने कूनो को नहीं दिया नेशनल पार्क का दर्जा, खाली पद भरने में भी देरी : सुप्रीम कोर्ट ने 16 अप्रैल 2013 को छह माह के भीतर कूनो सेंक्चुरी में एशियाई शेरों को भेजने के आदेश गुजरात व केंद्र सरकार को दिए थे।

- इसके लिए भारत सरकार के एडीजी वाइल्ड लाइफ की अध्यक्षता में एक्सपर्ट्स की कमेटी भी बनाई गई। कमेटी ने पिछली दो बैठकों में कहा कि शेरों की बसाहट से पहले मप्र सरकार कूनो सेंक्चुरी को नेशनल पार्क का दर्जा देकर उसका कोर एरिया दोगुना करे।

- साथ ही वन विभाग के खाली पदों को भरे, लेकिन दो साल में न सरकार ने पद भरे और न ही कूनो सेंक्चुरी का एरिया बढ़ाकर उसे नेशनल पार्क का दर्जा दिया गया। ऐसा न होने से कमेटी शेरों की बसाहट के काम को आगे नहीं बढ़ा पाई। 20 दिसंबर 2016 की बैठक के मिनट्स में भी यह निर्णय दर्ज हैं।

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(फैसले का लॉयन से ताल्लुक नहीं, 700 वर्ग किमी के जंगल में दोनों रह सकते हैं)

कूनो सेंक्चुरी में टाइगर बसाने का फैसला क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ नहीं जाएगा?
-नहीं, टाइगर का लॉयन से कोई ताल्लुक नहीं है। कूनो में 700 वर्ग किमी (हकीकत में नहीं) का जंगल है, जहां शेर और टाइगर दोनों रह सकते हैं।
शेरों के लिए लड़ाई के बीच कूनो में टाइगर बसाने का फैसला गुजरात के पक्ष में होगा?
-यह राजनीतिक विश्लेषण है। इस बारे में हम कुछ नहीं कह सकते, हम तो बस स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड के फैसले को बढ़ाएंगे।
कूनो में शेर बसाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उसकी अवमानना केस के निपटने से पहले टाइगर कैसे बसाएंगे?
-हम हर तीन माह में भारत सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले की याद दिलाते हैं, हमें एशियाटिक लॉयन से कोई आपत्ति नहीं है। हम शेर लेने के लिए आज भी तैयार हैं। टाइगर बसाने का मामला इससे अलग है।
आपको कूनो को नेशनल पार्क का दर्जा देकर एरिया बढ़ाना था, खाली पद भी सरकार ने नहीं भरे, क्यों?
-ऐसा नहीं है, हम दोनों चीजें कर रहे हैं। करैरा व घाटीगांव अभ्यारण्य को डीनोटिफाईड (खत्म) कर कूनो का एरिया बढ़ाएंगे। इसमें एक-दो माह लगेंगे।

मप्र सरकार ने की अवमानना
- शेरों को कूनो में बसाने का आदेश न मानने पर सुप्रीम कोर्ट ने भारत व गुजरात सरकार से जवाब मांगा है। मप्र सरकार की वहां टाइगर बसाने की योजना भी कोर्ट के आदेश की अवमानना है। हम उसे भी अवमानना केस में पार्टी बनाएंगे।

अजय दुबे, आरटीआई एक्टिविस्ट

- गुजरात को लाभ पहुंचाने के लिए मप्र सरकार ने कूनो में टाइगर लाने का फैसला किया है। हम इसके खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे।
अतुल चौहान, प्रमुख, संघर्ष समिति

कूनो को दूसरा घर नहीं बनाया गया तो किसी भी दिन बीमारी से खत्म हो जाएंगे एशियाई शेर
- कूनो को एशियाई शेरों के लिए देश की अन्य सेंक्चुरी की तुलना में सबसे उपयुक्त माना गया है। यहां सैकड़ों करोड़ रुपए लोगों को हटाने, गांवों को विस्थापित करने में खर्च किए जा चुके हैं। साथ ही एशियाटिक लॉयन नस्ल, जो सिर्फ गुजरात के एक अभ्यारण्य में है, किसी भी दिन कोई बीमारी, महामारी से इस नस्ल को खत्म कर सकती है।

- जैनेटिक डायवर्सिटी के लिए यह जरूरी है कि शेरों की इस नस्ल का दूसरा घर हो। कूनो में शेर आए तो मप्र मालामाल हो जाएगा, इससे टूरिज्म तेजी से बढ़ेगा। सिर्फ गुजरात की राजनीति के चक्कर में शेरों के अस्तित्व पर हम संकट खड़ा कर रहे हैं।